आत्मकथा भाग-4 अंश-48
मोना की पेरिस में पढ़ाई
जुलाई 2017 में हमारी पुत्री आस्था (मोना) के एमबीए का तृतीय सेमिस्टर शुरू हुआ था। इसके बीच में उसे पेरिस में 3 महीने का एक कोर्स करने का विकल्प दिया गया, जो अनिवार्य नहीं था। लेकिन मोना का इसमें जाने का बहुत मन था। उसकी क्लास के कई लड़के और लड़कियाँ इसमें जा रहे थे। वहाँ आने-जाने, रहने और खाने का लगभग साढ़े तीन लाख का खर्च था। मेरा एक भतीजा रचित (मनु) भी एमबीए में पढ़ते हुए ऐसे ही किसी कोर्स के लिए पेरिस जा चुका था। इसलिए हमने भी मोना को जाने की अनुमति दे दी। हमने उसकी पेरिस की उड़ान मुम्बई से ही बुक करायी, क्योंकि हम वहीं पर थे। वैसे वह दिल्ली से भी उड़ान ले सकती थी।
जाने से कुछ दिन पूर्व मोना मुम्बई आ गयी और सारी व्यवस्थायें कर लीं। उसके लिए आवश्यक यूरो करेंसी मेरे मित्र श्री महेश्वर सिंघा ने उपलब्ध करा दीं, जो एफसीटीएम विभाग में थे। मोना को 17 सितम्बर 2017 (रविवार) को जाना था।
पुनः लखनऊ स्थानांतरण
मुझे लखनऊ में रहते हुए सवा दो साल ही हुए थे और केवल डेढ़ वर्ष का सेवाकाल बाकी था। मैं सोच रहा था कि वहीं से रिटायर हो जाऊँगा और वहाँ से सीधे अपने घर आगरा चला जाऊँगा। लेकिन अचानक सितम्बर के प्रारम्भ में ही मेरा स्थानांतरण लखनऊ उसी डीआरएस विभाग में कर दिया गया, जहाँ मैं पहले भी 5 साल रह चुका था। श्री राव साहब उस समय महाप्रबंधक (आईटी) थे। वे मुझसे बहुत स्नेह करते हैं। उन्होंने सोचा था कि मैं लखनऊ का ही रहने वाला हूँ, इसलिए वहीं से अवकाश प्राप्त करना अच्छा रहेगा। उनको यह याद नहीं था कि मैं आगरा का रहने वाला हूँ।
मैंने इस स्थानांतरण को सहर्ष स्वीकार कर लिया। मैंने अपने विभाग के प्रमुख श्री आई.पी. सिंह के केवल यह निवेदन किया कि मुझे 16 सितम्बर को ही पदमुक्त करें, ताकि मैं अपनी पुत्री को पेरिस भेज सकूँ। उन्होंने यह स्वीकार कर लिया। मैंने 17 सितम्बर की ही लखनऊ के लिए अपनी हवाईयात्रा की टिकट बनवा ली। दोनों उड़ानों का समय लगभग समान था।
16 सितम्बर को सायंकाल मेरे विभाग में मेरा विदाई समारोह आयोजित हुआ। यह समारोह बहुत भावुकतापूर्ण था, क्योंकि वहाँ सभी के साथ मेरा बहुत लगाव हो गया था। अचानक मेरे जाने से सभी बहुत दुःखी थे। परन्तु बैंक सेवा में ऐसे अवसर प्रायः आते रहते हैं। उस दिन 16 सितम्बर को शनिवार का आधे दिन का अवकाश था। उसी दिन दोपहर बाद मेरे विभाग के अंकित वार्ष्णेय, कु. उपासना शाह और सीबीएक प्रोजेक्ट ऑफिस की एक अन्य अधिकारी कु. अंजलि मुझसे मिलने मेरे निवास पर आये। वे भी मेरे लिए कुछ भेंट लाये थे। उसी समय श्री विश्वास नाइक भी मुझसे मिलने आये, जो उन दिनों मुम्बई में दूसरे विभाग में चले गये थे। इन सबसे मिलकर हमें बहुत प्रसन्नता हुई।
मेरे मित्र श्री पी.के. अरोरा उस समय भी लखनऊ मंडल के प्रमुख थे। हमने उनको फोन करके निवेदन किया कि मुझे बैंक का कोई फ्लैट आवंटित कर दें। संयोग से उस समय नये भवनों में एक फ्लैट खाली था। उन्होंने तत्काल वही मुझे आवंटित कर दिया और इस प्रकार मैं एक बड़ी चिन्ता से मुक्त हुआ।
निर्धारित दिन 17 सितम्बर को प्रातः ही मैं और मोना मुम्बई हवाई अड्डे पर पहुँच गये। वहाँ से वह तो पेरिस चली गयी और मैं लखनऊ पहुँच गया। अगले दिन कार्यालय में मैंने अपनी उपस्थिति दी और उनसे फ्लैट की चाभी भी ले ली। उसका रसोईघर थोड़ा गंदा था, अतः मैंने सफाई कराने के लिए कह दिया। शीघ्र की उसकी सफाई भी करा दी गयी। इसी बीच मैं अपने मित्र श्री बृज नन्दन यादव के साथ ठहरा था, जो जियामऊ में कमरा लेकर रहते थे। लगभग 7 दिन वहाँ रहने के बाद मैं वापस मुम्बई लौटा और फिर श्रीमतीजी और सामान के साथ लखनऊ आ गया। उस समय तक बैंक से फर्नीचर मिलना बन्द हो गया था, लेकिन हमने किसी तरह कामचलाऊ फर्नीचर की व्यवस्था कर ली। हमारे पास अपना कुछ फर्नीचर पहले से था। फिर हम आनन्दपूर्वक वहाँ रहने लगे।
हमारा यह फ्लैट मेरे ऑफिस के बिल्कुल बगल में था। एक भवन से उतरकर बगल के दूसरे भवन में चढ़ जाने जितना समय ही आने-जाने में लगता था। इसलिए मैं दोपहर का भोजन करने रोज घर चला जाता था। उस बिल्डिंग में रहने वाले मेरे अलावा प्रायः सभी सहायक महा प्रबंधक पद पर थे। उनमें से एकाध को मैं पहले से जानता था। शेष से वहीं आने पर परिचय हो गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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