आत्मकथा भाग-4 अंश-43
मुम्बई शहर में मेरी ससुराल पक्ष के कई रिश्तेदार रहते हैं। उनमें एक श्रीमती जी की चचेरी बहिन पूनम हैं, जो अब गोरेगाँव ईस्ट में रहती हैं। पहले वे मुम्बई चैपाटी पर एक सुन्दर फ्लैट में रहती थीं और वहाँ से पूरा मरीन ड्राइव साफ दिखायी देता था, जो रात में बहुत अच्छा लगता था। सबसे पहले हम जब मुम्बई गये थे, तो वहीं ठहरे थे और उनके परिवार के साथ कुछ चीजें देखी थीं, जैसे मछली घर, गेटवे आॅफ इंडिया तथा हैंगिंग गार्डन जो उनके घर के निकट ही है।
इस बार जब आगरा और सूरत से रिश्तेदार वहाँ आये, तो एक दिन पूनम के घर जाने का प्रोग्राम रखा गया। वैसे हम दोनों पहले भी एक-दो बार पूनम के घर जा चुके थे। संयोग से हमारे घर के निकट से सीधी सिटी बसें दंडोसी बस अड्डे तक जाती हैं, जो गोरेगाँव के निकट ही है। हम सब उसी बस में बैठकर वहाँ पहुँच गये। वहाँ पूनम ने बहुत अच्छा भोजन बनाया था, जो सबको बहुत रुचिकर लगा।
पूनम के यहाँ से हम शाम को निकले। हमारा विचार जुहू बीच देखने का था, जो मुम्बई में बहुत प्रसिद्ध है। ओला कैबों में बैठकर हम वहाँ पहुँच गये। तब तक अँधेरा हो चुका था, फिर भी बहुत से लोग समुद्र की लहरों का आनन्द ले रहे थे। हम वहाँ काफी देर रहे। वहीं निकट ही एक फूड बाजार है, जहाँ हर तरह का भोजन मिल जाता है। सबने वहीं अपनी-अपनी पसन्द का भोजन किया और फिर हम कैब करके नवी मुम्बई लौट आये।
अगले दिन हमारा प्रोग्राम नवी मुम्बई के किसी समुद्र तट (बीच) पर जाकर स्नान करना था। नवी मुम्बई में कई बीच हैं, हमने उनमें से कासिद बीच पर जाने का निश्चय किया। साथ ही उससे थोड़ा आगे जंजीरा का किला भी देखना था, जो एक ऐतिहासिक किला है। उसका रास्ता बहुत लम्बा है। कैब से वहाँ पहुँचने में ही दो घंटे से अधिक समय लग गया। यह किला समुद्र तट से मुश्किल से 50 मीटर ही दूर है, लेकिन वहाँ तक नाव से जाना पड़ता है। वहाँ आस-पास केवल मुसलमानों की बस्ती है और नाव भी वे ही चलाते हैं। वास्तव में पूरे किले पर मुसलमानों का ही कब्जा है, जबकि यह ऐतिहासिक स्थान सरकारी नियंत्रण में होना चाहिए और वहाँ तक जाने का पैदल पुल बना देना चाहिए।
वैसे जंजीरा का किला बहुत मजबूत है। उसका दरवाजा ऐसी जगह बना है कि बाहर से कोई व्यक्ति बिना पहरेदारों की सीधी निगाह में आये उसमें घुस ही नहीं सकता। इसकी दीवारें भी बहुत ऊँची हैं, जिन पर कोई चढ़ ही नहीं सकता। इसलिए यह किला अजेय माना जाता था और सैकड़ों साल तक अजेय ही रहा। अब उसके अन्दर मुसलमानों ने कई कब्रें बना ली हैं और एक मसजिद भी है। उसकी देखभाल की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। वह अधिक बड़ा नहीं है, लेकिन सारी सुविधायें उसके अन्दर उपलब्ध हैं। हमने सारा घूम-घूमकर देखा था। अच्छा लगा।
किला देखकर हम लौटे और रास्ते में ही कासिद बीच पर गये। वह बीच बहुत सुन्दर है। वहाँ का पानी काफी साफ था और अधिक गहरा भी नहीं था। इसलिए सब आराम से स्नान कर आये। लेकिन समुद्र से निकलने के बाद सादा जल से भी नहाना पड़ता है, क्योंकि वहाँ समुद्र जल में तेल की मात्रा बहुत होती है। यदि वहाँ से निकलकर सादा जल से स्नान न किया जाये, तो पूरे शरीर में खुजली होती है।
वहाँ स्नान के लिए जल मिलना बहुत कठिन है। कई दुकानदार वहाँ पानी बेचने का धन्धा करते हैं। वे बीस रुपये प्रति बाल्टी पानी दे रहे थे। सबने वही पानी लेकर स्नान किया और कपड़े बदले। वहीं हमने एक रेस्टोरेंट में दोपहर का भोजन किया और फिर लौट आये।
हमारे रिश्तेदारों के पास उस दिन सायंकाल का समय और था। श्रीमती जी उनको वाशी के एक माॅल में खरीदारी कराने ले गयीं, जहाँ हम पहले भी जा चुके थे। वह माॅल वाशी स्टेशन के बिल्कुल सामने है। उसका नाम शायद रसलीला है।
उसी दिन दोपहर बाद मैं अपने साढ़ू साहब को माथेरान घुमाने ले गया। वहाँ तक पहुँचने में कोई कठिनाई नहीं हुई, क्योंकि भीड़ कम थी। हमने पैदल ही सारा माथेरान घूम लिया। हम दूर के उस स्थान पर भी गये, जहाँ पिछली बार मैं नहीं जा सका था। वैसे वहाँ कम लोग ही जाते हैं, क्योंकि वह लगभग दो किमी दूर है और घोड़े वाले वहाँ तक जाने के लिए बहुत पैसे माँगते हैं। हमें वह स्थान बहुत सुहावना लगा। वहाँ से बड़ा झरना अधिक निकट था और साफ दिखाई दे रहा था।
अगले दिन सभी रिश्तेदार अपने-अपने शहर को लौट गये।
-- डॉ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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