आत्मकथा भाग-4 अंश-55

विकलांग बल का गठन

मैं व्हाट्सएप पर कई विकलांग मित्रों के सम्पर्क में था, जो सोशल मीडिया पर अपने विचार प्रकट करते रहते थे और विकलांगों के लिए कुछ करना चाहते थे। मोदी जी ने विकलांगों को ‘दिव्यांग’ नाम अवश्य दिया था, लेकिन ऐसा कोई ठोस कार्य नहीं किया था कि उनकी स्थिति में सुधार आए। इस कारण हमें इस ‘दिव्यांग’ नाम से चिढ़ हो गयी थी। काफी विचार विमर्श के बाद हमने एक संगठन बनाना तय किया, जो विकलांगों के हितों का संरक्षण कर सके। 2018 से ही इसके प्रयास चल रहे थे। कई नामों पर विचार करने के बाद हमने अपने संगठन का नाम ‘विकलांग बल’ रखा। फिर इसके पदाधिकारी तय किये गये।
अन्य सदस्यों ने मिलकर मुझे इसका अखिल भारतीय प्रधान बना दिया, क्योंकि मैं सबसे वरिष्ठ भी हूँ और मेरी उपलब्धियाँ भी बहुत हैं। इसके दो उप-प्रधान भी बने- गुड़गाँव के श्री अनुज मेहता और दिल्ली की सुश्री सारिका भाटिया। सीतापुर के श्री मोहित सिंह को महामंत्री बनाया गया और सूरत के श्री दीपक मेहता को कोषाध्यक्ष का दायित्व दिया गया। हमने अपने संगठन का पंजीकरण एक ट्रस्ट के रूप में कराने का निश्चय किया था। कई कठिनाइयों के बाद अगस्त 2019 में इसका पंजीकरण आगरा में हो पाया। उससे पहले हमने पैन कार्ड भी बनवा लिया था।
वर्तमान में हमारा संगठन बहुत सक्रिय है। हम सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय रहते हैं। जहाँ भी किसी विकलांग पर कहीं अन्याय होने का समाचार हमें मिलता है, हम उसका पुरजोर विरोध करते हैं और न्याय दिलाते हैं। अधिकांश बार हमें सफलता मिलती है, तो कई बार असफलता का भी मुँह देखना पड़ता है, क्योंकि दूर-दूर रहने और फंड की कमी के कारण हम कोई बड़ा आन्दोलन नहीं कर पाते। वैसे मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली राजधानी क्षेत्र और गुजरात में हमारी बहुत गतिविधियाँ हैं, जो हमारे संगठन के सदस्य अपने स्तर पर ही चलाते हैं।
अभी तक हमारा बैंक खाता नहीं खुल सका है, क्योंकि सभी पदाधिकारी अलग-अलग शहरों में रहते हैं और कोरोना के कारण दूर-दूर आना-जाना कठिन है, फिर भी इसके प्रयास जारी हैं। बैंक खाता खुल जाने के बाद हमारे संगठन की आर्थिक स्थिति सुधर जाने की पूरी संभावना है।
बाथरूम में फँसना
लखनऊ में एक दिन मैं अपने केन्द्र के बाथरूम में शौच के लिए गया, तो संयोग से अपना मोबाइल साथ नहीं ले गया। उस बाथरूम में वैसा ही ताला लगा हुआ था, जैसा मुम्बई में हमारे फ्लैट के बाथरूम में लगा था और जिसमें मैं एक बार फँस गया था। संयोग से यहाँ भी उस दिन वह ताला नहीं खुला। मैंने बहुत प्रयास किया। भीतर से कई बार खटखटाया भी और आवाजें भी लगायीं। परन्तु वह बाथरूम ऐसी भीतरी जगह पर था और उसका मुख्य दरवाजा भी साउंड प्रूफ था कि किसी ने कोई आवाज नहीं सुनी।
लगभग 15 मिनट तक खटखटाने के बाद भी जब मुझे कोई संकेत नहीं मिला, तो मैंने यहाँ अपने जासूसी दिमाग का उपयोग करने का निश्चय किया। वहाँ धातु की एक पत्ती सी पड़ी हुई थी। किसी तरह उसे मोड़कर उसकी एक नोंक मैंने पेचकस की नोंक जैसी बनायी और उससे भीतर से ताला खोलने का प्रयास किया। काफी प्रयास के बाद मैंने भीतर के दोनों पेच खोल दिये और वह ताला काफी ढीला हो गया। यहाँ तक कि एक छेद भी बन गया जिसमें होकर मैं बाहर का दृश्य देख सकता था। लेकिन ताले के दो पेच बाहरी ओर भी थे, जिनके खुले बिना ताला नहीं निकल सकता था। आश्चर्य है कि तब तक भी कोई व्यक्ति उस बाथरूम में झाँकने तक नहीं आया।
इधर से निराश होकर मैंने फिर अपनी अक्ल लगायी, तो देखा कि पीछे की ओर एक खिड़की में काँच की पट्टियाँ लगी हुई हैं। मैंने कुछ प्रयास के बाद वे सारी पट्टियाँ निकाल दीं। इससे मैं अपना सिर बाहर निकालने में सफल हो गया। वह बाथरूम तीसरी मंजिल पर था, इसलिए मैं वहाँ से कूद भी नहीं सकता था। मैंने सिर बाहर निकालकर देखा कि कोई व्यक्ति नजर आये, तो उसे आवाज लगाऊँ। तभी मुझे बगल की बिल्डिंग पर एक महिला नजर आयी जो वहाँ बरामदे में पानी पीने आयी थी। मैंने उसे आवाज लगाकर बताया कि मैं यहाँ फँस गया हूँ और सिक्योरिटी को बता दो।
वह महिला किसी गार्ड को बताने जा रही थी कि तभी मुझे नीचे एक आदमी दिखायी दिया, जो संयोग से मुझे जानता था। मैंने उसको बताया, तो उसने मुझे पहचान लिया और सिक्योरिटी गार्डों को बता दिया। तब वे लोग वहाँ आये और हथौड़ा मार-मारकर ताला तोड़कर मुझे निकाला।
उस दिन जब मैं घर पहुँचा और श्रीमती जी को यह घटना बतायी, तो उनकी टिप्पणी थी कि ‘हर बार तुम ही क्यों फँस जाते हो?’ मुझे लगता है कि प्रभु मुझे किसी बड़े संकट से बचाना चाहते होंगे, इसलिए बीच-बीच में ऐसे छोटे-छोटे संकट देते रहते हैं। इसके लिए मैं उन्हें कोटि-कोटि धन्यवाद देता हूँ।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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