आत्मकथा भाग-4 अंश-35

श्री वेंकदासुब्बू

मेरे साथ जो लोग नियमित योग करते थे, उनमें सबसे अधिक नियमित आने वाले थे श्री वेंकदासुब्बू, जिनको सभी ‘सुब्बू’ कहकर बोलते हैं। जैसा कि नाम से स्पष्ट है आप तमिल हैं और चेन्नई के रहने वाले हैं। वे हमारे सीबीएस प्रोजेक्ट ऑफिस में ही एक विभाग के मुख्य प्रबंधक थे और अब किसी शाखा में चेन्नई के निकट पोस्टेड हैं। वे हिन्दी अच्छी तरह समझ लेते हैं और बोल भी लेते हैं।
सुब्बू जी देखने में बहुत साधारण लगते हैं, तमिलों जैसा औसत साँवला रंग और हर समय चेहरे पर खेलती मुस्कान। उनकी विशेषता यह है कि कम्प्यूटर का अच्छा ज्ञान होने के साथ-साथ वे लम्बी दूरी के धावक भी हैं। वे हाफ मैराथन (लगभग 21 किलोमीटर) में कई बार दौड़कर दौड़ पूरी कर चुके हैं। सप्ताह में दो-तीन बार 10-10 किमी दौड़कर अभ्यास करना उनके लिए मामूली बात है।
मुझे यह कहने में बहुत प्रसन्नता और संतोष है कि उनको लम्बी दूरी का सफल धावक बनाने में मेरा भी थोड़ा-सा योगदान है। वास्तव में पहले वे 5 किमी से अधिक नहीं दौड़ पाते थे, क्योंकि इतना दौड़ने पर ही उनकी एड़ियों में असहनीय दर्द होने लगता था, जिससे आगे दौड़ना असम्भव हो जाता था। मेरे योग कराने की सूचना पढ़कर वे स्वयं ही योग करने आये और तब मेरा उनसे घनिष्ठ परिचय हुआ। उन्होंने अपनी एड़ी की समस्या मुझे बतायी, तो मैंने उनको और अन्य सभी को पैरों के ऐसे सूक्ष्म व्यायाम कराना शुरू किया, जो स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी जी द्वारा बताये गये हैं। उन व्यायामों को नियमित करने से उनकी एड़ियों का दर्द एक महीने में ही एकदम सही हो गया और वे 5 किमी से भी अधिक सरलता से दौड़ने लगे। कई बार वे सुबह जल्दी निकल जाते थे और दौड़ का दैनिक अभ्यास करके योग प्रारम्भ होने के समय तक आ जाते थे। यों दौड़ता मैं भी था, परन्तु एक-दो किमी से अधिक मैं कभी नहीं दौड़ सका।
पहले मैं श्री भीम प्रसाद के साथ उनकी कार में ऑफिस जाया करता था। उनके स्थानांतरण के बाद मैं सुब्बू जी के साथ जाने लगा था और अन्त तक उनके साथ ही आता-जाता रहा था। उनके पास एक सेकंड हैंड मारुति कार थी, जिससे काम चल जाता था। उनके साथ मैं दो बार वार्षिक स्वास्थ्य जाँच के लिए भी गया था, जो अपोलो क्लीनिक में निर्धारित दर पर करायी जाती थी।
प्रतिदिन दोपहर को अपना लंच लेकर वे मेरे विभाग में आ जाते थे, तब तक मैं भी लंच कर लेता था। फिर हम दोनों टहलने निकलते थे। लंच के समय में 20-25 मिनट तक हम बाहर टहलते थे। कभी-कभी हम बाहर गन्ने का जूस भी पीते थे या भुट्टा खाते थे। इससे हम तरोताजा हो जाते थे, नहीं तो काम में बहुत थकान होती थी। सुब्बू जी अपनी दौड़ने की शक्ति बनाये रखने के लिए सूखे मेवों का बहुत सेवन करते थे। इसलिए कभी-कभी हम सूखे मेवे खरीदने एपीएमसी मार्केट भी जाते थे, जो निकट में ही था।
मुम्बई में सुब्बू जी को अकेले ही रहना पड़ता था, क्योंकि उनकी पत्नी चेन्नई में ही किसी विद्यालय में अध्यापिका हैं और उनके दोनों पुत्र भी वहीं पढ़ते थे। इस कारण उनकी पत्नी चाहते हुए भी उनके साथ नहीं रह सकती थीं। सुब्बू जी प्रायः अपने लिए दक्षिण भारतीय भोजन बनाते थे। कभी-कभी रोटी भी बना लेते थे। जब मैं अकेला रहता था, तो मैंने कई बार उनकी बनायी इडली और डोसा खाये थे। वे वास्तव में बहुत स्वादिष्ट खाना बनाते थे।
मैं जब तक मुम्बई में रहा तब तक वे नियमित योग करने आया करते थे। मेरे स्थानांतरण के बाद शीघ्र ही उनका भी स्थानांतरण चेन्नई हो गया, जिसके लिए वे बहुत दिनों से प्रयास कर रहे थे। परन्तु संयोग से वे अधिक दिनों तक चेन्नई में नहीं रह सके, क्योंकि कुछ महीने बाद ही उनका स्थानांतरण चेन्नई से काफी दूर ऊटी के पास एक शहर में कर दिया गया। वहाँ वे फिर अकेले रहने लगे थे।
एक बार मेरे बायें पैर में जाँघ की नस चढ़ जाने के कारण बहुत दर्द होने लगा था। संयोग से उन दिनों मैं वहाँ अकेला ही था, श्रीमतीजी किसी कारण से आगरा में थीं। पैरों में चोट लग जाने पर सुब्बू जी ने मेरी बहुत सहायता की थी। इस बारे में आगे विस्तार से लिखूँगा।
स्थानांतरण के बाद सुब्बू जी का योगाभ्यास छूट गया था, हालांकि दौड़ते वे अभी भी हैं। लेकिन योगाभ्यास छूट जाने से उनको कठिनाइयाँ होने लगीं और शरीर में दर्द रहने लगा। जब उन्होंने मुझे यह बात बतायी, तो मैंने उनसे फिर प्रतिदिन वही योग करने के लिए कहा, जो हम मुम्बई में करते थे। अब पता नहीं कि वे योग करते हैं या नहीं, लेकिन उनसे मेरा सम्पर्क नियमित बना हुआ है। सुब्बू जी जैसे साथी को मैं बहुत याद करता हूँ। ऐसे साथी दुर्लभ होते हैं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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