आत्मकथा भाग-4 अंश-26

लिफ्ट में फँसना

मैं बता चुका हूँ कि लखनऊ में हमारा कम्प्यूटर सेंटर मंडलीय कार्यालय भवन की सबसे ऊपरी अर्थात् तीसरी मंजिल पर था और उसमें एक लिफ्ट भी लगी हुई थी। वह लिफ्ट प्रायः खराब हो जाती थी और फिर कोई मैकेनिक आकर उसे ठीक कर जाता था। ठीक करने के बाद कुछ दिन वह सही चलती थी और फिर खराब हो जाती थी। बहुत दिनों से ऐसा ही चल रहा था। वैसे तो मैं कम से कम एक बार सीढ़ियों से ही चढ़ता और उतरता था, लेकिन बाद में हर बार लिफ्ट का उपयोग करता था।
ऐसे ही एक दिन जब मैं कार्यालय से घर वापस आ रहा था, तो लिफ्ट बीच में ही रुक गयी अर्थात् खराब हो गयी। उस समय मैं दूसरी मंजिल और पहली मंजिल के बीच में था। संयोग से उस समय मैं लिफ्ट में अकेला ही था। जब लिफ्ट किसी तरह न चली, तो मैंने अपने मोबाइल से अपने दो-तीन अधिकारियों को सन्देश भेजा कि मैं लिफ्ट में फँस गया हूँ। संयोग से उनमें से एक ने मेरा सन्देश पढ़ लिया और फिर दूसरों को बताया। उन्होंने सिक्योरिटी गार्डों को बताया, जिनके पास लिफ्ट का गेट खोलने की एक मास्टर चाभी रहती थी। उन्होंने मुझे संदेश भी भेजा कि हम दरवाजा खोलने की कोशिश कर रहे हैं, परेशान मत होइए।
सिक्योरिटी गार्डों ने पहले मास्टर चाभी लगाकर दरवाजा खोलने की कोशिश की, परन्तु संयोग से दूसरी या पहली मंजिल पर वह दरवाजा नहीं खुला। किसी तरह तीसरी मंजिल का दरवाजा खोला गया। फिर लिफ्ट की बिजली बन्द करके ऊपर जाकर दो सिक्योरिटी गार्डों ने लिफ्ट के पहिये को हाथ से घुमाया। इसमें बहुत मेहनत लगती है। किसी तरह लिफ्ट के डिब्बे को नीचे से ऊपर तीसरी मंजिल पर लाया गया। तब मैं उसमें से बाहर निकला। मुझे लगभग 25 मिनट लिफ्ट में ही बन्द रहना पड़ा था, हालांकि मैं चिन्तित बिल्कुल नहीं था, क्योंकि मुझे पता था कि थोड़ी देर में मैं बाहर निकल आऊँगा।
वैवाहिक जीवन की रजत जयन्ती मनाना
6 दिसम्बर 2014 को हमारे वैवाहिक जीवन के 25 वर्ष पूर्ण हो रहे थे। हमारे दोनों बच्चों ने इस अवसर को एक बड़े समारोह के रूप में मनाने का निश्चय किया था। हालांकि मैं इस पक्ष में नहीं था, लेकिन बच्चों का आग्रह मैं नहीं टाल सका। हमने इसके लिए एक लाख का बजट रखा था, हालांकि अन्त में हिसाब लगाया तो बजट से काफी अधिक खर्च हो गया था। उस समय तक मेरी आर्थिक स्थिति काफी सुधर गयी थी, क्योंकि मुझे पुस्तकों से अतिरिक्त आय हो जाती थी और दीपांक की भी नौकरी लग गयी थी। अत: इस खर्च को मैंने वहन कर लिया।
यह कार्यक्रम आगरा में 6 दिसम्बर 2014 को एक तीन सितारा होटल में किया गया। संयोग से इसके चार दिन पूर्व अर्थात् 2 दिसम्बर को मेरे भतीजे चि. साहिल (सनी) का भी विवाह हुआ था और 3 दिसम्बर को मेरे मँझले साढ़ू के पुत्र चि. अनित का विवाह हुआ था। हमारे रजत जयन्ती कार्यक्रम में इन दोनों नवदम्पतियों ने भी भाग लिया था। उसमें हमारे अन्य बहुत से रिश्तेदार भी शामिल हुए थे। हमने केवल निकट के रिश्तेदारों को ही इस कार्यक्रम में बुलाया था।
इस कार्यक्रम के लिए बच्चों ने बहुत तैयारी की थी। उन्होंने एक विशेष प्रकार का कपड़े पर निमंत्रण पत्र छपवाया था, जिसे पुराने जमाने के पत्रों की तरह लपेटकर एक डिब्बी में रखा गया था। यह निमंत्रण पत्र उन्होंने सभी प्रमुख रिश्तेदारों के यहाँ स्वयं जाकर दिया था।
उन्होंने एक पहेली प्रतियोगिता भी आयोजित की थी, जो सामान्य ज्ञान और फिल्मों पर आधारित थी। इसका सबने बहुत आनन्द उठाया। फिर नृत्य आदि भी हुए। दोनों नव दम्पतियों ने भी नृत्य किया। हमने भी नृत्य करने की औपचारिकता निभायी। हमारे पुत्र दीपांक ने इस अवसर पर एक गीत गाया था, जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे- ‘पिता धरती पर भगवान है’।
यह कार्यक्रम जितने भव्य पैमाने पर हुआ था, उससे पहले हमारे किसी रिश्तेदार के विवाह की रजत जयन्ती उतने बड़े पैमाने पर नहीं मनायी गयी थी। हालांकि इसमें हमारे मूल बजट से काफी अधिक राशि खर्च हो गयी थी। लेकिन इसके बाद हमारे जितने भी रिश्तेदारों के विवाह की रजत जयन्ती आयी, सबने बहुत ही भव्य रूप में मनायी थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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