आत्मकथा भाग-4 अंश-46
मेरे कार्यालय सहयोगी
अभी तक मैंने वाशी के अपने कार्यालय सहयोगियों में से केवल श्री भीम प्रसाद की चर्चा की है। अन्य की चर्चा न करना उनके प्रति अन्याय होगा। इसलिए यहाँ मैं अपने प्रमुख सहयोगियों की चर्चा कर रहा हूँ।
इनमें सबसे पहला नाम है श्री विश्वास नाइक का। नाम से स्पष्ट है कि वे मराठी मूल के हैं, लेकिन वास्तव में कर्नाटक के रहने वाले हैं। विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थान हम्फी के निकट तुंगभद्रा नदी के किनारे उनका गाँव है। वे बहुत ही हँसमुख और अच्छे स्वभाव के हैं। काम में बहुत परिश्रमी हैं और विश्वसनीय हैं। कभी भी काम की अधिकता के कारण उनको परेशान होते नहीं देखा गया। उनका ज्ञान भी बहुत अच्छा है। मेरे वाशी में रहने से कुछ समय पहले तक वे उसी कार्यालय में थे। मेरे सामने ही उनका स्थानांतरण मुम्बई की एफसीटीएम शाखा में हो गया था, जहाँ तक जाने के लिए उन्हें खारघर से मुम्बई फोर्ट तक की दूरी लोकल से तय करनी पड़ती थी। हमारे बैंक का विलय इंडियन बैंक में होने के बाद इस समय वे धारवाड़ (कर्नाटक) में वरिष्ठ प्रबंधक के रूप में पदस्थापित हैं और उनके साथ मेरा सम्पर्क बना हुआ है।
दूसरा नाम है श्रीमती दीपिका श्रीवास्तव का। बहुत हँसमुख और कर्मठ हैं। उन्होंने हमारे ही बैंक के एक अन्य आईटी अधिकारी श्री मनीष विश्वकर्मा से विवाह किया है और दोनों के एक बहुत सुन्दर बेटा है। मुम्बई में वे मेरे ही ग्रुप में थीं और सभी कार्याें में मुझे सहयोग दिया करती थीं। आज भी उनके साथ मेरा सम्पर्क बना हुआ है। फिलहाल वे दोनों चेन्नई में पदस्थापित हैं। वर्तमान में दीपिका जी वरिष्ठ प्रबंधक और मनीष जी मुख्य प्रबंधक हैं।
तीसरा नाम है श्रीमती अनुश्री रंजन का। वे मूलतः बिहार की रहने वाली हैं। वे हमारी ही बिल्डिंग में रहती थीं। उनके पति श्री अतुल मुम्बई में किसी प्राइवेट कम्पनी में कार्यरत हैं। अनुश्री पहले सीबीएस प्रोजेक्ट ऑफिस में किसी विभाग में थीं, तब तक मेरा उनके साथ मामूली परिचय था। उनके पिताजी श्री मृदुल शरण मेरे मित्र हैं। वे भोजपुरी फिल्मों में कार्य करते हैं और कवितायें भी लिखते हैं। उनकी कई कवितायें हमारी पत्रिका ‘जय विजय’ में छपी हैं।
बिहार के होने के कारण वे छठ पर्व पूरे जोर-शोर से मनाते हैं। इसके लिए वे बिल्डिंग की छत पर एक बड़े गोल टब में पानी भरकर उसे तालाब का रूप देते हैं, जिसमें खड़े होकर उनकी श्रीमती जी सूर्य को अर्घ देती हैं। जब मैं नवी मुम्बई में नया आया था, तब तक मैंने कभी छठ का पर्व नहीं देखा था। वहीं पहली बार देखा था और बहुत प्रभावित हुआ था। इस पर्व के बाद उन्होंने बिल्डिंग में रहने वाले सभी परिवारों को छठ का प्रसाद दिया था। तभी उनसे मेरा परिचय हुआ। इसके कुछ दिन बाद जब उन्होंने अनुश्री के पुत्र का पहला जन्मदिवस मनाया, तो बड़ा कार्यक्रम किया गया था, जिसमें मैं सपरिवार सम्मिलित हुआ था। दोनों पिता-पुत्री आज भी मेरे प्रति बहुत स्नेह रखते हैं।
इनके अतिरिक्त भी मेरे कई विभागीय सहयोगी रहे हैं, पर उन सबके बारे में बताना सम्भव नहीं है। यहाँ उनमें से कुछ का नामोल्लेख मात्र कर रहा हूँ- सर्वश्री हिमांशु राठौर, मो. बादशाह रजा, सुशील कुमार सिंह, श्रीमती मधुलिका आनन्द, उपासना शाह, राहुल सोनी, एवं अंकित वार्ष्णेय।
पैर में मोच और उसका समाधान
एक बार छत पर योगाभ्यास में जानुशीर्षासन करते हुए जाने कैसे मेरी बायीं की जाँघ की एक नस खिंच गयी अर्थात् अपनी जगह से हट गयी। एकदम जोर का दर्द हुआ, इसलिए मैं योग वहीं छोड़कर अपने फ्लैट में चला गया। संयोग से उन दिनों श्रीमती जी आगरा गयी थीं और मैं अकेला ही था। नीचे जाकर पैर का दर्द इतना बढ़ गया कि मैं लँगड़ाते हुए कुछ पग तो चल लेता था, लेकिन एक मिनट से अधिक खड़ा नहीं रह सकता था। मैंने सामान्य मालिश और सिकाई की, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। संयोग से उस दिन रविवार की छुट्टी थी। मैं दोपहर का खाना स्वयं बनाता था, लेकिन उस दिन नहीं बना सका। किसी तरह लिफ्ट में बैठकर में नीचे गया और एक गार्ड से खाने के लिए कुछ मँगवाया।
यहाँ सुब्बू जी ने मेरी बहुत सहायता की। मैं ऑफिस तो उनके साथ कार में जा ही रहा था, रात्रि का भोजन भी उनके साथ ही कर लेता था। प्रातः का जलपान मैं अंकुरित चनों और दूध का करता था तथा दोपहर का भोजन कैंटीन में जाकर कर लेता था। तीन-चार दिन ऐसे ही चला। मैं किसी मालिश करने वाले की तलाश में था। तभी एक गार्ड ने बताया कि कोपरखैरणे स्टेशन के पास एक अस्पताल है जिसमें हड्डी बैठाने वाले वैद्य बैठते हैं। अगले ही दिन सुबह 8 बजे सुब्बू जी के साथ मोटरसाइकिल पर मैं वहाँ गया। हाड़वैद्य ने मेरे शरीर को कई जगह से ऐंठा और फिर जाँघ का एक व्यायाम कराया, तो नस एकदम सही जगह पर आ गयी। मेरा दर्द बहुत कम हो गया।
फिर मैंने उस जगह गर्म-ठंडी सिकाई की, तो लगभग 15 दिन में दर्द पूरी तरह समाप्त हुआ।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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