आत्मकथा भाग-4 अंश-32
माथेरान यात्रा
एक दिन बड़े अग्रवाल साहब ने मुझसे कहा कि कल हम योग करने नहीं आयेंगे। मैंने कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि हम माथेरान घूमने जायेंगे। मैंने माथेरान का नाम तो सुना था, पर कभी देखा नहीं था। अग्रवाल साहब ने मुझसे कहा कि यदि आप चाहें तो हमारे साथ चल सकते हैं। मैं तो घूमने जाने के मौके देखता ही रहता हूँ, इसलिए तुरन्त तैयार हो गया।
अगले दिन हम सभी निकट के घणसोली रेलवे स्टेशन पर पहुँच गये और टिकट लेकर लोकल ट्रेन में बैठ गये। मेरे लिए मुम्बई की लोकल ट्रेन में बैठने का वह पहला अवसर था। हमारे काफिले में 6 लोग थे- मेरे अलावा दोनों अग्रवाल साहब सपत्नीक और एक अन्य अधिकारी मोहम्मद आसिफ, जो लखनऊ के ही हैं। पहले हम ठाणे स्टेशन पहुँचे, फिर वहाँ से भीड़ भरे प्लेटफाॅर्मों और पुल से निकलकर दूसरी लोकल में बैठे जो करजत की ओर जाती है। वह रास्ते में माथेरान के निकट एक स्टेशन पर उतारती है, जिसका नाम नेरल या नेरुल है। हालांकि उस दिन रविवार होने के कारण ट्रेन में भीड़ थी, पर हम आराम से उस स्टेशन पर उतर गये।
वहाँ से एक टाॅय ट्रेन माथेरान तक जाती है, परन्तु उन दिनों बरसात के कारण उसका परिचालन बन्द था। अतः हम सब प्रति सवारी के हिसाब से टैक्सी करके माथेरान तक पहुँचे। वह टैक्सी जहाँ उतारती है, वहीं से माथेरान में प्रवेश किया जाता है, जिसकी टिकट लगती है और सुरक्षा जाँच भी होती है। हम वहाँ से लगभग डेढ़ किमी पैदल चलकर माथेरान कस्बे तक पहुँचे। वहाँ अच्छा खासा बाजार था और घोड़े भी मिल रहे थे।
कुछ घोड़े वाले हमारे पीछे पड़ गये। वे प्रति सवारी 600 रुपये माँग रहे थे, जो बहुत अधिक था, क्योंकि वास्तव में केवल तीन किलोमीटर का जंगली क्षेत्र है, जो घोड़े से तय किया जाता है। इसे हम पैदल भी तय कर सकते थे, लेकिन महिलाओं को ध्यान में रखते हुए हमने अन्ततः प्रति सवारी 300 रु में घोड़े तय किये। घोड़े वालों ने हमें मुख्य-मुख्य स्थान दिखाये, एक-दो बार घोड़े से उतरकर पैदल भी चले। लगभग एक-डेढ़ घंटे में हम वापस भी आ गये।
रास्ते में एक जगह एक छोटा-सा कृत्रिम झरना है, जो बरसात के मौसम के कारण पूरे जोर से चल रहा था। वहाँ बहुत लोग स्नान भी करते हैं। मैंने और आसिफ ने वहाँ स्नान किया। फिर हम आगे चले। वैसे वहाँ एक बड़ा झरना भी है, परन्तु उसके निकट कोई नहीं जा सकता। उसे बहुत दूर से ही देखना होता है, जिससे कोई मजा नहीं आता।
वैसे तो वहाँ हरियाली बहुत थी, पर मुझे माथेरान अधिक पसन्द नहीं आया। उसमें केवल गहरी घाटियों के अलावा कुछ नहीं है। ऐसी घाटियाँ हमारे उत्तराखंड या हिमाचल प्रदेश के किसी भी गाँव में देखी जा सकती हैं। माथेरान की तुलना में हमारे नैनीताल और मसूरी बहुत सुन्दर पहाड़ी स्थान हैं। लेकिन मुम्बई के आस-पास पहाड़ी स्थान का कोई अन्य विकल्प न होने के कारण लोग माथेरान जाते हैं। वहाँ काफी भीड़ भी रहती है।
यह यात्रा हमने अगस्त 2015 में की थी। इसके कुछ दिनों बाद बड़े अग्रवाल साहब ने अवकाश प्राप्त कर लिया, किन्तु वे दो माह अर्थात् अक्तूबर अंत तक उसी फ्लैट में रहे। बाद में वे निकट के घणसोली में अपने फ्लैट में रहने लगे थे। वे प्रायः वहाँ से प्रतिदिन योग करने आ जाते थे। बाद में वे रायपुर चले गये। लेकिन अब फिर नवी मुम्बई में ही रहते हैं।
इसके बाद मैं एक बार और माथेरान गया था, अपने सूरत वाले साढ़ू श्री हरिओम जी अग्रवाल के साथ। उस दिन हम घोड़ों के बिना केवल पैदल ही घूमे थे और दूर के उस स्थान पर भी गये थे, जहाँ पिछली बार नहीं गये थे। हरियाली तो तब भी बहुत थी, लेकिन हम गर्मी के दिनों में गये थे, बरसात शुरू नहीं हुई थी, इसलिए पहाड़ी स्थान होने के बाद भी वहाँ बहुत गर्मी थी। पहले जिस छोटे झरने में हम नहाये थे, वह भी नहीं चल रहा था। फिर भी हमें वहाँ जाकर अच्छा लगा।
इस बार हमने तीन-चार ऐसे वरिष्ठ नागरिकों को भी देखा जो प्रातः 6 बजे ही नेरल से पैदल चलकर आराम से चलते हुए लगभग 10 बजे माथेरान पहुँचे थे। उनकी जीवटता को देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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