आत्मकथा भाग-4 अंश-9

परिवार का लखनऊ आगमन
मार्च 2011 के तीसरे सप्ताह में मैं पंचकूला पहुँच गया। श्रीमती जी ने एक पैकर्स एंड मूवर्स से पहले ही बात की हुई थी। उसी से हमने सामान पैक कराया और सामान भेजकर रात की गाड़ी से चलकर अगले ही दिन लखनऊ पहुँच गये। दोपहर तक हमारा सामान भी आ गया।
जब श्रीमती जी लखनऊ आ गयीं, तो उन्हें किराये का मकान देखकर सन्तोष हुआ। हालांकि इसमें कुछ कमियाँ भी थीं, लेकिन सुविधाओं की तुलना में कमियाँ लगभग नगण्य थीं। सबसे बड़ी सुविधा यह थी कि मकान बहुत ही सुरक्षित था और हम उसकी सुरक्षा की अधिक चिन्ता किये बिना ताला लगाकर कहीं भी आ-जा सकते थे। वहाँ कार रखने की भी पर्याप्त जगह थी। शीघ्र ही हमने अपना सामान व्यवस्थित कर लिया। सबसे अधिक कठिनाई मुझे अपनी किताबों के कार्टून रखने में हुई। मेरे पास हजारों की संख्या में किताबें हैं, जो 10-12 कार्टूनों में पैक की गयी थीं। उनके लिए यहाँ पर्याप्त अलमारी नहीं थीं। किसी तरह मैंने उनको एक कमरे में दुछत्ती पर रखवाया। अपना स्थायी निवास न होने के कारण मुझे यह कष्ट हर बार ट्रांसफर होने पर झेलना पड़ता था। अपनी आवश्यकता की कोई किताब खोजने में भी बहुत मुश्किल होती थी।
प्रियांशु की रक्षा
बाल निकेतन में जो बच्चे रहते थे, उनमें से एक का नाम था प्रियांशु सिंह। वह उस समय कक्षा 7 में पढ़ता था। वह पढ़ाई में अपनी कक्षा में प्रथम रहता था तथा अन्य विविध गतिविधियों में भी भाग लेता था। वहीं पढ़ाई के समय उसकी मित्रता अपने ही विद्यालय में एक कक्षा नीचे पढ़ने वाली एक लड़की से हो गयी। यह मित्रता इससे भी आगे बढ़कर प्रेम में परिवर्तित हो गयी। दोनों खाली समय में किसी कोने में गुफ्तगू किया करते थे। एक दिन एक अध्यापक ने उनको एक खाली कमरे में गुफ्तगू करते देख लिया। उसने लड़की की शिकायत तो उसके बाप से कर दी और प्रियांशु को खूब पीटा। बाद में उसकी भी शिकायत विद्यालय के प्रमुख श्री आर.एन. वर्मा और बाल निकेतन के प्रमुख श्री मेहरोत्रा जी से कर दी। इस पर विद्यालय की प्रबंध समिति ने उसको विद्यालय से निकालने का निर्णय किया और कह दिया कि इन परीक्षाओं के बाद स्कूल से उसका नाम काट दिया जाएगा।
जब मुझे इस निर्णय का पता चला, तो मुझे लगा कि उसने जो गलती की है, उसकी तुलना में सजा उसको बहुत अधिक दी जा रही है। पहले मैंने प्रियांशु से अकेले में बात करके उसको बहुत समझाया और कहा कि प्रेम करना गलत नहीं है, लेकिन उसका प्रकट हो जाना गलत है। इससे छवि खराब होती है और जिन्दगी भी खराब हो सकती है। इसलिए अभी अपना ध्यान केवल पढ़ाई पर लगाओ। उसने यह स्वीकार किया और मुझे वचन दिया कि आगे से ऐसी गलती नहीं करूँगा। तब मैंने उसे आश्वासन दिया कि मैं तुम्हें बचा लूँगा, लेकिन अपनी ओर से कोई ऐसा काम मत करना कि मुझे नीचा देखना पड़े।
तब मैंने प्रियांशु को स्कूल से निकालने के निर्णय का विरोध किया और वर्मा जी तथा प्रभु जी से निवेदन किया कि इस मामले पर फिर से विचार किया जाए। मैंने उनसे कहा कि प्रियांशु अपनी कक्षा में प्रथम रहने वाला लड़का है। इस उम्र में ऐसी गलती हो जाती है, पर उसे जो सजा दी जा रही है वह बहुत ज्यादा है। मैंने यह भी कहा कि मैंने उसे समझा दिया है और आगे से वह ऐसी गलती नहीं करेगा, इसकी गारंटी मैं अपने ऊपर लेता हूँ। लगभग यही बातें मैंने मिशन के कुछ अन्य प्रमुख कार्यकर्ताओं सर्वश्री गोविन्द जी, विष्णु जी, विजय प्रताप जी, भाटे जी आदि से भी कहीं और उनका समर्थन चाहा। सौभाग्य से वे मेरी बात मान गये। उन्होंने वर्मा जी से निवेदन किया कि इस मामले पर फिर से विचार किया जाए। अन्ततः प्रियांशु को स्कूल से निकालने का निर्णय उसे चेतावनी देकर रद्द कर दिया गया। मुझे यह लिखते हुए बहुत प्रसन्नता और सन्तोष है कि प्रियांशु ने अपने वचन का पूरी तरह पालन किया और बाल निकेतन में रहने तक ऐसी कोई हरकत नहीं की कि मुझे सिर नीचा करना पड़े। हमेशा की तरह वह कक्षा 8 और आगे की कक्षाओं में भी अपनी कक्षा में प्रथम रहा और कक्षा 12 उत्तीर्ण करने के बाद भी पढ़ता गया। अब वह कहीं सेवा कर रहा है।
बालनिकेतन के बच्चों की पढ़ाई
मैं पहले लिख चुका हूँ कि बालनिकेतन के अधिकांश बच्चे हमारे जिस महामना मालवीय विद्या मन्दिर में पढ़ रहे हैं, उसमें गणित और विज्ञान की पढ़ाई की व्यवस्था अच्छी नहीं है। इन विषयों के अध्यापक पर्याप्त योग्य नहीं हैं और न लग्न के साथ उनको पढ़ाते हैं। फरवरी-मार्च 2011 में लगभग एक माह तक लगातार मेरे द्वारा पढ़ाये जाने पर सभी बच्चे गणित और विज्ञान में पर्याप्त अंक लेकर उत्तीर्ण तो हो गये, परन्तु उनके अंक उतने अच्छे नहीं थे जितने होने चाहिए थे। मेरा मानना है कि गणित में अच्छे रहने वाले विद्यार्थी अन्य सभी विषयों में भी अच्छे रहते हैं। इसलिए मैंने यह तय किया कि अब लगभग रोज ही बच्चों को गणित और विज्ञान पढ़ाया करूँगा।
सौभाग्य से मैं बाल निकेतन के बहुत निकट रहता था, इसलिए मैंने यह नियम बनाया कि अपने कार्यालय से छः बजे लौटने के बाद थोड़ा जलपान करके साढ़े छः बजे बाल निकेतन चला जाया करूँगा और वहाँ साढ़े सात या पौने आठ बजे तक उनको पढ़ाया करूँगा। मैंने ऐसा ही किया और पूरे वर्ष भर लगभग 7-8 बच्चों को एक साथ कभी गणित, तो कभी विज्ञान पढ़ाने लगा।
गणित की नियमित पढ़ाई का बच्चों को बहुत लाभ हुआ। जो बच्चे पहले गणित के सवाल को देखकर ही घबरा जाते थे, अब स्वयं सोचकर उन्हें हल करने लगे। मैं केवल तभी उनकी सहायता करता था, जब वे किसी सवाल पर अटक जाते थे। इस तरह करते हुए वे सभी गणित में बहुत तेज हो गये और मार्च 2012 में जो परीक्षाएँ हुईं उनमें उन सभी के गणित में बहुत अच्छे अंक आये। मैंने अपना यह कार्यक्रम लगातार जारी रखा, यहाँ तक कि छुट्टियों के दिनों में भी। केवल जून में जब बच्चे अपने-अपने घर गये थे, यह कार्य बन्द रहा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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