आत्मकथा भाग-4 अंश-36

जन्माष्टमी पर गोविन्दा दर्शन

जन्माष्टमी पर दही की हाँडी फोड़ने के दृश्य हमने टीवी पर बहुत बार देखे थे, जिनमें युवक पिरामिड बनाकर बहुत ऊँचाई पर लटकायी गयी दही हाँडी को फोड़ा करते हैं। इस दृश्य को प्रत्यक्ष देखने का मेरा बहुत मन था। इसलिए जन्माष्टमी वाले दिन मैं रात्रि को भोजन करके इसे देखने निकला। यों तो यह कार्यक्रम वहाँ लगभग हर मौहल्ले में होता है, लेकिन कोपरखैरणे में सबसे बड़ा कार्यक्रम डी-मार्ट चौराहे के निकट एक विद्यालय के बड़े परिसर में होता है। ऐसा ही एक कार्यक्रम वहाँ से थोड़ी दूर कोपरखैरणे गाँव में भी होता है।
वहाँ दोनों जगह एक क्रेन से दही की हाँडी लटकायी गयी थी, जो काफी ऊँचाई पर थी। वहाँ पिरामिड बनाने वाले युवकों के दल छोटे-बड़े पिरामिड बना रहे थे। इन युवकों को गोविन्दा कहा जाता है। मैंने देखा था कि वहाँ दूर-दूर से गोविन्दाओं की टोलियाँ आ रही थीं, जो सब एक जैसी पोशाक पहने होते थे। वे टोलियाँ अलग-अलग पिरामिड बनाने की कोशिश कर रही थीं। वे लोग पिरामिड तो बना लेते थे, पर कोई दही हाँडी तक नहीं पहुँच पा रहा था। पता चला कि बाद में क्रेन को थोड़ा नीचा करके दही हाँडी फुड़वायी जाती है। यह कार्यक्रम रात 12-1 बजे तक चलता है। मैं वहाँ लगभग 11 बजे तक रहा। फिर मुझे नींद आने लगी, तो लौट आया।
गणपति पूजा
महाराष्ट्र में गणपति पूजा एक बडा त्यौहार होता है। इसमें मुख्य उत्सव गणेश चतुर्थी के दिन किया जाता है, लेकिन इसकी तैयारियाँ कई दिन पहले से प्रारम्भ हो जाती हैं और चतुर्थी के एक-दो दिन बाद मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। हमारे आवासीय परिसर में भी गणपति पूजा पूरे जोर-शोर से की जाती है। यह तीन दिन लगातार चलता है और किसी एक अधिकारी को सपत्नीक इसका यजमान बनाया जाता है, जिनको प्रतिदिन सुबह-शाम दो बार पूजा में भाग लेना होता है। पहली बार जब मेरे सामने यह कार्यक्रम किया गया, तो मैं प्रायः दर्शक की भूमिका में था। इस कार्यक्रम का खर्च परिसर में रहने वाले सभी अधिकारी मिलकर उठाते हैं और उसके लिए एक समिति बनायी जाती है।
इन तीनों दिन रात्रि के भोजन का प्रबंध परिसर में ही सामूहिक रूप से किया जाता है। हमारे कार्यालय की कैंटीन के संचालक राजन जी तीनों दिन अपने कर्मचारियों को वहाँ लाकर भोजन बनवाते हैं, जो बहुत अच्छा होता है। उसमें एक दिन चाइनीज भोजन, एक दिन दक्षिण भारतीय भोजन और एक दिन उत्तर भारतीय भोजन होता है। तीसरे दिन का जलपान भी वहीं होता है, जिसमें कई चीजें बनायी जाती हैं।
इस कार्यक्रम में बच्चों की कुछ प्रतियोगितायें भी रखी जाती हैं, जैसे गायन, नृत्य और चित्रकला प्रतियोगिता। पहली बार मुझे इसमें चित्रकला प्रतियोगिता के दो निर्णायकों में से एक बनाया गया। मैंने सभी चित्रों को ध्यानपूर्वक देखकर तीन विजेताओं का चयन किया था।
तीसरे दिन गणपति पूजा सम्पन्न होने के बाद रात्रि को गणपति की मूर्ति का विसर्जन किया गया था। हम मूर्ति को गाजे-बाजे के साथ नृत्य करते हुए एक मैटाडोर में रखकर कोपरखैरणे के तालाब तक ले गये थे, जिसमें एक घंटे से भी अधिक समय लगा था। वहाँ नगरपालिका की ओर से मूर्ति विसर्जन की अच्छी व्यवस्था थी। लोग अपनी मूर्तियों को अंतिम पूजा करने के बाद पालिका के कर्मचारियों को दे देते थे, जो उसे एक नाव में रखकर तालाब के बीच में ले जाते थे और उलट देते थे। इसके लिए नगरपालिका थोड़ा सा शुल्क लेती थी। कहीं कोई हबड़-धबड़ नहीं थी। किसी को भी तालाब में भीतर घुसने की अनुमति नहीं थी। सब कुछ बहुत शान्ति से निपट जाता था।
मूर्ति विसर्जन से लौटकर सभी भोजन करते थे और इसके साथ ही यह कार्यक्रम समाप्त हो जाता था।
तीसरे वर्ष मुझे भी सपत्नीक इसका यजमान बनने का अवसर मिला। हालांकि मैं मूर्तिपूजा नहीं करता, लेकिन श्रीमती जी की संतुष्टि के लिए और अन्य सज्जनों के आग्रह का सम्मान करने के लिए मैं इसका यजमान बन गया। कुछ इसलिए भी कि मेरा स्थानांतरण आदेश आ चुका था और यह यजमान बनने का हमारा अन्तिम अवसर था। हमने तीनों दिन पूजा में भाग लिया था, जिसे एक पंडित जी कराते थे।
यहाँ यह बता देना उचित होगा कि मुम्बई में हमारे उत्तर भारत की तरह पंडितों का मिलना बहुत कठिन होता है। वास्तव में यहाँ पंडितों ने, जो मुख्यतः उत्तर प्रदेश के होते हैं, अपने समूह बना रखे हैं, ठीक वैसे ही जैसे अदालतों में कुछ वकील मिलकर अपना ग्रुप बना लेते हैं। वे एक-दूसरे को कार्य आवंटित करते रहते हैं। यदि आपके पास किसी ग्रुप का सम्पर्क है, तो आपको पंडित मिलना सरल होगा, अन्यथा यह कार्य कठिन होता है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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