आत्मकथा भाग-4 अंश-49

कार्यालय का हाल

जब मैं नवी मुम्बई से लगभग सवा दो साल बाद वापस अपने पुराने विभाग डीआरएस में पहुँचा, तब तक दो को छोड़कर वहाँ पदस्थापित सभी अधिकारी बदल चुके थे। केवल अनुराग सिंह, जो आईआरटी पंचकूला में हमारे साथ थे, और दिनेश चन्द्र यादव, जो पहले चंडीगढ़ मंडलीय कार्यालय में आईटी अधिकारी थे, वहाँ अभी भी पदस्थापित थे। कुछ समय बाद दिनेश जी का भी स्थानांतरण हो गया था। कई नये अधिकारी वहाँ आये थे, जिनमें दो महिलायें थीं।
मेरे जाने के बाद श्रीमती दिपाली चन्द्रा वहाँ विभाग प्रमुख के रूप में आयी थीं। वे वहीं थीं। उनसे मेरा पूर्व परिचय था। वे देखने में किसी फिल्मी हीरोइन जैसी लगती हैं और अपने काम में योग्य और कुशल ही नहीं, बल्कि कुछ कठोर भी हैं। उनके समय किसी को अनुशासन तोड़ने की हिम्मत नहीं हेाती थी, जबकि मैं इस मामले में बहुत ढीला हूँ। दिपाली जी के रहते हुए मुझे विभाग की चिन्ता बिल्कुल नहीं होती थी। मैं केवल ड्यूटी चार्ट बनाने में उनकी मदद करता था, जो कि एक जटिल काम होता है, क्योंकि डीआरएस में अधिकारियों की संख्या फिर कम हो गयी थी।
उस समय वहाँ सर्वश्री अनुराग सिंह, श्रीमती अनिता राजीव, अनुराग राय, जितेन्द्र भारती, प्रमोद भारती, कु. अखिलेश राठौर, श्रीमती प्रीती सिंह, सुमित विमल, गौरव जौहरी, विभव तिवारी तथा धर्मेन्द्र भास्कर पदस्थ थे। बाद में सर्वश्री नरेश सिंह बोधी, अबनीन्द्र कुमार, महेश्वर सिंघा तथा अनुज श्रीवास्तव भी वहीं आ गये थे तथा एक नई अधिकारी कु. अंजलि अग्रवाल ने वहीं से बैंक में सेवा प्रारम्भ की थी। प्रमोद भारती वहाँ से जल्दी ही आगरा चले गये थे।
इनमें से कई अधिकारी प्रधान कार्यालय के विशेष प्रोजेक्ट के लिए आये थे और उनको डीआरएस के नियमित कार्यों से कोई मतलब नहीं रहता था, इसलिए हम उनकी ड्यूटी भी नहीं लगा सकते थे। वे केवल वहाँ बैठते थे, क्योंकि उनके बैठने के लिए लखनऊ में और कोई स्थान नहीं मिला था। मैं पहले जिस केबिन में बैठा करता था, वहाँ मेरे बाद आयीं श्रीमती दिपाली चन्द्रा बैठती थीं। मैंने वह केबिन लेने की कोई कोशिश नहीं की, क्योंकि मेरा कोई विशेष कार्य नहीं था। इसलिए मैं अन्य सभी अधिकारियों के साथ ही हेल्प डेस्क कक्ष में बैठा करता था।
मेरे पीछे विभाग के कार्यों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था, लेकिन एक दुर्घटना हो गयी थी कि बारिश के दिनों में शायद पानी लीक होने या शाॅर्ट सर्किट से हमारे सेंटर का एक बैटरी रूम जलकर खाक हो गया था। इसके कारण कई दिन सेंटर की गतिविधियाँ बन्द रहीं और फिर कुछ दिन बाद किसी तरह अन्य बैटरियों की सहायता से सर्वर को चालू किया गया। बाद में मेरे सामने ही नया बैटरी कक्ष बना और उसे हर प्रकार के संभावित संकटों से सुरक्षित किया गया।
मेरे आने के कुछ महीने बाद दिपाली जी का स्थानांतरण हमारे सेंटर से नीचे भूमि तल पर बने विभाग सीपीपीडी में हो गया था। फिर मैंने उसी केबिन में बैठना शुरू कर दिया था। इसके कुछ दिन बाद श्री संजय सिंह जो पहले लगभग मेरे साथ ही डीआरएस से सीबीएस प्रोजेक्ट ऑफिस मुम्बई गये थे और स्केल 4 हो गये थे, वहाँ से वापस डीआरएस में आ गये।
उस समय तक हमारे बैंक का विलय अन्य बैंकों के साथ होने की चर्चा प्रारम्भ हो गयी थी, क्योंकि अनेक प्रयासों के बाद भी हमारे बैंक का एनपीए अर्थात् कोई आय न देने वाले ऋण खातों की संख्या और मात्रा कम होने में नहीं आ रही थी। इसलिए मानसिक रूप से हम सभी इसके लिए तैयार थे। हमें यह आशा थी कि हमारा बैंक बड़ा और पुराना होने के कारण किसी छोटे बैंक का विलय हमारे बैंक में किया जाएगा, लेकिन केन्द्र सरकार ने एकदम उल्टा निर्णय कर दिया और हमारे बैंक का विलय एक छोटे से इंडियन बैंक में कर दिया, जो मुख्यतः दक्षिण भारत में ही अपनी प्रभावी उपस्थिति रखता था और चेन्नई में जिसका प्रधान कार्यालय है। मेरे सौभाग्य से विलय की यह प्रक्रिया मेरे अवकाश ग्रहण करने के बाद ही प्रारम्भ हुई थी और मेरे अवकाश ग्रहण करने के ठीक एक साल बाद पूर्ण हुई थी। हम सभी पुराने अधिकारी इलाहाबाद बैंक से बहुत लगाव रखते थे। उसका इस प्रकार अस्तित्व समाप्त होने से हम सबको स्वाभाविक रूप से बहुत दुःख हुआ, लेकिन यह भी संसार की एक रीति है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आत्मकथा भाग-4 अंश-62 (अन्तिम)

आत्मकथा भाग-4 अंश-61

आत्मकथा भाग-4 अंश-21