आत्मकथा भाग-4 अंश-51

फाउंडेशन द्वारा सम्मान हेतु प्रयास

सितम्बर 2017 में मुझे पता चला कि केविन केयर फाउंडेशन नामक एक संगठन है जो अच्छा कार्य करने वाले या अधिक उपलब्धियों वाले विकलांगों का सम्मान करता है। सम्मान राशि रु 1 लाख होती है और हर वर्ष 3 से 5 लोगों को सम्मानित किया जाता है। मैंने उनकी वेबसाइट पर पिछले वर्षों में सम्मानित होने वाले लोगों का विवरण देखा, तो मुझे लगा कि मेरी उपलब्धियाँ तो उनसे बहुत अधिक हैं, अतः मुझे वह सम्मान मिलने की पूरी सम्भावना है। मुझे रुपयों का लालच नहीं था, क्योंकि मेरी आर्थिक स्थिति तब तक बहुत अच्छी हो गयी थी। लेकिन कोई बड़ा सम्मान मिलने से मुझे और संघ को भी यश मिलता। इसी लालच में मैंने उनके फाॅर्मेट के अनुसार अपना बायोडाटा तैयार किया। मैंने उसमें पुरस्कार हेतु जापान यात्रा करने, दर्जनों पुस्तकें लिखने और महामना बाल निकेतन के बच्चों की पढ़ाई में सहायता करने जैसे अनेक कार्याें और उपलब्धियों का उल्लेख किया था।
इसमें तीन प्रतिष्ठित लोगों का संदर्भ भी माँगा गया था, जो मुझसे और मेरे कार्याें से अच्छी तरह परिचित हों। मैं तीनों सन्दर्भ लखनऊ के ही देना चाहता था। दो सन्दर्भ तो मुझे मिल गये- श्री गोविन्द राम अग्रवाल और श्री विष्णु कुमार गुप्त। ये दोनों मेरे बड़े भ्राता तुल्य हैं और एचएएल में मेरी नौकरी के समय से ही मुझसे बहुत स्नेह करते हैं। दोनों ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ-साथ महामना मालवीय मिशन में सक्रिय हैं। मैंने इनका सन्दर्भ क्रमशः पहले और दूसरे नम्बर पर दिया। तीसरे सन्दर्भ के लिए मैंने अपने बड़े भाई डाॅ राममूर्ति सिंघल का नाम देना उचित समझा, जो आगरा में रहते हैं।
उस संगठन का मुख्यालय चेन्नई में है। अपना बायोडाटा भेजने के कुछ दिनों बाद ही मुझे वहाँ से सूचना मिली कि मेरा नाम सम्मान के लिए शाॅर्ट लिस्ट किया गया है और उनके प्रतिनिधि मुझसे मिलने तथा दी गयी जानकारियों की पुष्टि करने आयेंगे। नवम्बर में उनके आने की तिथि तय हुई और नियत दिन वे आ पहुँचे। उनमें एक महिला और एक फोटोग्राफर थे, जो दोनों ही दक्षिण भारतीय थे। उन्होंने मुझसे कहा था कि वे मेरे कार्यालय सहयोगियों से भी मिलना चाहेंगे। परन्तु हमारे कम्प्यूटर सेंटर में फोटोग्राफी प्रतिबंधित है, इसलिए मैंने उनको अपने निवास पर ही बुलाया और अपने कार्यालय के तीन व्यक्तियों को भी वहीं पर बुला लिया। वे थे- श्रीमती दिपाली चन्द्रा, श्री अनुराग सिंह और श्रीमती प्रीती सिंह। इनमें से श्री अनुराग सिंह मेरे साथ कई वर्ष तक आईआरटी पंचकूला में रहे थे, इसलिए मैंने उनको बुलाना उचित समझा था।
उन प्रतिनिधियों ने खुलकर उन सबसे मेरे बारे में बात की और मेरी उपलब्धियों को देखा। मैंने जापान में मिला स्वर्ण पदक और अपनी पुस्तकें भी उनको दिखायीं। वे जानना चाहते थे कि मैं किस तरह पुस्तक लिखने का कार्य करता हूँ। इसलिए मैंने अपने लैपटाॅप पर उनको कार्य करके दिखाया। इन सब बातों का उन्होंने वीडियो भी बनाया। उन्होंने हमारी श्रीमतीजी से भी बात की। वे हमारे बच्चों से भी मिलना चाहते थे, लेकिन दोनों बाहर थे, बेटा दीपांक उन दिनों चेन्नई में था और बेटी आस्था पेरिस में थी। इसलिए हमने प्रतिनिधियों से क्षमा माँग ली।
वहाँ कार्य पूर्ण होने के बाद उन्होंने बाल निकेतन देखने की इच्छा प्रकट की थी। इसलिए मैंने गोविन्द जी और विष्णु जी दोनों को बाल निकेतन में बुला लिया था। फिर मैं प्रतिनिधियों को एक टैक्सी में लेकर बाल निकेतन गया। हमारी श्रीमती जी भी मेरे साथ गयी थीं।
उन प्रतिनिधियों ने वहाँ गोविन्द जी और विष्णु जी दोनों से मेरे और बाल निकेतन के बारे में खुलकर चर्चा की। उन्होंने बाल निकेतन के बच्चों से भी बात की और अनेक वीडियो बनाये। उनके हाव-भाव से लग रहा था कि वे मुझसे बहुत प्रभावित हुए थे। हालांकि उन्होंने बताया कि अन्तिम निर्णय एक कमेटी करेगी और यदि मुझे चुना गया, तो मार्च के महीने में मुझे सपरिवार चेन्नई बुलाया जाएगा। परिणाम फरवरी में आ जाएगा।
फरवरी 2018 में मुझे वहाँ से सूचना प्राप्त हुई कि मेरा नाम उस पुरस्कार के लिए नहीं चुना गया है और मैं चाहूँ तो अगले वर्षों में उसके लिए पुनः आवेदन कर सकता हूँ। यह सूचना पाकर मुझे निराशा हुई, क्योंकि उन्होंने उस वर्ष जिन लोगों को पुरस्कार के लिए चुना था उनकी उपलब्धियाँ मेरे सामने पासंग बराबर भी नहीं थीं। मुझे ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ मेरा घनिष्ठ सम्बंध होना उनको अच्छा नहीं लगा, इसलिए मेरा नाम काट दिया गया। ऐसा मेरे साथ एक बार पहले भी हो चुका था। पहले सहारा इंडिया समाचार पत्र विशेष उपलब्धियों वाले लोगों का सचित्र परिचय छापा करता था। एक मित्र ने मेरा परिचय उनको भेजा था, पर मेरे संघ स्वयंसेवक होने के कारण उन्होंने नहीं छापा। लेकिन मुझे इस बात का कोई खेद नहीं है। स्वयंसेवक होना मेरे लिए गर्व की बात है। सभी पुरस्कार उसके सामने तुच्छ हैं। वैसे चंडीगढ़ के दैनिक जागरण में मेरे बारे में सचित्र समाचार निकल चुका है, जिसकी कतरन अभी भी मेरे पास सुरक्षित है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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