आत्मकथा भाग-4 अंश-40
श्री सचिन सोनी
जब मैं नवभारत टाइम्स में नियमित ब्लाॅग लिखा करता था, तब मेरे एक पाठक या प्रशंसक मेरे घनिष्ठ मित्र बने। वे हैं श्री सचिन सोनी। पहले वे अनिल अम्बानी की एक कम्पनी में प्रबंधक थे और बाद में किसी अन्य कम्पनी में मुख्य प्रबंधक होकर दिल्ली चले गये थे। मेरे ब्लाॅग लेखन के समय वे दिल्ली में ही सपरिवार रहते थे। एक बार मुझे दिल्ली जाने का अवसर मिला और मैं अपने एक निकट सम्बंधी के यहाँ उत्तम नगर में ठहरा था, तो सचिन जी तथा एक अन्य ब्लाॅगर मित्र श्री कमल कुमार सिंह वहाँ मुझसे मिलने आये थे। उनसे मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा था।
जब मेरा स्थानांतरण नवी मुम्बई हो गया, तो संयोग से सचिन जी ने भी उन्हीं दिनों कम्पनी बदलने का निश्चय किया। वास्तव में उन्हें मुकेश अम्बानी की कम्पनी में अधिक ऊँची पोस्ट पर आने का अवसर मिल रहा था, जहाँ वे पहले कार्य कर चुके थे। मुकेश अम्बानी उन दिनों जिओ को लाँच करने वाले थे और उन्हें योग्य व्यक्तियों की तलाश थी। वे सचिन जी से पहले से प्रभावित थे, अतः आग्रह करके उन्हें अपनी कम्पनी में लाये थे।
सचिन जी का कोपरखैरणे (नवी मुम्बई) में पहले से एक फ्लैट था, जो उस समय किराये पर उठा हुआ था। उन्होंने अपने किरायेदार से वह फ्लैट खाली करा लिया और फिर उसे ठीक कराकर उसमें रहने लगे। सुखद संयोग से उनका वह फ्लैट हमारे बैंक के फ्लैट के बिल्कुल बगल में था, अतः हमें सचिन जी के कई बार दर्शन हो जाते थे। उनकी श्रीमतीजी बहुत अच्छे स्वभाव की घरेलू महिला हैं और उनके दो योग्य पुत्र हैं, जो देखने में कमजोर लगते हैं, परन्तु काफी स्वस्थ हैं।
जब सचिन जी नवी मुम्बई में रहने लगे, तो हमारे परिवार भी एक दूसरे के निकट आये। उनके पास हुंडई के क्रेटा माॅडल की नई-नकोर (अंग्रेजी में ब्रांड न्यू) कार थी, जिसमें हम उनके साथ कई जगह घूमने गये थे। एक बार तो हम उनके ऑफिस परिसर को भी देखने गये थे, जो घणसोली के निकट ऐरोली में बहुत विस्तृत स्थान में फैला हुआ है। वहीं जिओ का प्रधान कार्यालय है। वह बहुत सुन्दर और खुली-खुली जगह है, जिसमें अनेक बहुमंजिली इमारतों में मुकेश अम्बानी की विभिन्न कम्पनियों के कार्यालय हैं। खेलने-कूदने और मनोरंजन के भी अनेक साधन हैं।
दूसरी बार हम उनके साथ नेरुल के निकट एक पहाड़ी पर बने हुए शिवधाम मन्दिर गये थे, जिसका रास्ता पहाड़ पर सर्पिलाकार है और ऊपर मन्दिर के बराबर तक जाता है। बड़ी सुहावनी जगह है। वहाँ जाकर हमें अच्छा लगा। वहाँ का अनुशासन भी अच्छा था, अधिक भीड़भाड़ भी नहीं थी। मंदिर से लौटते हुए हम रास्ता भूल गये थे। थोड़ा भटकने के बाद सही रास्ते पर आये। लौटते-लौटते हमें बहुत देर हो गयी थी, इसलिए हमने वाशी में भगत ताराचन्द नामक प्रसिद्ध होटल में भोजन किया। इस होटल का नाम मुझे सचिन जी ने ही बताया था।
फिर एक बार हम उनके साथ अष्टविनायक मन्दिर देखने गये थे। यह मुम्बई से पुणे की ओर लगभग 70 किलोमीटर दूर है। उस क्षेत्र में इस मन्दिर की बहुत मान्यता है और दूर-दूर से लोग इसको देखने आते हैं। जिस दिन हम गये थे, उस दिन भीड़ अधिक नहीं थी, इसलिए आराम से सब देख आये।
सचिन जी के साथ हमारा विचार किसी दिन शनि शिंगणापुर और उसके ही निकट भीमाशंकर धाम जाने का था, पर कई कारणों से बार-बार टल गया। इस मन्दिर का नाम उन दिनों अखबारों में बहुत छप रहा था, क्योंकि उसमें महिलाओं को निकट से पूजा करने का अधिकार नहीं दिया जाता। मुझे अपनी श्रीमतीजी के साथ वहाँ जाने में कोई आपत्ति नहीं थी। मैं ऐसी यात्राओं को भ्रमण के रूप में ही लेता हूँ। संयोग से पहले बरसात के कारण हम नहीं जा पाये और वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद जाने का निश्चय किया। लेकिन तभी मेरा स्थानांतरण हो गया, इसलिए वह योजना धरी की धरी रह गयी।
सचिन जी मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के मूल निवासी हैं। वे बताते हैं कि वहीं उनके निकट ही पातालकोट नामक जगह है, जो समुद्र तल से दो-तीन किलोमीटर नीचे बसा हुआ एक गाँव है। वहाँ जाने का रास्ता भी बहुत जोखिम भरा है, फिर भी लोग वहाँ जाते हैं और वहाँ के मूल निवासियों का रहन-सहन देखते हैं। मेरी बहुत इच्छा है एक बार वहाँ जाने की, जो कई कारणों से अभी तक पूरी नहीं हुई है। अब तो उसकी संभावना और भी कम हो गयी है।
श्री सचिन सोनी से मेरा सम्पर्क आज भी बना हुआ है। लेकिन उनके पुनः दर्शन कब होंगे यह नहीं कहा जा सकता।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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