आत्मकथा भाग-4 अंश-44
मोना का आईआईएम प्रवेश जून 16
बी.कॉम. करने के बाद हमारी पुत्री आस्था (मोना) का विचार एम.बी.ए. करने का था। एम.कॉम. करने का उसका कोई विचार नहीं था और 3डी एनीमेशन कोर्स का उसे कोई लाभ नहीं मिल रहा था, क्योंकि उसका स्कोप कम है। इसलिए हमने उसे एम.बी.ए. के फ़ॉर्म भरने की अनुमति दे दी। यों तो मुम्बई में एम.बी.ए. कराने वाले कई कालेज हैं, पर उनमें से दो-चार का ही स्तर कुछ अच्छा है। हमने केवल उन्हीं कॉलेजों में मोना से फ़ॉर्म भरवाया। वे सभी अपना अपना टैस्ट लेते हैं। ये टैस्ट दिलवाने मैं मोना के साथ दो बार दादर और दो बार उससे भी दूर एक कॉलेज में गया था। उन लगभग सभी कॉलेजों में मोना का प्रवेश सरलता से हो जाता।
इसके साथ ही मोना ने किसी आईआईएम में प्रवेश के लिए भी प्रवेश परीक्षा दी थी, जिसकी तैयारी वह दो साल से कर रही थी। उसका टैस्ट अच्छा हो गया था और दिल्ली में उसका इंटरव्यू भी ठीक हो गया था। हमें पूरी आशा थी कि किसी अच्छे आईआईएम में उसका प्रवेश हो जाएगा। शीघ्र ही आईआईएम से कॉल आना प्रारम्भ हो गये। टॉप के चार कॉलेजों से मोना को कॉल नहीं आया, लेकिन रायपुर, शिलौंग, रोहतक, इन्दौर जैसे आईआईएमों से उसे कॉल आ गये। हमने इनमें से शिलौंग में प्रवेश दिलाने का लगभग निश्चय कर लिया था। मोना भी वहाँ जाने को उत्सुक थी। तभी अचानक उसे लखनऊ आईआईएम से कॉल आ गया, जो पाँचवें नम्बर का सबसे अच्छा आईआईएम माना जाता है।
हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था। परम पिता ने एक बार फिर हमारे परिवार पर कृपा की थी। निर्धारित दिन से एक दिन पहले हमने लखनऊ जाने के लिए हवाई टिकट बनवा ली। उस समय तक हमारे लखनऊ मंडलीय कार्यालय के प्रमुख श्री प्रदीप कुमार अरोडा जी थे, जो कई वर्ष तक हमारे साथ वाराणसी मंडलीय कार्यालय में रहे थे। उस समय तक वे उप महा प्रबंधक बन चुके थे। मेरे पास उनका सम्पर्क नम्बर था। मैंने उनको कॉल कराया, तो वे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बैंक के स्टाफ कॉलेज में हमारे लिए एक गेस्ट रूम तीन दिन के लिए बुक करा दिया।
निर्धारित दिन हम जाकर मोना का प्रवेश आईआईएम में करा आये। एमबीए दो साल का कोर्स होता है। उसकी फीस होस्टल का खर्च मिलाकर लगभग 15 लाख रुपये होती है। इतनी राशि मैं स्वयं व्यय कर सकता था, लेकिन हमने शिक्षा ऋण लेना अधिक उचित समझा, क्योंकि उसकी ब्याज कम होती है और मुझे उस पर आयकर में छूट भी मिल सकती थी। जहाँ मोना की प्रवेश की काउंसलिंग हो रही थी, वहीं बाहर कई बैंकों ने अपने कैम्प लगा रखे थे, जो प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों को लोन दे रहे थे। हमने स्टेट बैंक से ऋण लेना सबसे अच्छा समझा क्योंकि उसकी शाखा पास में ही थी। शीघ्र ही हमने सारी औपचारिकतायें पूरी कर दीं और उसको ऋण मिल गया। इसके लिए मुझे अपने कार्यालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना था, जो मैंने नवी मुम्बई आकर लिया और भेज दिया।
उसी दिन मोना को होस्टल में कमरा भी मिल गया था और हमने उसको वहाँ रख दिया। हम मोना की जरूरत का सारा सामान साथ लाये थे, इसलिए कोई कष्ट नहीं हुआ। केवल कूलर मोना ने खरीद लिया, जिससे गर्मियों में वहाँ रहना सरल हो गया।
मोना के होस्टलों की एक कॉमन मैस है, जिसमें सभी विद्यार्थी भोजन करते हैं। वहाँ का भोजन बहुत अच्छा होता है। विद्यार्थियों के अलावा उनके माता-पिता यदि आये हों, तो उनको भी वहाँ एक-दो बार भोजन करने की अनुमति है। अधिक दिन कोई नहीं रुक सकता। इस मैस का सारा खर्च विद्यार्थी उठाते हैं, इसलिए अधिक खर्च नहीं पड़ता। सामान्य भोजन के अलावा अन्य वस्तुओं जैसे कॉफी, जूस, फलों की चाट आदि के लिए अलग से नकद राशि तुरन्त देनी होती है।
मोना के प्रवेश और होस्टल की सभी औपचारिकतायें पूरा करके हम अगले ही दिन वापस नवी मुम्बई आ गये। उस समय वहाँ हम दो ही थे। हमारा पुत्र दीपांक उस समय तक अपनी कम्पनी बदल चुका था और चेन्नई में कॉग्नीजेंट में सेवा कर रहा था। उसी कम्पनी ने बीच में उसे 6 माह के लिए आस्ट्रेलिया भी भेजा था और कई बार श्री लंका भी भेजा था। उसे आस्ट्रेलिया तो अच्छा लगा, पर बार-बार श्री लंका जाना पसन्द नहीं आया।
-- डॉ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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