आत्मकथा भाग-4 अंश-42

रिश्तेदारों के साथ मुम्बई भ्रमण

अप्रेल 16 में सूरत से हमारे बड़े साढ़ू साहब श्री हरिओम अग्रवाल का परिवार तथा आगरा से हमारे छोटे साढ़ू श्री विजय जिन्दल तथा श्रीमती जी के भाई श्री आलोक गोयल के परिवार मुम्बई घूमने आये। तब तक हमने भी मुम्बई ठीक से नहीं देखा था। इसलिए उनके साथ-साथ हमारा भी भ्रमण हो गया। हम उनके साथ अनेक स्थान देखने गये। हालांकि उनमें से कुछ स्थान हमने बहुत पहले देखे थे। नवी मुम्बई में देखने लायक कुछ नहीं है, इसलिए हमारा पूरा ध्यान मुम्बई देखने पर था। सारी यात्रा हमने ओला कैबों द्वारा की थी, जो हर जगह 5-10 मिनट में पहुँच जाते थे। निर्धारित दिन दोपहर तक सभी आ गये थे।
अगले दिन हम घर से जल्दी निकलकर सबसे पहले सिद्ध विनायक मन्दिर गये, जो दादर में है। वहाँ काफी भीड़ थी, फिर भी हमने सरलता से दर्शन कर लिये। कुछ देर लाइन में अवश्य लगना पड़ा था। वहाँ से हम मछली घर गये, जो मैरीन ड्राइव पर है। बच्चों और बड़ों सभी को वह अच्छा लगा। वहाँ अनुशासन बहुत था। वहाँ से निकलकर हम महालक्ष्मी मन्दिर गये। उससे लगभग 15 वर्ष पहले जब मैं महालक्ष्मी मंदिर गया था, तब से वह बहुत बदल गया था, इतना कि मैं रास्ता भी नहीं पहचान सका।
महालक्ष्मी मंदिर के निकट ही श्रीमती जी के एक ताऊ का परिवार रहता है। उस समय उनकी ताई बहुत बीमार थीं, इसलिए सभी महिलायें उनको देखने चली गयीं। मैं और बच्चे सब मन्दिर में ही बैठे रहे। उनके आने पर सभी निकट में ही हाजी अली की कब्र पर गये। मैं और मेरे साढ़ू भीड़ के कारण नहीं गये, बाहर ही एक पार्क में पेड़ के नीचे बैठे रहे। उनको लौटने में एक घंटे से अधिक लग गया।
सभी के आ जाने पर हम वहाँ से गेटवे ऑफ इंडिया गये। उसको देखने में अधिक समय नहीं लगा, लेकिन हमें एलीफेंटा गुफाओं को देखना था, जो हममें से किसी ने तब तक देखी नहीं थीं। यों तो ये गुफायें नवी मुम्बई के तट के निकट हैं, पर उधर से वहाँ जाने की अच्छी सुविधा नहीं है, इसलिए सभी लोग गेटवे ऑफ इंडिया से ही जाते और लौटते हैं। वहाँ बड़ी नावों (जेट्टी) से जाया जाता है। उसकी टिकट लेने में भी हमें समय लगा, क्योंकि भीड़ बहुत थी। किसी तरह एक बड़ी जेट्टी में बैठ गये और एलीफेंटा गुफाओं पर पहुँच गये। वहाँ एक छोटा सा गाँव है, जो इन गुफाओं की देखभाल करता है।
इन गुफाओं में तरह-तरह की मूर्तियाँ हैं और रहने लायक गुफायें बनी हुई हैं। उनको देखना अच्छा लगता है। हालांकि उन गुफाओं की हालत अच्छी नहीं थी, बहुत भीड़भाड़ और लचर देखभाल के कारण उनकी हालत खराब होती जा रही है। वहाँ का प्रवेश शुल्क भी बहुत है, पर लगता है कि सारा पैसा अधिकारियों की जेब में जाता है। इससे अच्छी गुफायें तो मुम्बई में ही संजय गाँधी नेशनल पार्क में हैं, जहाँ मैं दो बार जा चुका हूँ, एक बार अकेला और एक बार परिवार के साथ। यह पार्क बोरीवली के निकट है, मैं सभी को वह दिखाना चाहता था, परन्तु समय की कमी से कोई नहीं गया।
एलीफेंटा गुफाओं को देखकर हम उसी तरह जेट्टी से गेटवे ऑफ इंडिया लौट आये। वहाँ से हमारा विचार नरीमन पाॅइंट देखने का था। हम कैब से वहाँ पहुँचे और फिर देर तक नरीमन पाॅइंट पर बैठे रहे। वहाँ हल्की सी धूप थी, हालांकि जल्दी ही वह समाप्त हो गयी और मौसम सुहावना हो गया। वहाँ भी काफी भीड़ थी और लोग पत्थरों पर बैठे थे, जो समुद्र के किनारे जमाकर लगाये गये हैं। उन पत्थरों पर बैठना हमें बहुत अच्छा लग रहा था।
उस समय महाराष्ट्र में भाजपा-शिव सेना की सरकार थी। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने वहाँ के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फड़नवीस के साथ यह घोषणा की थी कि मुम्बई में नरीमन पाॅइंट के निकट ही समुद्र के भीतर छत्रपति शिवाजी का स्मारक बनाया जाएगा। हमने दूर से उस जगह का अनुमान लगाया, जहाँ वह स्मारक बनाया जाने वाला था। उस समय तक वहाँ कोई गतिविधि नहीं थी। शायद अब बन रहा हो। जब वह बन जाएगा, तो मैं एक बार उसे देखने अवश्य जाऊँगा।
हमें नरीमन पाॅइंट पर बैठे हुए काफी देर हो गयी थी। अँधेरा होने लगा था, इसलिए हम वहीं से कैब करके अपने घर नवी मुम्बई आ गये। पूरे दिन घूमने से काफी थकान हो गयी थी, इसलिए हमने बाहर ही एक रेस्टोरेंट में भोजन कर लिया और सो गये।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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