आत्मकथा भाग-4 अंश-39

खारघर यात्रा तथा कुछ पुराने साथियों से भेंट

श्री आर.के. श्रीवास्तव की चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ। वे एच.ए.एल. में हमारे बाॅस थे और उनके साथ हमारे अच्छे सम्बंध थे। परन्तु वे मुझसे पहले ही एच.ए.एल. छोड़ गये थे और एक-दो कम्पनियाँ बदलने के बाद सिडबी बैंक में बहुत ऊँचे पद पर पहुँच गये थे। मैं जब लखनऊ में था, तो वे भी वहीं थे और मैं दो तीन बार उनसे मिल चुका था। वे वहीं से अवकाशप्राप्त करके नवी मुम्बई के खारघर में सेटिल हो गये थे, जहाँ उन्होंने एक फ्लैट तब खरीदा था, जब वे मुम्बई में पदस्थापित थे।
खारघर हमारे मौहल्ले कोपरखैरणे से लोकल ट्रेन से केवल 20 मिनट के रास्ते पर है। इसलिए मैं उनसे मिलना चाहता था। एक बार उन्होंने मुझे सूचित किया कि उनकी बड़ी पुत्री प्रूडी उनके पास आयी हुई है, इसलिए मैं आकर सबसे मिल सकता हूँ। यह पता चलते ही मैं एक रविवार को लोकल में चढ़कर खारघर पहुँच गया। स्टेशन से बाहर वे मुझे लेने आये हुए थे। उनके साथ मैं उनके फ्लैट पर पहुँचा।
उनका फ्लैट एक पहाड़ी पर थोड़ी ऊँचाई पर बना हुआ है। आसपास का दृश्य मनोहारी है। देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। उनकी पुत्री प्रूडी को अनेक वर्ष बाद देखकर भी अच्छा लगा, हालांकि न तो मैं उसे पहचान सका और न वह मुझे, क्योंकि अन्तिम बार जब मैंने उसे देखा था, तो वह केवल 4 साल की थी। वह अपने पति और दो पुत्रों के साथ अमेरिका में रहती हैं। श्रीवास्तव जी और भाभी जी उनसे मिलने अमेरिका जाते रहते हैं और गर्मियों के कई महीने प्रायः वहीं बिताते हैं।
यह मेरी खारघर की पहली यात्रा थी। वहाँ मेरे कई पुराने साथी भी रहते थे। उनमें एक श्री महेश्वर सिंघा थे, जो आईआरटी पंचकूला में मेरे साथ थे और एक श्री वीरभद्र सिंह थे, जो डीआरएस लखनऊ में मेरे साथ थे। मेरी इच्छा इन दोनों से मिलने की भी थी, क्योंकि बार-बार उधर आना नहीं हो सकता था। लगभग एक घंटा श्रीवास्तव जी के साथ बिताने के बाद मैंने उनसे निवेदन किया कि मुझे श्री सिंघा के फ्लैट के निकट छोड़ दीजिए, जो वहाँ से अधिक दूर नहीं था। उन्होंने वैसा ही किया। छुट्टी का दिन होने के कारण श्री सिंघा घर पर ही थे और अपनी बिल्डिंग के गेट पर आकर मुझे ले गये। उनकी श्रीमती जी से मैं लखनऊ में एक-दो बार मिल चुका था, क्योंकि वे वहीं की हैं।
दोपहर का भोजन मैंने श्री सिंघा के साथ ही किया। फिर मैं वीरभद्र सिंह से मिलने गया। उनका फ्लैट वहाँ से अधिक दूर नहीं था, लेकिन खोजने में समय लगा क्योंकि सिक्योरिटी वाले गेट पर बहुत परेशान कर रहे थे और मुझे गलत गेट पर भेज दिया था। किसी तरह वीरभद्र सिंह तक सूचना पहुँची और वे मुझे लेने आये। उनका फ्लैट भी अच्छा था। लगभग एक घंटा उनके साथ भी बिताने के बाद अंधेरा होने वाला था, इसलिए मैं वापस आने लगा। एक सिटी बस में बैठकर मैं खारघर स्टेशन आया और फिर वहाँ से लोकल में बैठकर अपने निवास पर पहुँच गया।
फ्लैट मिलना
अभी तक मैं बैचलर फ्लैट में ही रह रहा था, क्योंकि कोई फ्लैट वहाँ खाली नहीं हुआ था। जब अक्टूबर भी आ गया, तो मुझे चिन्ता हुई क्योंकि नवम्बर में हमें लखनऊ वाला फ्लैट खाली करना था। इसलिए एक दिन मैंने सीबीएस प्रोजेक्ट ऑफिस के मुख्य प्रबंधक प्रशासन श्री राव से कहा कि मुझे फ्लैट चाहिए। उन्होंने कहा कि एक फ्लैट खाली हो रहा है वह आपको दे देंगे। वास्तव में एक सज्जन का स्थानांतरण हो गया था और उनका फ्लैट खाली था, हालांकि उनका थोड़ा सामान वहाँ रखा था। इसके लगभग 15 दिन बाद मुझे फ्लैट की चाबी मिल गयी।
मैंने सुब्बू जी के साथ वह फ्लैट खोलकर देखा तो बहुत गन्दा लगा। दीवालों पर पिछले सज्जन के बच्चों ने पेंसिल से बहुत फालतू बातें लिख दी थीं और चित्र आदि खींच दिये थे। बाथरूम की दीवारें भी बहुत गन्दी थीं और एक-दो जगह से तो पलस्तर भी उखड़ गया था। यह देखकर मैंने श्री राव से कहा कि फ्लैट को कुछ मरम्मत और पुताई की आवश्यकता है। वे बहुत सज्जन थे। उन्होंने कुछ ही दिनों में फ्लैट की कामचलाऊ मरम्मत करा दी और पुताई भी करा दी, हालांकि दरवाजों पर पेण्ट नहीं कराया। परन्तु उसकी अधिक आवश्यकता नहीं थी, इसलिए मैंने भी जोर नहीं दिया।
वह नवम्बर 2015 का महीना था। फ्लैैट मिल जाने के बाद मैं लखनऊ चला गया और अपना सामान तथा परिवार नवम्बर के अन्तिम सप्ताह में नवी मुम्बई ले आया। तब तक मोना की भी 3डी एनीमेशन की अन्तिम परीक्षा हो चुकी थी। बी.काॅम. उसने पहले ही उत्तीर्ण कर लिया था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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