आत्मकथा भाग-4 अंश-27
बाल निकेतन के बच्चों का दिल्ली भ्रमण
बाल निकेतन के बच्चों का मन था दिल्ली घूमने का। वे कई वर्ष से कहीं बाहर घूमने नहीं गये थे। इसलिए 2014 में गर्मी की छुट्टियों में उनके दिल्ली भ्रमण की योजना बना ली गयी। दिल्ली में मिशन का अपना भवन है, इसलिए ठहरने की कोई समस्या नहीं थी। बच्चों के साथ छात्रावास प्रमुख श्री सुधाकर अवस्थी को तो जाना ही था, दो अन्य कार्यकर्ताओं का भी जाना आवश्यक होता है। मैं इसके लिए सहर्ष तैयार हो गया। मेरे अलावा श्री तुलाराम निमेश जी भी तैयार हुए। वे एक बैंक से अवकाश प्राप्त हैं और वर्तमान में बाल निकेतन की व्यवस्था देखते हैं।
गोमती एक्सप्रेस में सभी 16 बच्चों और तीन बड़ों का आरक्षण करा लिया गया। निर्धारित दिन हम सभी लखनऊ जंक्शन, जिसे चारबाग कहते हैं, पर पहुँच गये। गोमती एक्सप्रेस अपनी आदत के अनुसार उस दिन भी कई घंटे देर से आयी। उसमें भीड़ भी बहुत थी। हमारा तो आरक्षण था, लेकिन डिब्बे में बिना आरक्षण वाले भी बहुत आ जाते हैं। पर हम आराम से बैठकर नई दिल्ली स्टेशन पहुँच गये। वहाँ हमें लेने के लिए मिशन के दो कार्यकर्ता आये हुए थे। उनके मार्गदर्शन में हम ई-रिक्शाओं में बैठकर महामना मालवीय स्मृति भवन में आ गये, जो कनाट प्लेस के निकट ही दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर है।
वहाँ के कार्यकर्ताओं ने अच्छी व्यवस्था कर रखी थी। हमारे सोने का प्रबंध नीचे के बड़े हाॅल में किया गया था, जहाँ विभिन्न कार्यक्रम होते हैं और मालवीय जी के बारे में एक वृत्तचित्र का भी प्रदर्शन किया जाता है। गर्मियों के दिन थे, हाॅल वातानुकूलित था, अतः कोई कष्ट नहीं था।
पहले दिन तो हमने अपनी थकान मिटायी और मालवीय जी पर वृत्त चित्र देखा। दूसरे दिन हमें दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की ‘दिल्ली दर्शन’ बस के द्वारा दिल्ली दिखाने ले जाया गया। नाश्ता हम कर ही चुके थे। दोपहर के भोजन के लिए कुछ पूड़ियाँ बनवा ली गयीं और केले आदि रख लिये गये। हमें अपने ठहरने के स्थान से कनाट प्लेस में बड़ौदा हाउस तक पैदल ही ले जाया गया, जो एक किलोमीटर के लगभग दूर है। इतना चलने में हमें कोई समस्या नहीं थी। वहाँ के मिशन के एक कार्यकर्ता हमारे साथ ही थे। वे हमारा मार्गदर्शन कर रहे थे।
उस दिन हमने दिल्ली के सभी प्रमुख स्थान देख लिये। लालकिला, राजघाट, बिरला मंदिर, कुतुब मीनार, लोटस टैम्पल, इंडिया गेट इनकी मुझे याद है। एकाध स्थान और भी था। बच्चों को लाल किला और कुतुब मीनार सबसे अधिक अच्छा लगा। मैं बच्चों को इन स्थानों के इतिहास के बारे में जानकारी देता जा रहा था, क्योंकि मैं दिल्ली में पहले भी तीन साल रह चुका था। बच्चे वे सब जानकारियाँ पाकर बहुत खुश थे। हालांकि बस का गाइड भी अपने हिसाब से उनको जानकारी दे रहा था।
बच्चों को दिल्ली बहुत अच्छी लगी। राजघाट में देर तक उन्होंने मस्ती की। वहाँ की घास से भरी ढलान पर कई बच्चों ने लोट लगायी। हमारे पास दो कैमरे थे। उनसे काफी फोटो भी खींचे गये। शाम को लगभग 7 बजे हम सब उसी जगह उतर गये जहाँ से बस में बैठे थे। फिर वहाँ से पैदल ही अपने स्थान पर पहुँच गये और भोजन किया। मिशन कार्यकर्ताओं ने हमारे भोजन के लिए अच्छी व्यवस्था कर रखी थी। उन्होंने तीनों समय भोजन बनाने के लिए मजदूर लगा रखे थे, जो स्वादिष्ट भोजन समय पर तैयार कर देते थे।
तीसरे दिन मैं बच्चों को पास में ही बने नेहरू बाल उद्यान में घुमाने ले गया। वह वहाँ से मुश्किल से आधा किलोमीटर दूर है। अतः जाने में कोई समस्या नहीं थी। बच्चों को वह बाल उद्यान बहुत पसन्द आया। वहाँ बहुत से झूले और ज्ञानवर्धक वस्तुएँ रखी गयी हैं। चित्रकला, मूर्तिकला आदि अनेक कलाएँ सिखाने की व्यवस्था भी है। छोटी-छोटी फिल्में भी दिखायी जाती हैं। जिस दिन हम गये थे उस दिन भीड़ बिल्कुल नहीं थी। इसलिए सबने आराम से सब घूमकर देख लिया। वह काफी विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ है।
उसी दिन सायंकाल हमारे लिए मिशन के कार्यकर्ताओं के साथ बैठक रखी गयी। उसमें माननीय पन्नालाल जी जायसवाल स्वयं उपस्थित थे, एक देवी जी मुख्य अतिथि के रूप में आयी थीं और कई प्रमुख कार्यकर्ता भी आये थे। उनको बाल निकेतन के बारे में बताया गया। श्री जायसवाल ने हमारे छात्रावास प्रमुख श्री सुधाकर अवस्थी को पुस्तकें भेंट देकर सम्मानित किया। मुझे भी इसी प्रकार भेंट दी गयी।
अगले दिन हमारी वापसी का कार्यक्रम था। प्रातःकाल मेरे सहयोगी ब्लाॅगर श्री संजय केशव जी मुझसे मिलने आ गये। उनसे मिलकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। मैं उनके लिए अपनी कम्प्यूटर की एक किताब और स्वास्थ्य पुस्तिका ले गया था। वे मेरे लिए अपनी दुकान से एक कुर्ता लाये थे। उनसे बाल निकेतन के बच्चों और कार्यकर्ताओं का परिचय कराया गया। उसी दिन हम गोमती एक्सप्रेस से लखनऊ वापस आ गये।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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