आत्मकथा भाग-4 अंश-38
व्हाट्सएप में कई समूह बनाना
मैं नियमित योग तो कराता ही था, योग करने वालों को तथा अन्य बहुत से लोगों को चिकित्सा परामर्श भी देता था। उस समय तक एसएमएस का प्रचलन कम हो गया था और व्हाट्सएप संदेशों का प्रचलन बढ़ रहा था, जिसमें नेट लेना पड़ता है, लेकिन बहुत सुविधाजनक होता है। मैंने भी एसएमएस का उपयोग करना बहुत कम कर दिया और व्हाट्सएप का उपयोग अधिक से अधिक करने लगा। चिकित्सा परामर्श देने के लिए मैंने व्हाट्सएप पर एक ग्रुप बना लिया और अपने परिचितों को उसमें जोड़ा। धीरे-धीरे उसके सदस्यों की संख्या बढ़ने लगी।
इसीतरह मैंने राजनीति में रुचि रखने वालों के लिए एक राजनैतिक चर्चा समूह भी बनाया, जिसमें विभिन्न प्रकार के विचार प्रकट किये जाने लगे। धर्म सम्बंधी बातों की चर्चा के लिए मैंने धर्म और संस्कृति समूह भी बना लिया जिसमें धार्मिक और जीवनोपयोगी ज्ञान की बातें आने लगीं। मेरा प्रयास यह होता था कि सभी लोग अपनी रुचि के विषय पर ही चर्चा करें और उन समूहों में सक्रिय रहें। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन समूहों का एकमात्र एडमिन मैं स्वयं रहता था और सदस्यों की पोस्टों पर नजर रखता था।
मैंने अपने परिवारियों का भी एक समूह बना रखा है। इसके अतिरिक्त एक समूह ससुराल पक्ष के रिश्तेदारों का है। इन समूहों के द्वारा हम सब आपस में जुड़े रहते हैं। पहले तो स्मार्टफोन और व्हाट्सएप गिने चुने ही थे, लेकिन धीरे-धीरे सबके पास अपने-अपने स्मार्ट फोन हो गये, जिससे आपसी सम्पर्क में रहना सरल हो गया। इस समय मैं लगभग 25 व्हाट्सएप समूहों का संचालन कर रहा हूँ, जो विभिन्न विषयों पर हैं, जैसे- स्वास्थ्य, राजनीति, धर्म-संस्कृति, गौसेवा, रक्तदान, साहित्य, हास्य, विविध आदि।
पुस्तक लेखन अधूरा प्रोजेक्ट
जब मैं नवी मुम्बई में अकेला ही था, तो मेरे पास पुस्तक लिखने का कोई काम नहीं था। पुरानी पुस्तकों में प्रकाशकों के निर्देशों के अनुसार सुधार तो मैं करता रहता था। उन्हीं दिनों मुझे एक साथ 6 पुस्तकें लिखने का काम प्राप्त हुआ। यह एक बडा प्रोजेक्ट था, जिसमें हिन्दी में पुस्तकों की एक श्रृंखला लिखनी थी। अंग्रेजी में वे पुस्तकें उपलब्ध थीं और मुझे उनको हिन्दी में रूपांतरित करना था। यह प्रोजेक्ट मुझे अपने ब्लाॅगर मित्र श्री रंजन माहेश्वरी के सौजन्य से प्राप्त हुई थी। इसे पूरा करने का समय सीमित ही था, लगभग 6 माह। मैंने सोचा था कि मैं इतने समय में इनको पूरा कर लूँगा, लेकिन कई कारणों से मैं उस गति से कार्य नहीं कर पाया, जिस गति से पहले किया करता था। यह प्रोजेक्ट 6 माह और आगे बढ़ी, परन्तु उस एक वर्ष की अवधि में मैं केवल तीन पुस्तकें पूरी कर पाया।
प्रोजेक्ट की धीमी गति के कारण आयोजकों ने उसे रद्द कर दिया और मेरा किया हुआ सारा कार्य व्यर्थ चला गया। मुझे इसका बहुत दुःख हुआ, लेकिन इसमें आयोजकों की कोई गलती नहीं थी, यह मेरी ही कमी थी कि मैं प्रोजेक्ट को समय से पूरा नहीं कर पाया। वैसे पुस्तकों के लेखन में देरी हो जाना सामान्य बात है, क्योंकि कई कारणों से कार्य में व्यवधान आता है। मैं यह कार्य पार्टटाइम आधार पर ही करता था, क्योंकि दिनभर ऑफिस में व्यस्त रहता था, वहाँ पुस्तक लेखन करना सम्भव नहीं होता, भले ही कार्य का लोड कितना भी कम हो। इसका कारण यह है कि पुस्तक लेखन के लिए जिस शान्त वातावरण की आवश्यकता होती है, वह कार्यालय में कभी उपलब्ध नहीं हो सकता, वहाँ अधिक से अधिक एकाध लेख ही लिखा जा सकता है, वह भी टुकड़ों में। इसलिए मैं प्रातः जल्दी उठकर योग करने जाने से पहले ही दो घंटे कार्य कर लेता था और कभी-कभी रात को सोने से पहले भी एकाध घंटे काम करता था। इसी तरह मैंने अपनी सभी पुस्तकों को लिखा था और प्रकाशकों की अपेक्षा के अनुसार निर्धारित समय में पूरा किया था, हालांकि कभी-कभी देरी भी हो जाती थी।
इस समय मेरे पास पुस्तकें लिखने का कोई काम नहीं है। मैं अब यह काम लेता ही नहीं। पर कोई प्रकाशक बहुत पीछे पड़ जाता है, तो ले लेता हूँ। इस समय मेरा ध्यान केवल प्राकृतिक चिकित्सा करने और अपनी पत्रिका को चलाने में रहता है, जिनमें मेरा बहुत समय लग जाता है। फेसबुक और व्हाट्सएप में भी समय लगता है। इसलिए मुझे अब पुस्तकें न लिखने का कोई खेद नहीं है। अपना स्वास्थ्य मेरे लिए अधिक महत्वपूर्ण है।
-- डॉ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें