आत्मकथा भाग-4 अंश-37

मुम्बई का हाल

मुम्बई एक जिन्दादिल शहर है। यहाँ के लोग मेहनती हैं और अपनी आजीविका के लिए कोई भी परिश्रम का कार्य करने में संकोच नहीं करते, इसलिए यहाँ काम की कमी नहीं है। कोई व्यक्ति और कुछ न कर पाये, तो केवल भेलपूरी बेचकर भी अपनी आजीविका कमा सकता है। वहाँ उत्तर भारतीयों की भरमार है, विशेष रूप से मुम्बई में। नवी मुम्बई यों तो कोंकण क्षेत्र में आता है, लेकिन वहाँ भी उत्तर भारतीय पर्याप्त संख्या में हैं। यहाँ के लगभग सभी लोग हिन्दी समझते और बोल लेते हैं, हालांकि अपने घर पर वे अपनी मातृभाषा कोंकणी में ही बात करते हैं।
वैसे यहाँ महानगरों की तरह भागदौड़ बहुत है। लोग अपने काम पर जाने और लौटने की भागदौड़ में लगे रहते हैं। रहने की समस्या यहाँ विकराल है। इसलिए जो लोग अपने काम की जगह पर रहने का खर्च नहीं उठा सकते, वे दूर किसी सस्ती-सी जगह पर रहते हैं और वहाँ से लोकल ट्रेन से अपने काम पर जाते हैं। ऐसे दसियों लाख लोग प्रतिदिन लोकल ट्रेनों में यात्रा करते हैं। लोकल ट्रेनों का किराया मामूली-सा ही है, इसलिए सब लोग वहन कर लेते हैं।
लेकिन मुम्बई की जो बात मुझे सबसे अधिक पसन्द आयी, वह है यहाँ का मौसम। यहाँ वर्ष में तीन महीने जून-जुलाई-अगस्त जमकर बरसात होती है। इन दिनों में बरसात कभी भी बिना नोटिस दिये आ सकती है। जब भी बारिश होती है, तो मुम्बई की अधिकांश सड़कों पर पानी भर जाता है, जो निकलने में एक दिन से लेकर एक सप्ताह तक लगा देता है। इसलिए बरसात के दिनों में मुम्बई में रहना बहुत कठिन हो जाता है। सौभाग्य से नवी मुम्बई में बरसात तो उतनी ही होती है, पर उसमें पानी बिल्कुल नहीं भरता। बरसात होने पर एक-दो घंटे में ही सारा पानी निकल जाता है। इसलिए बरसात के दिनों में वहाँ कोई कष्ट नहीं होता।
वर्ष के शेष महीनों में मुम्बई और नवी मुम्बई का मौसम लगभग एक जैसा बना रहता है। जब उत्तर भारत में भयंकर ठंड पड़ती है, तो मुम्बई और आस-पास बहुत मामूली ठंड होती है, जिसे मेरे जैसे लोग बिना स्वेटर के झेल सकते हैं। मुझे याद नहीं आता यदि मैंने नवी मुम्बई में रहते हुए किसी दिन स्वेटर पहना हो। गर्मी के दिनों में यहाँ दोपहर को बहुत गर्मी पड़ती है, क्योंकि धूप तेज होती है, लेकिन दिन के शेष समय बिल्कुल गर्मी मालूम नहीं पड़ती। साधारण पंखे या कूलर से काम चल जाता है। हालांकि बहुत से लोग एसी लगवा लेते हैं।
हम लोग छत पर योग करते थे, तो कभी-कभी बरसात के कारण योग करने में व्यवधान आता था। इसका समाधान हमने यह निकाला कि लिफ्टों के लिए जो बरामदा बना हुआ है, वह ढका रहता था। हम वहाँ बैठकर योग कर लेते थे। कभी कभी वहाँ भी तेज बारिश के कारण पानी भर जाता था, तो हम योग स्थगित कर देते थे या खड़े-खड़े थोड़ा बहुत व्यायाम करके चले जाते थे।
शेष दिनों में छत पर योग करने में कोई व्यवधान नहीं आता था। वहाँ ठंडी-ठंडी हवा भी मिलती थी, जिससे प्राणायाम करना अच्छा लगता था। परन्तु कई बार पास की सड़क पर सफाईवाले कूड़ा जलाते थे, जिसका धुँआ वहाँ फैल जाता था और परेशान करता था। ऐसी हालत में हम प्राणायाम छोड़ देते थे।
बाथरूम में फँसना
हमारे फ्लैटों के बाथरूमों में ऐसे ताले लगे हुए थे, जो भीतर से ही बटन दबाकर लाॅक हो जाते थे। फिर उनको बाहर से नहीं खोला जा सकता था। ऐसे ताले प्रायः लगातार प्रयोग में लाने के कारण ढीले हो जाते हैं और कई बार खराब भी हो जाते हैं। इसलिए बहुत से लोग इन तालों को अपने बाथरूमों से निकलवा देते हैं, ताकि उनके बच्चे बाथरूम में फँस न जायें।
मैं जिस बैचलर फ्लैट में रहता था, वहाँ के बाथरूम में वैसा ही ताला लगा हुआ था और वह निकलवाया नहीं गया था। एक दिन जब मैं स्नान के लिए उसमें गया, तो बाहर निकलते समय उसका लाॅक नहीं खुला। मैंने हर तरह से कोशिश की, परन्तु दरवाजा नहीं खुला। मेरे रूममेट बिराट सिंह ने भी बाहर से कोशिश की, परन्तु दरवाजा नहीं खुला। तब मैंने उनसे कहा कि आप सिक्योरिटी को बता दीजिए। थोड़ी देर बाद सिक्योरिटी वाले आये। उन्होंने हथौडे मार-मारकर काफी देर में दरवाजे का ताला तोड़ा और तब मैं बाहर निकला। उस दिन मुझे ऑफिस जाने में आधा घंटे की देरी हो गयी थी। इसके बाद मैं बहुत सावधान रहने लगा था और दरवाजे को भीतर से लाॅक नहीं करता था।
-- डॉ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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