आत्मकथा भाग-4 अंश-50
शाखा का हाल
लखनऊ वापसी के तुरन्त बाद मैंने अपनी पुरानी जीपीओ के सामने पटेल पार्क वाली शाखा जाना प्रारम्भ कर दिया था। उस समय तक हमारे नगर का पुनर्गठन हो गया था। पुराने प्रेम नगर को दो भागों में बाँटकर एक नया ‘संवाद नगर’ नामक नगर बनाया गया था, जिसके नगर कार्यवाह मेरे घनिष्ठ मित्र श्री बृज नन्दन यादव थे। हमारी शाखा उसी नगर में आती थी। मुझे संवाद नगर के शारीरिक शिक्षण प्रमुख का दायित्व दिया गया था। हालांकि बृज नन्दन जी मुझे सह नगर संघचालक का दायित्व देना चाहते थे, परन्तु मैंने मना कर दिया, क्योंकि मेरे लिए नगर की अन्य शाखाओं में जाना बहुत कठिन था। पुराने प्रेम नगर के संघ चालक श्री सुभाष चन्द्र अग्रवाल अब भाग संघचालक बन गये थे, जिसमें हमारा नगर भी आता था। वे प्रायः हमारी शाखा में आते थे, जिससे उनके दर्शन हो जाते थे।
हमारी शाखा भी दो भागों में बँट गयी थी। हुसैन गंज और लाल बाग के क्षेत्र की शाखा नगर निगम के कार्यालय के सामने वाले पार्क में लगती थी, जिसके मुख्य शिक्षक श्री राज कुमार थे, जो पहले हमारी शाखा के मुख्य शिक्षक थे। उस समय हमारी शाखा के मुख्य शिक्षक थे श्री सुधीर जी। वे हमारे बैंक के निकट ही नरही में रहते थे और कपड़े की किसी दुकान पर सेल्समैन थे। वे शाखा आने के बारे में बहुत नियमित थे, यद्यपि कभी-कभी देर से आते थे। मैं प्रायः समय पर पहुँचकर शाखा प्रारम्भ कर देता था। सदा की तरह मैं शाखा में आने वाले गिने-चुने लोगों को योग, व्यायाम आदि कराता था और एक गीत भी रोज गवाया करता था। इससे हमारी शाखा बहुत नियमित हो गयी थी। उस पार्क में और भी लोग व्यायाम करने या घूमने आया करते थे। कभी-कभी उनको भी मैं शाखा में बुलाकर व्यायाम कराता था। हमारी शाखा में सर्वश्री शिव कुमार जी, उमा शंकर जी एडवोकेट और अमरेन्द्र बाजपेयी जी एडवोकेट प्रायः नियमित आ जाते थे।
लगभग शाखा के समय पर ही वहाँ एक बहुत सुन्दर लड़की व्यायाम करने आती थी और कई प्रकार से दौड़ती-भागती थी। वह बुर्के में आती थी और शुरू में ही बुर्का उतारकर पार्क के एक कोने में रख देती थी, फिर वापस जाते समय उसे पहन लेती थी। एक दिन बुर्का पहनते देखकर ही मुझे पता चला कि वह मुसलमान है। उसने मुझसे कमर और पीठ के व्यायाम पूछे थे। मैंने बताये और साथ में अपनी स्वास्थ्य रहस्य पुस्तिका भी उसको भेंट की। वह बहुत दिनों तक आती रही, फिर अचानक आना बन्द कर दिया। शायद उसका विवाह हो गया था। कभी-कभी उसके साथ एक युवक भी व्यायाम करने आता था, उसने भी तभी आना बन्द कर दिया था।
योग कक्षा प्रारम्भ करने का प्रयास
मैंने नवी मुम्बई की तरह लखनऊ में भी अपनी बिल्डिंग की छत पर योग कक्षा लगाने का प्रयास किया। इसके लिए मैंने एक सूचना छपवाकर वहाँ अपने बैंक के तीनों आवासीय भवनों की लिफ्ट पर लगायी। प्रारम्भ में केवल एक महिला आयी, उसने भी दो दिन आकर बन्द कर दिया। और कोई आया ही नहीं, इसलिए मैंने योग कक्षा का विचार छोड़ दिया। कभी-कभी यदि किसी कारणवश मैं शाखा नहीं जा पाता था, तो स्वयं छत पर जाकर योग कर लेता था।
महामना बाल निकेतन का हाल
जब मैं पुनः लखनऊ आया, तो मैंने बाल निकेतन से सम्पर्क किया। वहाँ भी काफी बदलाव हो गया था। कई बड़े बच्चे इंटर उत्तीर्ण करके बाल निकेतन छोड़ गये थे, क्योंकि बाल निकेतन में केवल इंटर तक के विद्यार्थियों को रखने की व्यवस्था थी। उनके बाद कई छोटे-छोटे बच्चे वहाँ आ गये थे। उनकी शिक्षा बस ठीक ही चल रही थी। मेरे लिए वहाँ नित्य जाना सम्भव नहीं था, क्योंकि उन दिनों टैम्पुओं की सेवा गड़बड़ हो गयी थी और बाल निकेतन की ओर टैम्पू जाते भी नहीं थे। फिर भी शनिवार या रविवार को मैं वहाँ चला जाता था और बच्चों की पढ़ाई में सहायता करता था।
मैंने इस बार महामना मालवीय मिशन में कोई दायित्व नहीं लिया, क्योंकि मैं केवल डेढ़ साल ही वहाँ रहने वाला था। लेकिन बाल निकेतन की व्यवस्था में मैं सहयोग देने लगा। उस समय तक बाल निकेतन समिति के अध्यक्ष श्री तुलाराम निमेश बन गये थे, जिनका उल्लेख मैं पहले कर चुका हूँ। वे बैंक ऑफ महाराष्ट्र से अवकाश प्राप्त हैं और गोमती नगर में ही बाल निकेतन के निकट ही रहते हैं। वे बाल निकेतन की व्यवस्था अच्छी तरह देखते हैं। आज भी बाल निकेतन को वे ही सँभाल रहे हैं और संघ में भी सक्रिय हैं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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