आत्मकथा भाग-4 अंश-28

नवी मुम्बई स्थानांतरण

मार्च 2015 में मुझे लखनऊ में रहते हुए पाँच साल हो गये थे और मैं चिन्तित था कि पता नहीं कहाँ मेरा स्थानांतरण कर दिया जाये। बैंक की नौकरी में एक यही सबसे बड़ी चिन्ता होती है, क्योंकि अधिकांश लोगों को उनकी पसन्द की पोस्टिंग नहीं मिल पाती। जून में अचानक मेरे स्थानांतरण का आदेश आ गया। मुझे नवी मुम्बई के वाशी में सीबीएस प्रोजेक्ट ऑफिस में भेजा जा रहा था। प्रारम्भ में मैं वहाँ जाने का इच्छुक नहीं था, लेकिन मेरे कुछ साथी वहाँ पहले से कार्य कर रहे थे। उनसे वार्ता करने पर पता चला कि वाशी अच्छी जगह है और ऑफिस भी अच्छा है, अतः कोई कष्ट नहीं होगा। तब मैं जाने के लिए तैयार हुआ। मेरी सेवा के लगभग चार साल बाकी रह गये थे। इसलिए मैंने सोचा कि अब फिर स्थानांतरण नहीं झेलना पड़ेगा और मैं अवकाश ग्रहण करने तक वहीं रहूँगा। बच्चों ने भी कहा कि अब कुछ दिन मुम्बई में भी रहकर देख लेते हैं।
तभी मुझे पता चला कि मुझे सीबीएस प्रोजेक्ट ऑफिस वाशी में नहीं लगाया जाएगा, बल्कि उसके एक विभाग पेमेंट गेटवे में लगाया जाएगा, जो वहाँ से काफी दूर पुरानी मुम्बई में फोर्ट क्षेत्र में है। यह जानकर मैं दुःखी हो गया, क्योंकि मुम्बई की भागदौड़ मेरे वश की बात नहीं थी। वहाँ की लोकल ट्रेनों की भीड़भाड़ से मैं बहुत घबराता था। यह भी पक्का पता नहीं था कि वहाँ मुझे रहने का स्थान कहाँ मिलेगा और वाशी में रहकर वहाँ रोज जाना भी मेरे लिए सम्भव नहीं था। इसलिए मैंने मुम्बई जाने का विचार स्थगित कर दिया और छुट्टी पर चला गया।
फिर मैंने प्रधान कार्यालय में अपने सम्बंधों को टटोला, तो एक महाप्रबंधक से मेरा पुराना परिचय निकल आया, जो एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पोस्ट पर थे। उनसे बात हुई तो उन्होंने मुम्बई फोन करके मुझे वाशी में ही लगाने का सुझाव दिया। वाशी में सीबीएस प्रोजेक्ट ऑफिस के उपमहाप्रबंधक उस समय श्री पाण्डेया थे। वे मान गये और उन्होंने हमें फोन पर बताया कि आपको हम अपने ही पास रखेंगे, दूर नहीं भेजेंगे। यह जानकर मेरी एक चिन्ता समाप्त हुई और मैंने मुम्बई जाने के लिए हवाई जहाज में टिकट बनवा ली।
उन दिनों हमारी पुत्री आस्था का 3डी एनीमेशन कोर्स तो पूरा हो चुका था, लेकिन उसकी अन्तिम परीक्षा नवम्बर में होने वाली थी। इसलिए मैं नवम्बर से पहले लखनऊ नहीं छोड़ना चाहता था, ताकि उनको परेशानी न हो। अतः मैं पहले अकेला ही मुम्बई गया। मेरा विचार यह था कि इसी बीच मैं अपने लिए कोई फ्लैट एलाट कराने की कोशिश करूँगा और वहाँ फ्लैट मिल जाने के बाद ही लखनऊ का फ्लैट खाली करूँगा। इसलिए मैंने अपने कार्यालय में नवम्बर अन्त तक वह फ्लैट रोकने का आवेदन दे दिया।
नवी मुम्बई में
निर्धारित दिन मैं हवाई यात्रा करके मुम्बई पहुँचा। वहाँ से नवी मुम्बई के लिए टैक्सी की। मुझे नवी मुम्बई की कोई जानकारी नहीं थी। हवाई अड्डे के टैक्सी वाले को भी वाशी के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी, पर हमने सोचा कि वहाँ पूछ लेंगे। हम एक घंटे में ही एयरपोर्ट से वाशी पहुँच गये। रास्ते में ठाणे क्रीक को पुल से पार किया, जो मैंने शायद पहली या दूसरी बार देखा था। वाशी में हमें सेक्टर 19 तो मिल गया, पर वहाँ पर हमारे बैंक के ऑफिस की जानकारी किसी को नहीं थी। वास्तव में हमारा प्रोजेक्ट ऑफिस एपीएमसी मार्केट, जिसे बोलचाल में दाना बन्दर कहते हैं, के पीछे एक कोने में एक उपेक्षित सी जगह पर है। किसी तरह भटकते हुए हम वहाँ पहुँच गये।
सीबीएस प्रोजेक्ट ऑफिस के डीजीएम श्री पाण्डेया जी मुझसे बहुत स्नेह से मिले और मुझे तत्काल ही अपने एक एजीएम श्री बाईलुंग के पास ले गये। वे मुझे पहले से जानते थे, क्योंकि हम दोनों एक ही बैच के थे और पहले दो-तीन बार हैडऑफिस में मिल चुके थे। उन्होंने मेरा स्वागत किया और बताया कि मुझे एटीएम बैकऑफिस में लगाया जाएगा, जो कि उसी भवन में दूसरी ओर है। वे मुझे वहाँ ले गये और सबसे परिचय करा दिया।
उस समय एटीएम बैकऑफिस आधा पहली मंजिल पर और आधा दूसरी मंजिल पर था। पहली मंजिल पर मुख्य प्रबंधक थे श्री भीम प्रसाद और दूसरी मंजिल पर थीं श्रीमती स्वरूपा रानी। मुझे प्रारम्भ में दूसरी मंजिल पर ही एक सीट पर बैठाया गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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