आत्मकथा भाग-4 अंश-54
दीपांक की सगाई
2018 के प्रारम्भ में जब हम अपने मकान के नवीनीकरण की योजना बना रहे थे, तभी अपने पुत्र दीपांक के विवाह का भी विचार कर रहे थे। वह तब तक 27 वर्ष का हो चुका था और 28वाँ चल रहा था। यह विवाह के लिए पूर्ण आयु है। हम सभी भाइयों के विवाह लगभग इसी उम्र में हुए थे। उस समय वह गुड़गाँव में एक कम्पनी में सेवायें दे रहा था और शीघ्र ही दुबई जाने वाला था, जहाँ उसे अच्छे पैकेज पर नौकरी मिल गयी थी। हम चाहते थे कि दुबई जाने से पहले ही उसका रिश्ता तय हो जाये। ईश्वर की कृपा से ठीक वैसा ही हुआ।
हमने तो उसके लिए रिश्ता खोजना शुरू किया ही, उससे भी कह दिया कि वह स्वयं भी अपनी पसन्द की जीवनसंगिनी खोज ले। हमने शादी डाॅट काॅम पर प्रयास किया। कई विकल्प देखने के बाद एक पर हमारी निगाह जम गयी। वह लड़की टीसीएस में नौकरी करती थी और नौएडा में पोस्टेड थी। उनको दीपांक का बायोडाटा पसन्द आ गया था। फिर फोटुओं का आदान प्रदान हुआ, तो दीपांक को भी वह पसन्द आ गयी। तभी पता चला कि वह लड़की तो हमारे मौहल्ले की ही रहने वाली है। हम उसे नहीं जानते थे, लेकिन हमारे दोनों साढ़ू और उनके बच्चे उनसे अच्छी तरह परिचित थे। पहले दीपांक हिचक रहा था कि चार-पाँच घर दूर ही ससुराल हो जाएगी, लेकिन हमने कहा कि इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। हम इतना अच्छा रिश्ता छोड़ना नहीं चाहते थे और वे भी बहुत उत्सुक थे। अतः रिश्ता तय कर दिया।
हमने उनसे कहा कि हमारी कोई माँग नहीं है, आप अपने बजट के अनुसार ही व्यय करें। बजट से बाहर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उस लड़की श्वेता, जो अब हमारी गृहलक्ष्मी है, के पिता श्री सुनील कुमार अग्रवाल स्टेट बैंक में मैनेजर थे, अब अवकाशग्रहण कर लिया है। 22 अप्रेल 2018 को दोनों की सगाई का कार्यक्रम क्षेत्र के एक अच्छे होटल में रखा गया, जो बहुत अच्छा रहा। उसके बाद दीपांक दुबई चला गया। विवाह दिसम्बर में होना तय हुआ था।
मोना की नौकरी
मोना की एमबीए की पढ़ाई अप्रेल 2018 में समाप्त हो गयी थी और उसका दीक्षांत समारोह भी हुआ था, जिसमें हम दोनों भी शामिल हुए। वह अच्छा कार्यक्रम रहा। उन्हीं दिनों मोना के काॅलेज में कई कम्पनियाँ प्लेसमेंट के लिए आयी थीं। मुम्बई/लखनऊ की एक कम्पनी ने अपने मार्केटिंग विभाग के लिए कई छात्रों का इंटरव्यू लिया। तीन चरणों में हुए इस इंटरव्यू में उन्होंने अपनी कम्पनी के लिए दो लड़कों और एक लड़की का चयन किया। वह लड़की हमारी पुत्री आस्था (मोना) थी। उसको अच्छा पैकेज मिला था और पोस्टिंग लखनऊ में ही थी। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था।
मई 18 में आस्था ने अपने कार्यालय जाना प्रारम्भ कर दिया जो गोमती नगर में लोहिया अस्पताल के निकट था। उसका काम था विभिन्न कम्पनियों के लिए मार्केटिंग रणनीति बनाना और उनको गाइड करना। वह यह काम पूरी निष्ठा से कर रही थी। अनेक बार मैं भी उसको कम्पनियों के लिए सुझाव देता था, हालांकि मैंने एमबीए नहीं किया है। वहाँ बाकी सब तो ठीक था, लेकिन, जैसा कि प्राइवेट कम्पनियों में प्रायः होता है, काम का दबाब बहुत था। उसके बाॅस, जो कम्पनी के मालिक भी थे, कभी भी संतुष्ट नहीं होते थे और यह चाहते थे कि वह 24 घंटे कम्पनी का ही कार्य करती रहे।
इस स्थिति में मोना का तनाव बढ़ता जा रहा था। रोज वह घर लौटकर सिरदर्द की शिकायत करती थी और कई बार तो रोने लग जाती थी। हमने सोचा कि पहली नौकरी है इसलिए ऐसा हो रहा है। सब ठीक हो जाएगा। लेकिन उसका तनाव बढ़ता गया। इन्हीं परिस्थितियों में एक लड़का, जो मोना के साथ ही चुना गया था, नौकरी छोड़ चुका था। मोना ने एक दिन हमसे कहा कि यदि मैं यहाँ रही, तो पागल हो जाऊँगी। यह सुनकर हमने उससे तुरन्त त्यागपत्र देने को कह दिया। उसने सितम्बर में त्यागपत्र के साथ एक महीने का नोटिस दे दिया। कम्पनी ने उसका त्यागपत्र अगले ही दिन स्वीकार कर लिया और इस प्रकार वह उस तनाव भरी नौकरी से छूट गयी।
लेकिन कम्पनी ने उसका एक माह का वेतन रोक लिया था। वे बहाने बनाने लगे कि इतने दिन बाद देंगे, उतने दिन बाद देंगे। जब दिसम्बर भी आ गया और उसका वेतन नहीं मिला, तो मैंने अपनी शाखा में आने वाले हाईकोर्ट के एक वकील उमाशंकर जी को यह मामला बताया और कहा कि उसके ऊपर केस करने की तैयारी कर लो और एक बार पहले फोन पर धमका दो। उन्होंने ऐसा ही किया और यह तरकीब काम कर गयी। कम्पनी केस करने से डर गयी, क्योंकि यदि केस होता, तो बदनामी भी होती और फिर कोई आदमी उसमें काम करने को नहीं मिलता। इसलिए उन्होंने एक सप्ताह में ही हिसाब लगाकर बकाया वेतन का भुगतान कर दिया। उसके बाद मोना ने नौकरी करने का विचार स्थगित कर दिया। उसका विचार मार्केटिंग में पीएचडी करने का था। हमने भी यही सोचा है कि किसी कम्पनी की नौकरी करने के बजाय कहीं शिक्षक की नौकरी करना इसके लिए सबसे अच्छा रहेगा, क्योंकि यह परिश्रम कितना भी कर सकती है, लेकिन तनाव नहीं झेल सकती।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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