आत्मकथा भाग-4 अंश-31
योग शिक्षा एवं अग्रवाल साहब
प्रारम्भ में मैं अपने फ्लैट से बाहर टहलने के लिए जाया करता था। हमारी बिल्डिंग से लगभग एक किमी दूर पर ठाणे क्रीक के निकट एक कृत्रिम तालाब है, जिसके चारों ओर टहलने का चैड़ा रास्ता बना हुआ है। हम उसी तालाब के कई चक्कर लगाते थे। एक दिन जब मैं टहलकर लौट रहा था, तो मुझे श्री अमर नाथ अग्रवाल मिल गये। इन्होंने ही मुझे बैचलर फ्लैट में जगह दिलवायी थी। एक बार वे पंचकूला में किसी प्रशिक्षण पर आये थे, तो मेरी योग कक्षाओं में भी आते थे। उनको मैं नहीं पहचान पाया था, लेकिन उन्होंने पहले ही दिन देखते ही मुझे पहचान लिया था।
उन्होंने मुझसे कहा कि यहाँ अपनी बिल्डिंग में योग कराया करो। मैंने तत्काल स्वीकार कर लिया और समय तय हो गया। हमारी 20 मंजिला बिल्डिंग की छत काफी बड़ी थी, वहाँ 15-20 लोग सरलता से योग कर सकते हैं, पर मेरी कक्षा में प्रायः 8-10 लोग आ जाते थे। इनमें श्री अमर नाथ अग्रवाल (बड़े अग्रवाल साहब) और उनकी पत्नी श्रीमती उर्मिला अग्रवाल, श्री नवल किशोर अग्रवाल (छोटे अग्रवाल साहब) और उनकी पत्नी श्रीमती सुधा अग्रवाल, श्री भीम प्रसाद और उनकी पत्नी श्रीमती विवेका प्रसाद, तथा श्री वेंकदासुब्बू नियमित आने वालों में थे। बाद में हमारे विभाग के एजीएम श्री आईपी सिंह और उनकी पत्नी श्रीमती पुष्पा सिंह भी नियमित आ जाते थे। ये सभी उसी बिल्डिंग के विभिन्न फ्लैटों में रहते थे। मैंने निःशुल्क योग कक्षा की सूचना अपनी बिल्डिंग की लिफ्ट के बाहर लगा दी थी, जिसे देखकर लोग आ जाते थे।
जब तक मैं नवी मुम्बई में रहा तब तक नियमित योग कराता और करता रहा था। मैं बीच-बीच में उनकी स्वास्थ्य सम्बंधी शिकायतों का भी समाधान करता था और उनको ऐसे ही योगासन तथा प्राणायाम कराता था, जिनको वे सरलता से कर सकें। इस तरह वे प्रायः स्वस्थ रहते थे और अपने वार्षिक चेकअप में प्रायः सामान्य पाये जाते थे।
योग कक्षाओं में कभी-कभी दो तीन बच्चे भी आ जाते थे। श्री भीम प्रसाद की बड़ी पुत्री कु. लता भी उनमें होती थी। पर बच्चे केवल रविवार के दिन ही आ पाते थे, क्योंकि अन्य दिनों में वे योग के समय अपने विद्यालय जाने की तैयारी करते थे। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। मैंने उनसे कह रखा था कि जिस दिन विद्यालय न जाओ उस दिन योग करने आ जाया करो, कुछ तो सीखेंगे ही। जिस दिन बच्चे योग करने आते थे, उस दिन मैं जानबूझकर ऐसे व्यायाम कराता था, जिनमें उछल-कूद अधिक होती थी। इससे बच्चों का अच्छा व्यायाम हो जाता था। वे प्राणायाम कम करते थे।
हमारी बिल्डिंग से महापे के पीछे जो पहाड़ दिखायी पड़ते थे, वे अधिक ऊँचे नहीं थे और काफी हरे-भरे थे। इसलिए मेरा बहुत मन होता था कि किसी दिन इन पहाड़ों पर चढ़ा जाये। वे हमारे फ्लैट से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर थे। इसलिए एक दिन रविवार को मैं अपनी योगकक्षा में आने वाले दो बच्चों को साथ लेकर उन पहाड़ों पर चढ़ने गया। हम वहाँ तक यानी पहाड़ों की तलहटी तक पहुँच गये, किन्तु उन पहाड़ों के चारों ओर गहरी खाई बनी हुई थी। हमें वहाँ कहीं भी उस खाई को पार करने का सरल रास्ता नहीं मिला, जिसे बच्चे भी पार कर सकें। इसलिए कुछ देर यों ही भटकने के बाद हम अपने घर वापस आ गये। हमें लगभग चार किमी चलना पड़ा था। इससे थोड़ी थकान हो गयी थी, पर आनन्द बहुत आया। यदि पहाड़ पर किसी तरह चढ़ लेते तो और भी अच्छा लगता। मैं इसके बाद फिर कभी उन पहाड़ों पर चढ़ने के लिए नहीं जा सका।
सुबह योग कक्षा प्रारम्भ होने से पहले जब तक पूरा दिन नहीं निकला होता था तो हम देखते थे कि उन पहाड़ों से निकलकर बहुत से पक्षी दो-दो चार-चार के झुंड में ठाणे क्रीक पर जाया करते थे और फिर प्रायः दिन भर वहीं रहते थे। शाम को वे पक्षी वापस आते भी दिखायी देते थे। वे एकदम सफेद रंग के बहुत सुन्दर पक्षी होते थे, शायद जलमुर्गी थे। उनको देखना हमें बहुत अच्छा लगता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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