आत्मकथा भाग-4 अंश-47

मुम्बई में श्रीमती नेहा नाबर से भेंट

स्केल 4 अर्थात् मुख्य प्रबंधक के पद पर मेरा प्रोमोशन दिसम्बर 2006 में हुआ था। इसके तीन साल बाद ही मैं स्केल 5 के लिए साक्षात्कार देने के योग्य हो गया था। सबसे पहले मैंने 2010 में इंटरव्यू दिया था, जो दिल्ली में हुआ था। इसमें मैं उत्तीर्ण नहीं हो पाया। इसके बाद हर दूसरे-तीसरे वर्ष मैं प्रोमोशन के लिए इंटरव्यू देता रहा, लेकिन मेरा प्रोमोशन नहीं हुआ। एकाध बार मैं इंटरव्यू देने नहीं गया था।
जब मैं नवी मुम्बई आ गया, तो एक बार फिर प्रोमोशन का इंटरव्यू देने गया। यह इंटरव्यू मुम्बई में ही हुआ था, जहाँ हमारे बैंक के कई ऑफिस हैं। उपलब्धता के अनुसार इंटरव्यू अलग-अलग जगह होता था। पहली बार यह बजाज भवन में हुआ था। वहाँ पहले एक ऑनलाइन परीक्षा हुई, जिसके बाद इंटरव्यू शुरू हुए। मेरा नाम इंटरव्यू देने वालों की सूची में काफी नीचे था और मुझे कई घंटे वहीं गुजारने थे। इसलिए मैंने इस समय का उपयोग अपने पुराने साथियों से भेंट करने में करने का निश्चय किया।
उस स्थान से हमारे बैंक की फोर्ट शाखा केवल डेढ़ किमी दूर थी। उसी शाखा के भवन में ऊपरी तल पर मेरे आईआरटी पंचकूला के साथी श्री महेश्वर सिंघा एफसीटीएम शाखा में बैठते थे। उसी में हमारी कानपुर की सहयोगी कर्मचारी श्रीमती नेहा नाबर बैठती थीं, जो वहाँ के डीजीएम श्री सुदीप सान्याल की व्यक्तिगत सचिव थीं। सान्याल साहब भी मेरे सामने ही कानपुर की स्वरूप नगर शाखा के प्रबंधक रहे थे। परन्तु उस दिन वे अपने कार्यालय में नहीं थे, किसी काम से कहीं गये थे।
जब मैं उस कार्यालय में पहुँचा तो सबसे पहले नेहा जी ही मुझे दिखाई दीं। मैंने उनकी सीट के सामने जाकर पुकारा- ‘नेहा जी!’। उन्होंने सिर उठाकर देखा और तत्काल मुझे पहचान लिया, हालांकि हम लगभग 11 वर्ष बाद मिल रहे थे। उस समय तक वे अधिकारी बन गयी थीं। उन्होंने मुझसे हालचाल पूछा, फिर एक अन्य अधिकारी अजीत जी के पास ले गयीं, जो संयोग से हमारी ही बिल्डिंग में रहते थे, लेकिन मुझे ज्ञात नहीं था कि वे वहीं बैठते हैं। फिर वहीं सिंघा जी भी आ गये और काफी दिन बाद मुझसे मिलकर बहुत खुश हुए। उन सबसे मिलकर मैं अपना इंटरव्यू प्रारम्भ होने से काफी पहले ही लौट आया।
पुणे में प्रशिक्षण
पुणे में बैंकिंग विषयों का प्रशिक्षण देने का एक बड़ा संस्थान है, जहाँ लगातार प्रशिक्षण चलते रहते हैं। लेकिन संयोग से कभी भी मुझे ऐसे किसी प्रशिक्षण के लिए नामांकित नहीं किया गया था। जब मैं नवी मुम्बई में था, तो मेरा कार्य ही एटीएम कार्डों के लेन-देनों को सँभालने से सम्बंधित था। इसलिए जब इस विषय पर एक प्रशिक्षण होने की सूचना आई तो मेरे आग्रह पर हमारे विभाग प्रमुख श्री आई.पी. सिंह ने मुझे और एक साथी अधिकारी श्री हिमांशु सिंह राठौर को इस प्रशिक्षण हेतु नामांकित कर दिया। यह प्रशिक्षण पूरे तीन दिन का था।
नवी मुम्बई से पुणे का रास्ता केवल ढाई-तीन घंटे का है। बसें वाशी में बाईपास के निकट से मिलती हैं। हम दोनों ने सुबह की बस जल्दी पकड़कर पुणे जाने का निश्चय किया। हमने पहले ही टिकट बनवा लीं। बस थोड़ी देर से आयी, लेकिन हम लगभग 11 बजे संस्थान में पहुँच गये, जो बस अड्डे से काफी दूर है। वह संस्थान बहुत हरा-भरा, सुन्दर और विस्तृत है। हालांकि उसकी सड़कें सीधी नहीं हैं और कई बार हम रास्ता भूल जाते थे।
यह प्रशिक्षण अच्छा रहा। वहाँ ठहरने और खाने की अच्छी व्यवस्था है, हालांकि अनुशासन बहुत कड़ा था। कोई भी प्रशिक्षणार्थी अपने प्रशिक्षक से ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ लिये बिना कैम्पस छोड़कर नहीं जा सकता था। प्रशिक्षण के अन्तिम दिन कक्षा समाप्त होते ही, हम वापस आने के लिए चल पड़े और रात्रि 10 बजे तक घर पहुँच गये। हमारा प्रमाणपत्र कुछ दिन बाद डाक से प्राप्त हुआ था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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