आत्मकथा भाग-4 अंश-53

मकान का नवीनीकरण

मैं लिख चुका हूँ कि कई वर्ष पहले मैंने अपना लखनऊ वाला मकान, जो इन्दिरा नगर में मुंशी पुलिया के निकट था, बेच दिया था और उसके तुरन्त बाद आगरा में अपने एक साढ़ू का मकान खरीद लिया था, जो भारी कर्ज के कारण उसे बेचने का निश्चय कर चुके थे। वह मकान दो मंजिला है। उसमें नीचे तो मेरे वही साढ़ू रह रहे थे और ऊपर के भाग में एक किरायेदार रखा हुआ था। जब मेरे अवकाश प्राप्त करने का समय निकट आया, तो हमने अपने मकान का नवीनीकरण कराना तय किया। इसके लिए पहले तो किरायेदार से ऊपर का भाग खाली कराया गया, फिर साढ़ू साहब को ऊपर रहने को तैयार किया गया। हमारा विचार नीचे के भाग में रहने का था, ताकि श्रीमती जी को सीढ़ियाँ अधिक न चढ़नी पड़ें।
ये दो कार्य हो जाने के बाद नीचे के भाग का पूरी तरह नवीनीकरण कराने का निश्चय किया गया। उसके रसोईघर का स्थान बदलना था, जिससे बैठक को एक बड़े हाॅल का रूप दिया जा सके। साथ ही बिजली और नल आदि की फिटिंग भी उसी के अनुसार नये रूप में करानी थी तथा दोनों कमरों की छत भी सजानी थी। दोनों बाथरूमों का भी हुलिया बदलकर उन्हें नवीन चलन के अनुसार बनाना था और फाटक भी नयी डिजायन का पूरा नया लगवाना था। उन्हें अपना रसोईघर भी अत्याधुनिक चाहिए था। हालांकि मैं केवल रसोईघर का स्थान परिवर्तन कराने के पक्ष में था। शेष कार्य मेरे विचार से उतने आवश्यक नहीं थे। केवल नये रसोईघर में नल की फिटिंग कराना आवश्यक था, लेकिन बच्चे नहीं माने। उन्हें नवीनतम सुविधाओं वाला सुन्दर घर चाहिए था। इसके लिए हमारे पास बजट भी था।
मैंने सोचा कि यदि नवीनीकरण के लिए बैंक से कुछ कर्ज मिल जाता है, तो मुझे आयकर में भी छूट मिल जाएगी। लेकिन बैंक नवीनीकरण के लिए कर्ज नहीं देता, केवल विस्तार के लिए मिल सकता है। उसमें नक्शा पास कराने जैसे बहुत झंझट थे। इसलिए मैंने कर्ज लेने का विचार छोड़ दिया या कहिए कि छोड़ना पड़ा था। मैंने अपना पुराना कर्ज पहले ही चुका दिया था और बैंक में गिरवी रखे मकान के मूल कागज भी एक दिन पंचकूला जाकर ले आया था।
मकान का कार्य कराने के लिए पहले हमने एक बिल्डर को पकड़ा। उसने समस्त कार्य का लगभग 13 लाख का अनुमान बताया और अपना 10 प्रतिशत कमीशन अलग से बताया। इस कार्य में उसने 6 माह का समय लगने की संभावना बतायी। मार्च 2018 में जब कार्य शुरू हुआ, तो बहुत धीमा चल रहा था, जिससे हम संतुष्ट नहीं थे। इसके अलावा वह जो सामान खरीदकर लाया था, वह भी अच्छी क्वालिटी का नहीं था। अधिक अच्छी क्वालिटी का सामान लगाने को कहने पर वह खर्च का अनुमान अधिक बताता था। हम समझ गये कि इस आदमी से हमारे मन के अनुसार कार्य नहीं हो पायेगा। इसलिए हमने एक-दो माह बाद ही बिल्डर से हाथ जोड़ दिये और यह कार्य स्वयं अपनी देखरेख में कराने का निश्चय किया।
हमारे साढ़ू श्री विजय जिन्दल जो वहीं ऊपर रहते हैं इस कार्य में कुशल हैं। उन्होंने अपना वह मकान तो बनवाया ही था, एक अन्य रिश्तेदार का मकान भी उनकी देखरेख में बना था। इसलिए उनको मकान बनवाने का अच्छा अनुभव है। लेकिन मजदूरों पर लगातार नजर रखने की भी आवश्यकता थी, इसलिए हमारी श्रीमतीजी कई महीने आगरा में ही रहीं और अपनी देख-रेख में कार्य सम्पन्न कराया। इस बीच मैं अकेला ही लखनऊ में रहता था और बीच-बीच में आगरा आता-जाता रहता था। तब तक लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे पूरी तरह तैयार होकर चालू हो गया था, इसलिए वोल्वो और स्लीपर बसों में आना-जाना बहुत आरामदायक हो गया था। केवल साढ़े चार या पाँच घंटों में हम सोते हुए आगरा या लखनऊ पहुँच जाते थे।
लगभग 6 माह में जब यह कार्य पूर्ण हुआ तो हमें बहुत सन्तोष हुआ। पूरा घर बच्चों की इच्छानुसार ही तैयार हो गया था। जब हमने खर्च का हिसाब लगाया, तो कुल खर्च केवल 13 लाख ही हुआ था, जबकि उसमें सारा सामान अच्छी क्वालिटी का लगवाया गया था। ऐसा कार्य वह बिल्डर 16-17 लाख में भी नहीं करा सकता था। इसलिए हम प्रसन्न थे कि समय रहते बिल्डर को हटा दिया गया।
हम अपने मकान का गृह प्रवेश पहले ही कर चुके थे, लेकिन इसके नवीनीकरण के बाद पुनः छोटा सा कार्यक्रम किया गया। आवश्यक फर्नीचर भी नया खरीदा गया और मकान पूरी तरह सुविधाजनक हो गया, जिसमें मैं आजकल सपरिवार रह रहा हूँ।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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