आत्मकथा भाग-4 अंश-34
सूरत यात्रा एवं एकता से भेंट
अगस्त 2015 में मुझे एक साथ दो-तीन छुट्टियाँ मिलीं। मैंने इनका उपयोग सूरत यात्रा में करने का निश्चय किया। मेरे बड़े साढ़ू श्री हरिओम जी अग्रवाल वहाँ 20 वर्षों से रह रहे थे और वहाँ एक फ्लैट भी खरीद लिया था। मुम्बई से सूरत केवल पौने तीन सौ किमी दूर है और एक्सप्रेस गाड़ी लगभग तीन घंटे में वहाँ पहुँचा देती है। मैंने शाम को लगभग 6 बजे छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से छूटने वाली फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस में आरक्षण करा लिया था, जो एक डबल-डेकर गाड़ी है। हालांकि उसमें काफी भीड़ थी, लेकिन आरक्षण के कारण मुझे कोई कष्ट नहीं हुआ।
रास्ते में मेरा परिचय मुम्बई के श्री दिनेश चौधरी से हुआ। वे भी सूरत जा रहे थे। उनके दो पुत्रियाँ हैं, जिनमें से बड़ी पुत्री को बोलने में कोई समस्या थी। मैंने उनको कुछ इलाज सम्बंधी सुझाव दिये थे। उनका कितना पालन उन्होंने किया यह तो पता नहीं, पर अब वह लड़की काफी ठीक है। उस परिवार से मेरा सम्पर्क आज भी बना हुआ है।
मैं लगभग साढ़े 9 बजे सूरत स्टेशन पर पहुँच गया। मेरे साढ़ू का बड़ा पुत्र रोमित (मोनू) मुझे लेने आया था और मेरे डिब्बे के बाहर ही खड़ा था। उसके साथ मैं घर पहुँच गया। सूरत मैं लगभग 18 साल बाद गया था। उससे पहले तब गया था, जब हरिओम जी ने सूरत में सपरिवार रहना शुरू किया था। तब वे सूरत के पुराने क्षेत्र में किराये के मकान में रहते थे।
सूरत में हमारी पत्रिका ‘जय विजय’ की एक लेखिका एकता सारडा भी रहती हैं। उनको मैंने सूचित किया कि मैं सूरत आ रहा हूँ, तो वे मिलने को उत्सुक हो गयीं। मैंने उनका पता लिया, तो ज्ञात हुआ कि उनका घर हमारे साढ़ू के फ्लैट से मुश्किल से दो किमी दूर है। इसलिए अगले ही दिन मैं मोनू के साथ वहाँ पहुँच गया। सिटी लाइट मौहल्ले में उनका फ्लैट खोजने में कोई कठिनाई नहीं हुई। मोनू मुझे वहाँ छोड़कर चला गया, या कहिए कि मैंने ही उसे वापस भेज दिया था।
वास्तव में सूरत की एकता सारडा, उल्हासनगर की प्रिया वच्छानी और जोधपुर की मधुर परिहार इन तीन लेखिकाओं का एक समूह है, जो साथ-साथ कार्यक्रमों में भाग लेने जाया करती थीं। ये तीनों मुझे भाई मानती हैं। एकता मुझसे बड़े स्नेह से मिलीं। मैं उनके लिए थोड़ी-सी मिठाई और अपनी स्वास्थ्य पुस्तिका ले गया था। जो उनको बहुत पसन्द आयी। उनके दो पुत्रियाँ हैं, जो बहुत योग्य हैं। उनके पति श्री जगदीश सारडा साड़ियों का व्यवसाय करते हैं।
एकता से मेरी बहुत बातें हुईं। चलते समय उन्होंने मुझे अपनी एक पुस्तक भी भेंट में दी। उनके पति जगदीश जी अपने स्कूटर पर मुझे पिपलोद में मेरे साढ़ू के फ्लैट तक छोड़ गये। इसके बाद भी मैं कई बार सूरत गया, लेकिन एकता से दोबारा भेंट नहीं हो पायी। फिलहाल एकता ने लिखना तो लगभग बन्द कर दिया है और अपना जिम शुरू कर दिया है, जो अच्छा चलता है।
सूरत में मैं मोनू के साथ कई जगह घूमने गया था। वैसे मैं उससे पहले भी एक बार सपरिवार सूरत गया था, लेकिन सभी जगह नहीं जा पाये थे। उनमें से कुछ जगह मैं मोनू के साथ घूम आया। विशेष रूप से एक नदी के किनारे, जो निकट ही समुद्र में मिलती है। संयोग से उस दिन 15 अगस्त थी और कई लड़के वहाँ तिरंगा झंडा लहरा रहे थे। मैंने भी उनके साथ तिरंगा लहराते हुए फोटू खिंचवाया।
भेंट जो नहीं हो सकी
प्रिया वच्छानी को पता चला कि मैं सूरत में एकता से मिलकर आया हूँ, तो वह भी मुझसे मिलने को उत्सुक हो गयीं। एक रविवार को हमारी भेंट का दिन तय हुआ। लगभग 10 बजे मैं अपने निवास से घणसोली स्टेशन की ओर चला, जहाँ से मुझे पहले ठाणे, फिर उल्हासनगर जाना था। मैं घणसोली के रास्ते में ही था कि उनका संदेश मिला कि आज नहीं मिलना चाहतीं, फिर किसी दिन मिलेंगे। यह सन्देश पाकर मैं रास्ते से ही लौट आया। उसके बाद मैं लगभग दो साल और नवी मुम्बई में रहा, लेकिन फिर कभी प्रिया ने भेंट करने की बात नहीं की। मैं समझ गया था कि वे मिलना ही नहीं चाहतीं, इसलिए मैंने भी कभी इसकी चर्चा नहीं की। यों उनकी कवितायें कभी-कभी आ जाती हैं, जिनको मैं ‘जय विजय’ में छाप देता हूँ।
हमारी एक लेखिका श्रीमती मंजू गुप्ता वाशी में ही रहती हैं। उन्होंने मुझसे अपने निवास पर आने के लिए बहुत कहा, तो एक दिन सायंकाल मैं उनसे मिलने चला गया। सेक्टर 9 में उनका फ्लैट मैंने सरलता से खोज लिया। वे अध्यापिका रही हैं और अब अवकाश प्राप्त कर चुकी हैं। उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और अनेक बार पुरस्कृत भी हुई हैं। मैं उनके लिए भी अपनी स्वास्थ्य पुस्तिका ले गया था। उन्होंने भी अपनी एक कहानी की पुस्तक मुझे भेंट में दी। इस मुलाकात के बाद भी उन्होंने मुझे कई बार आने को कहा, लेकिन मुझे जाने का अवसर नहीं मिला।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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