आत्मकथा भाग-4 अंश-29

 निवास की व्यवस्था

मुझे सबसे अधिक चिन्ता रहने का स्थान मिलने की थी। मुझे बताया गया था कि वहाँ बैंक के पास एक पूरा आवासीय परिसर है, जिसमें कई दर्जन फ्लैट हैं। उनमें से दो फ्लैटों में अविवाहित या अकेले रहने वाले ऑफीसर रहते हैं। मैंने उनसे निवेदन किया कि मुझे वहीं किसी फ्लैट में सोने भर का स्थान दे दीजिए। उस समय वे दोनों फ्लैट पूरी तरह भरे हुए थे अर्थात् दोनों में आठ-आठ अधिकारी रह रहे थे और कोई स्थान खाली नहीं था। लेकिन उस आवासीय परिसर के प्रभारी श्री अमर नाथ अग्रवाल ने उनमें से एक फ्लैट में नीचे लाॅबी में ही एक गद्दा डलवाकर मेरे सोने की व्यवस्था कर दी और मुझसे कहा कि जैसे ही किसी फ्लैट में जगह खाली होगी, वह आपको दे दी जाएगी। उन्होंने गद्दे पर बिछाने के लिए एक चादर भी अपने पास से दे दी, हालांकि एक चादर मैं भी अपने साथ लाया था। मेरे लिए इतना ही पर्याप्त था।
मैं अपने कार्यालय से श्री भीम प्रसाद के साथ उस आवासीय परिसर में आया था। वह परिसर वाशी से सटे हुए कोपरखैरणे नामक उपनगर में है, जो हमारे कार्यालय से कार द्वारा सड़क मार्ग से लगभग 5 किमी और पैदल मार्ग से 4 किमी दूरी पर है। स्पष्ट है कि इतनी दूर मैं पैदल नहीं आ-जा सकता था। हालांकि वहाँ बस से जाने की भी सुविधा है और शेयर ऑटो भी चलते हैं, जो घर से थोड़ी दूर से लेने पड़ते हैं और ऑफिस से थोड़ी दूर पर ही उतारते हैं। वैसे उस परिसर से कई लोग वाशी अपनी कार से जाते थे और मैं उनमें से किसी के साथ भी जा सकता था। मैं प्रायः पहले श्री भीम प्रसाद के साथ और बाद में श्री वेंकदासुब्बू के साथ जाया करता था। कभी-कभी अग्रवाल साहब के साथ भी चला जाता था। मैंने सबसे कह रखा था कि मेरी प्रतीक्षा न करें। यदि मैं वहाँ पर हूँ, तो बैठ जाऊँगा, नहीं तो बाद में किसी और के साथ आ जाऊँगा। सभी बहुत ही सहयोगात्मक थे, अतः कार्यालय जाने में मुझे कोई कष्ट नहीं होता था, हालांकि प्रतिदिन लिफ्ट लेने से मुझे संकोच अवश्य होता था।
जिस बैचलर फ्लैट में मैं रहता था, उसमें एक खाना बनाने वाली आती थी। मैंने फ्लैट के दूसरे साथियों से बात करके स्वयं भी उनके साथ भोजन करना शुरू कर दिया। मैं प्रातः का नाश्ता और रात्रि का भोजन वहीं करता था। दोपहर को अपने ऑफिस की कैंटीन में खा लेता था, जो काफी अच्छी थी। लगभग 20 दिन मैं उस फ्लैट में रहा। फिर बगल वाले बैचलर फ्लैट में एक कमरे में जगह खाली होने पर मैं उसमें शिफ्ट हो गया। वहाँ एक अलमारी भी थी, जिसमें मैंने अपना सामान रख दिया था। मैं वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगा। उसमें भी एक खाना बनाने वाली आती थी। वह सुबह जल्दी आकर खाना बना देती थी, जिससे मैं अपना लंच बाॅक्स तैयार करके ले जाता था और वहाँ कैंटीन में बैठकर खाता था। कभी-कभी कैंटीन में भी खा लेता था, जब लंच बाॅक्स किसी कारणवश नहीं ले जाता था। कैंटीन चलाने वाले सज्जन एक दक्षिण भारतीय केरली थे- श्री राजन जी, जिनको सब अन्ना (बड़े भाई) कहते थे। वे बहुत अच्छे और सहयोगात्मक थे। मेरी तो वे बहुत ही इज्जत करते थे।
मेरे कमरे में एक अन्य अधिकारी भी थे- श्री बिराट सिंह। वे बिहार के रहने वाले हैं और उस समय हमारे बैंक की कोपरखैरणे शाखा में पदस्थ थे, जो उसी भवन में प्रथम तल पर थी। हमने अपने बचत खाते उसी शाखा में खोल लिये और वहीं एक लाॅकर भी ले लिया, ताकि कुछ गिनी चुनी कीमती वस्तुओं को उसमें सुरक्षित रखा जा सके। मेरा व्यक्तिगत बचत खाता हमारे ही कार्यालय में नीचे नई खुली शाखा में था। वहीं एक एटीएम भी लगा हुआ था, जिससे बहुत आराम हो गया था।
हमारे कमरे की बालकनी से ठाणे क्रीक (अर्थात् जमीन के अन्दर घुसा हुआ समुद्र) का काफी भाग दिखाई देता था। उसके किनारे काफी चौड़ा दलदली जंगल था, इसलिए किसी के लिए वहाँ से क्रीक में जाना आसान नहीं था। वैसे दलदल से पहले बहुत से मकान, जो अधिकतर बहुमंजिली इमारतें थीं, बने हुए थे। मेरे कमरे से कोपरखैरणे का दृश्य बहुत अच्छा लगता था। हमारा परिसर वहाँ सबसे ऊँचा था, क्योंकि उसमें 20 मंजिलें थीं। इसलिए उसकी छत से सारा कोपरखैरणे और बगल का घणसोली उपनगर भी पूरा दिखाई देता था। कोपरखैरणे के पीछे महापे नामक उपनगर था, जहाँ मुख्यतः बड़ी कम्पनियों के ऑफिस थे। उसके पीछे कुछ पहाड़ियाँ थीं। पहाड़ियों के पार खारघर नामक मौहल्ला था, जहाँ हमारे बैंक के बहुत अधिकारी रहते थे। हालांकि वहाँ जाने का रास्ता बहुत लम्बा था, क्योंकि पहाड़ियों का चक्कर लगाकर जाना पड़ता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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