आत्मकथा भाग-4 अंश-30

कार्यालय का हाल
मैं बता चुका हूँ कि हमारे कार्यालय का नाम था सीबीएस प्रोजेक्ट ऑफिस। उस समय तक हमारे बैंक (इलाहाबाद बैंक) की सभी शाखाएँ सीबीएस के अन्तर्गत आ गयी थीं और वे सभी टीसीएस द्वारा उपलब्ध कराये गये बैंकिंग साॅफ्टवेयर बैंक्स 24x7 पर कार्य कर रही थीं। इसके अलावा विभिन्न कम्पनियों के जो भी बैंकिंग साॅफ्टवेयर हमारे बैंक की विभिन्न शाखाओं में चलते थे, वे सब समाप्त हो गये थे। इनमें वह साॅफ्टवेयर भी था, जो हमारे बैंक ने एक कम्पनी एच.के. सिस्टम्स से खरीदा था और जिसको हमने पंचकूला में अपने संस्थान आईआरटी में सुधारा था। यदि बैंक चाहता, तो उसी साॅफ्टवेयर का विस्तार करके सभी शाखाओं में सीबीएस के रूप में उपयोग में ला सकता था। इससे बैंक को अरबों रुपयों की बचत होती, पर पता नहीं क्यों हमारे प्रधान कार्यालय ने उसको कूड़े में फेंककर टीसीएस के साॅफ्टवेयर का उपयोग करना ही पसन्द किया।
सीबीएस का तात्पर्य होता है- सेंट्रलाइज्ड बैंकिंग साॅल्यूशन अर्थात् केन्द्रीकृत बैंकिंग समाधान। इसमें बैंक की सभी शाखाओं को एक बड़े नेटवर्क के रूप में एक ही सर्वर से जोड़ दिया जाता है और सभी शाखाओं के सारे लेन-देन का हिसाब उसी सर्वर में रखा जाता है। हालांकि शाखाओं में अपने छोटे-छोटे नेटवर्क भी होते हैं, पर वे केवल कार्य करने के लिए नोड की तरह ही होते हैं और उनमें कोई डाटा नहीं रखा जाता। ऐसे नेटवर्क को चलाना बहुत जटिल कार्य होता है। यही कार्य हमारे सीबीएस प्रोजेक्ट ऑफिस में किया जाता था।
हमारे ऑफिस में अनेक विभाग थे, जो विभिन्न कार्यों को देखते थे, जैसे- नेटवर्क, विंडोज, हार्डवेयर, साॅफ्टवेयर, क्लीयरिंग, एटीएम बैक ऑफिस, कैश मैनेजमेंट आदि-आदि। मुझे एटीएम बैकऑफिस में लगाया गया था, जो उस भवन के एक अलग भाग में था। उसी में कैश मैनेजमेंट विभाग भी था।
हमारे बैंक में एटीएम कार्ड तो प्रधान कार्यालय द्वारा जारी किये जाते थे, लेकिन हमारे विभाग में एटीएमों द्वारा किये जाने वाले समस्त लेन-देनों और उनमें डाली जाने वाली नकदी का हिसाब रखा जाता था। यह एक जटिल प्रक्रिया होती है, क्योंकि एटीएम से कई प्रकार के लेन-देन किये जाते थे-
1. हमारे बैंक के ग्राहक अपने ही बैंक के एटीएमों से पैसा निकाल सकते थे।
2. हमारे बैंक के ग्राहक दूसरे बैंकों से एटीएमों से पैसा निकाल सकते थे।
3. दूसरे बैंकों के ग्राहक हमारे बैंक के एटीएमों से पैसा निकाल सकते थे।
इन तीनों प्रकार के लेन-देनों का हिसाब अलग-अलग रखा जाता था, जो बहुत जटिल होता था। इसके अलावा हम एक प्राइवेट कम्पनी से अपने विभिन्न एटीएमों में नकदी डलवाते थे, उसका हिसाब भी बहुत जटिल होता था, क्योंकि कम्पनी वाले किसी एक एटीएम के लिए पैसा लेकर किसी दूसरे एटीएम में डाल देते थे और उसका हिसाब सही नहीं देते थे। ऐसे लेन-देनों की समय-समय पर जाँच की जाती थी, ताकि उसमें हुई गलतियों को ठीक किया जा सके। इस प्रक्रिया को रिकाउंसलेशन कहा जाता था।
जब मैंने उस विभाग में कार्य शुरू किया तो वहाँ तीन साल का रिकाउंसलेशन बकाया था। मैंने पूरे तीन महीने जमकर मेहनत की और उस सारे कार्य को पूरा किया।
इसके अलावा एटीएमों से होने वाले लेन-देनों में कई बार गलती हो जाती थी, जैसे एकाउंट से पैसे कट जाना, लेकिन नोट न निकलना। ऐसी बहुत सी शिकायतें हमारे बैंकों की शाखाओं में आती थीं, जिनको वे ईमेल से हमारे पास भेज देते थे। ऐसी शिकायतों को दूर करने और ग्राहक के खाते में पैसे वापस करने की एक जटिल और लम्बी प्रक्रिया होती है।
इस काम में मदद करने के लिए हमारे ऑफिस में एफएसएस नामक कम्पनी के लगभग डेढ़ दर्जन लोग कार्य करते थे। हम उनकी सहायता से ग्राहकों की शिकायतों को दूर करते थे। उनमें से कई लोगों के नाम मुझे याद हैं- राजेन्द्र जी, फ्रांसिस, समीर शिन्दे, गीता जी, सीमा आदि। ये लोग प्रायः कुछ महीने के काॅंट्रेक्ट पर आते थे और अपना काॅंट्रेक्ट पूरा हो जाने के बाद या तो उसे बढ़वा लेते थे, या किसी दूसरी कम्पनी में चले जाते थे। स्थायी काॅंट्रेक्ट पर कार्य करने वाले भी कुछ लोग थे। ये सभी अपने कामों में निपुण होते थे और प्रायः पूरे आठ घंटे लगातार लगे रहते थे। इनका कार्य तीन शिफ्टों में होता था और रात की शिफ्ट में भी उनके दो-तीन लोग कार्य करते थे।
रिकाउंसलेशन का कार्य पूरा होने के बाद मेरा मुख्य कार्य इन शिकायतों को ही ठीक कराना और ठीक हो जाने के बाद मामला समाप्त करना था। इन कार्यों के लिए रोज ढेर सारे वाउचर बनाये जाते थे, जिनको पहले दूसरे अधिकारी पास करते थे, फिर मैं करने लगा। मैं विभाग के एक साथ चार-पाँच कार्यों को सँभाल रहा था। कुल मिलाकर मैं कार्यालय में बहुत व्यस्त रहता था, हालांकि बीच-बीच में दस-पाँच मिनट के लिए अवकाश भी मिल जाता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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