आत्मकथा भाग-4 अंश-41

कार्यालय में उथल-पुथल

मुझे नवी मुम्बई आये 6-7 महीने ही हुए थे कि हमारे कार्यालय में बहुत उथल-पुथल हुई। हमारा विभाग आधा ऊपर और आधा नीचे दो मंजिलों पर बैठता था। इसी तरह एक प्राइवेट कम्पनी एफएसएस के लोग भी दोनों मंजिलों पर बँटे हुए थे। इससे प्रायः कठिनाइयाँ होती थीं। इसलिए एक ही विभाग को एक ही मंजिल पर लाने का निश्चय किया गया। इसके लिए खाली पड़े हुए स्थान पर, जिसका उपयोग अभी तक स्टोर रूम की तरह होता था, नये काउंटर बनवाये गये। एफएसएस के लोगों को वहाँ बैठाया गया।
उनके हटने से जो स्थान खाली हुआ, उसमें हमारे विभाग के सभी लोगों को एडजस्ट किया गया। मेरे लिए एक छोटा सा केबिन बनाया गया। इसी तरह एक केबिन श्रीमती स्वरूपा रानी के लिए बनाया गया। तब तक श्री भीम प्रसाद का स्थानांतरण हो चुका था। उनकी जगह हमारे डीआरएस लखनऊ के पुराने साथी श्री ब्रजेश दोहरे आये, जिनका उसी समय प्रोमोशन हुआ था। मेरे ही सामने उनको भी बैठाया गया। इनके अलावा एक एजीएम भी हैडऑफिस से वहाँ आये, क्योंकि हमारे पिछले एजीएम श्री बाईलुंग प्रोमोशन पाकर हैडऑफिस चले गये थे।
उनकी जगह जो आये थे, वे थे- श्री इन्दु प्रकाश सिंह, संक्षेप में श्री आई.पी सिंह। एक अच्छा केबिन उनके लिए खाली पड़ा हुआ था। उसे साफ करके और कुछ सुविधायें जोड़कर उनके लायक बना दिया गया। वे बहुत सज्जन हैं। मूल रूप से वाराणसी के निवासी हैं और अवकाशप्राप्ति के बाद उन्होंने वाराणसी में ही अपना मकान बनाया है और अब वहीं रहते हैं। वे मेरे साथ योग करते थे। उनके साथ उनकी पत्नी श्रीमती पुष्पा सिंह भी योग किया करती थीं। वे दोनों नियमित योग करने आते थे।
पुष्पा जी पिछले 5 साल से योग कर रही थीं, पर उन्होंने मुझे बताया कि उनकी कमर का दर्द ठीक नहीं हो रहा है। मैंने कारण का पता लगाया तो मुझे पता चल गया कि पिछले योगशिक्षक ने उनको सही व्यायाम और आसन नहीं बताये हैं और उनके बैठने का तरीका भी गलत है। मैंने उनको बैठने का सही तरीका बताया और कुछ ऐसे व्यायाम कराये, जिनसे उनकी कमर का दर्द दो माह में ही ठीक हो गया। तब से वे दोनों प्रायः स्वस्थ ही रहते हैं।
पिताजी का देहावसान तथा पंत जी से भेंट
25 फरवरी 2016 को मैं रोजाना की तरह कार्यालय जाने की तैयारी कर रहा था। जलपान मैं कर चुका था और निकल ही रहा था कि हमारी छोटी भाभीजी का फोन आ गया कि पिताजी का आज सुबह देहान्त हो गया है। वे काफी दिनों से बहुत कमजोर हो गये थे। सुनना और बोलना पूरी तरह बन्द था, देखना भी कम हो गया था। किसी तरह बैठकर चलते हुए बाथरूम तक चले जाते थे। यह हालत लगभग एक साल से थी। उस समय उनकी आयु लगभग 92 साल की थी। फरवरी में ठंड के दिनों में उनका सुबह किसी समय देहान्त हुआ, इसका पता 9 बजे चला। तभी भाभी जी ने हमें फोन कर दिया।
मैंने तत्काल अपने कार्यालय में सूचना भेज दी कि मैं अपने पिताजी के देहान्त के कारण आगरा जा रहा हूँ। फिर हमने अपने पुत्र को फोन करके हवाई जहाज में टिकट बुक करा ली। हमें 2 बजे की उड़ान मिली। हम लगभग साढे 12 बजे हवाई अड्डे पहुँच गये। उड़ान समय पर थी।
मुम्बई एयरपोर्ट पर मेरे एक ब्लाॅगर मित्र श्री चन्द्रशेखर पन्त जीवीके नामक कम्पनी में डीजीएम थे। यह कम्पनी ही उस एयरपोर्ट का रखरखाव करती थी। मैंने उनको सूचना दी कि मैं एयरपोर्ट आ रहा हूँ, तो वे तत्काल ही हमसे मिलने आ गये। पिताजी के निधन के शोक में भी हमें उनसे मिलकर प्रसन्नता हुई। मुम्बई एयरपोर्ट में एक जगह बहुत सुन्दर दर्शनीय स्थान बनाया गया है। उन्होंने हमें बड़े चाव से वह सब दिखाया, जो हमने पहले नहीं देखा था। हमारी उड़ान का समय होने तक पन्त जी हमारे साथ ही रहे। फिर जहाज में बैठने का समय होने पर हमसे विदा लेकर गये। वे अच्छे लेखक और हिन्दू राष्ट्रवादी हैं। फेसबुक और व्हाट्सएप पर बहुत सक्रिय रहते हैं। आजकल वे बंगलौर में हैं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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