आत्मकथा भाग-4 अंश-52
मलेरिया से मुकाबला
मैं प्रतिदिन नेकर पहनकर जीपीओ के सामने पटेल पार्क में अपनी शाखा में जाता था। वहाँ घास और झाड़ियाँ भी उग आती हैं, जिनकी सफाई समय पर नहीं की जाती। ऐसे ही किसी दिन मुझे वहाँ किसी मलेरिया मच्छर ने पैर में काट लिया होगा। वह नवम्बर 17 का महीना था, हल्की ठंड थी। एक दिन जब मैं शाखा से घर लौटा, तो मुझे बुखार था और ठंड अधिक लग रही थी। हमें मलेरिया का सन्देह हुआ, तो हमने लखनऊ के प्रसिद्ध केजी मेडीकल काॅलेज में एक डाॅक्टर को दिखाया। उसने भी मलेरिया बताया और कुछ जाँच कराने को कहा। जाँच में मलेरिया ही निकला। मैंने अपनी रिपोर्ट अपनी भतीजी डाॅ आँचल (चिंका) को भेजी, तो उसने भी मलेरिया बताया और डाॅक्टर की लिखी दवायें खाने को कहा।
यह रोग मुझे पहली बार हुआ था। मैं इसका प्राकृतिक इलाज कर सकता था, मैंने दो लोगों के मलेरिया का सफल इलाज किया भी था, जिसमें ठीक होने में 15 दिन लग गये थे। मैं अपना भी इलाज इसी तरह करना चाहता था, लेकिन श्रीमती जी को प्राकृतिक चिकित्सा में कभी कोई विश्वास नहीं रहा, इसलिए उन्होंने दवा खाने और आगरा चलने की जिद पकड़ ली। हमारे बैंक का एक भूतपूर्व गार्ड कमलेश (अब स्वर्गीय) उन दिनों ओला चलाता था। उसी की टैक्सी में मुझे लगभग जबर्दस्ती आगरा ले जाया गया। वहाँ पहले हम एक जानकार वैद्य जी से मिले, जिन्होंने सात दिन की दवा दी और ठीक होने का विश्वास दिलाया। आयुर्वेदिक दवा खाने में मुझे कोई आपत्ति नहीं थी, इसलिए मैंने वह दवा नियमित ली। साथ में कुनैन की गोलियाँ भी खा रहा था। लगभग एक सप्ताह में मैं ठीक हो गया। लेकिन कमजोरी बहुत आ गयी थी, इसलिए एक सप्ताह और आगरा में रहा, तब लखनऊ लौटा।
महामना मालवीय मिशन द्वारा सम्मान
जिन दिनों चेन्नई से आई केविनकेयर फाउंडेशन की टीम मेरे बारे में खोज-बीन करने और वीडियो बनाने आयी थी, तब महामना मालवीय मिशन के कार्यकर्ताओं ने सोचा कि यदि बाहर की टीम हमारे कार्यकर्ता का सम्मान कर सकती है, तो हम स्वयं अपने कार्यकर्ताओं को सम्मानित क्यों नहीं कर सकते? मिशन के प्रमुख कार्यकर्ता मेरे बड़े भ्राता तुल्य श्री गोविन्द राम अग्रवाल और श्री विष्णु कुमार गुप्त मुझसे बहुत लगाव रखते हैं। जब से मैंने महामना बाल निकेतन की व्यवस्था में सहयोग करना प्रारम्भ किया था, तभी से मुझे उनका स्नेह और मार्गदर्शन बराबर मिलता रहा है। मेरे लिए इतना ही पर्याप्त था, इससे अधिक की कामना मैंने नहीं की थी। लेकिन जब उन्होंने आगामी मालवीय जयन्ती के दिन 25 दिसम्बर 2017 को होने वाले वार्षिक कार्यक्रम में मुझे सम्मानित करने का निर्णय किया, तो इसे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का आदेश और आशीर्वाद मानकर मैंने स्वीकार कर लिया।
इस हेतु उन्होंने एक सम्मान पत्र भी छपवाया और उसे फ्रेम कराया। यह सम्मान मुझे उ.प्र. के मुख्यमंत्री पूज्य योगी आदित्य नाथ जी के करकमलों से प्रदान किया जाने वाला था, जो उस दिन मुख्य अतिथि के रूप में उस कार्यक्रम में आमंत्रित किये गये थे। मुझे दोहरी प्रसन्नता हो रही थी कि मुझे मिशन सम्मानित करेगा और पूज्य योगी जी के कर कमलों से यह सम्मान मुझे दिया जाएगा।
उस समय तक हमारी पुत्री आस्था पेरिस से लौट आयी थी और हमारा पुत्र दीपांक भी छुट्टी लेकर आ गया था। इस तरह 25 दिसम्बर को हमारा पूरा परिवार वहाँ उपस्थित था।
संयोग से ठीक 25 दिसम्बर को ही पूज्य योगी जी को किसी अत्यावश्यक कार्यवश दिल्ली जाना पड़ गया। अतः उनकी जगह माननीय उपमुख्यमंत्री डाॅ दिनेश चन्द्र शर्मा को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया। वे दो बार लखनऊ के महापौर भी रह चुके थे और मिशन की गतिविधियों और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से अच्छी तरह परिचित थे। उनके साथ मंच पर लखनऊ की महापौर श्रीमती संयुक्ता भाटिया भी विशिष्ट अतिथि के रूप में विराजमान थीं। श्री प्रभु नारायण श्रीवास्तव सहित मिशन के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता भी मंच पर उपस्थित थे और सरस्वती विद्या मंदिर का मैदान आमंत्रित अतिथियों और कार्यकर्ताओं से खचाखच भरा हुआ था। उस दिन मौसम भी अच्छा था, धूप खिली हुई थी।
सबकी उपस्थिति में मा. गोविन्द जी ने मेरा सम्मान पत्र पढ़कर सुनाया, जिसमें मेरी उपलब्धियों का वर्णन था। यह वर्णन इतना प्रभावशाली था कि बीच-बीच में कई बार तालियाँ बजी थीं। स्वयं डाॅ दिनेश चंद्र शर्मा मेरे बारे में अपने निकट बैठे मा. प्रभु जी से पूछताछ करते देखे गये। वाचन के बाद मा. उपमुख्यमंत्री महोदय द्वारा वह सम्मान पत्र मुझे प्रदान किया गया और शाॅल भी ओढ़ाया गया।
इसके बाद मैंने एक मिनट का समय बोलने के लिए माँगा। अपने संक्षिप्त सम्बोधन में मैंने मिशन कार्यकर्ताओं को इस सम्मान के लिए धन्यवाद दिया और यह भी कहा कि मुझे ऐसा लग रहा है जैसे स्वयं महामना मालवीय जी का आशीर्वाद मुझे मिल गया है। मेरी इन भावनाओं पर फिर जोर की तालियाँ बजीं। 25 दिसम्बर 2017 का वह दिन मेरे लिए आज भी अविस्मरणीय है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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