आत्मकथा भाग-4 अंश-8

मकान किराये पर लेना

मार्च 2011 के आखिरी सप्ताह में मोना की हायर सेकेंडरी यानी इंटरमीडियेट की परीक्षा समाप्त होने वाली थी। मेरे मकान की लीज की अवधि भी तभी पूरी हो रही थी। दीपांक तो मैसूर में था। मुझे ही पंचकूला से सारा सामान लेकर आना था। इससे पहले मुझे लखनऊ में निवास की व्यवस्था करनी थी। बाल निकेतन के निकट रहने का इच्छुक होने के कारण मैं गोमती नगर में मकान चाहता था। सौभाग्य से मुझे विवेक खंड 2 में ठीक-ठाक सा मकान मिल गया। यह मकान बाल निकेतन से मुश्किल से 150 मीटर दूर है। यह मकान हमारे बैंक के एक बाबू श्री एस.पी. तिवारी के बड़े भाई का है, जो नगर निगम से अवकाशप्राप्त हैं। उन्हीं बाबू के माध्यम से मकान मुझे किराये पर मिल गया था। वे भी अपने बैंक के आदमी को ही मकान दिलवाना चाहते थे।
मैंने मार्च के प्रारम्भ में ही यह मकान ले लिया, क्योंकि मार्च के अन्तिम सप्ताह में हमें सामान लेकर आना था, इसलिए इसका एक महीने का किराया मुझे अपने पास से देना पड़ा। फरवरी के अन्तिम दिन मैंने विश्व संवाद केन्द्र छोड़ दिया और अपने किराये के मकान में आ गया। संयोग से कुछ दिन बाद हमारी छोटी भाभीजी भी लखनऊ आयीं, जहाँ गोमती नगर में ही उनका मायका है। मेरे आग्रह पर भाभी जी हमारे नये निवास को देखने आयीं। देखकर उन्हें मकान ठीक लगा।
मकान किराये पर लेने से सामान लाने तक की एक माह की अवधि में मैंने बालनिकेतन के बच्चों के साथ अधिक से अधिक समय बिताना प्रारम्भ किया, ताकि उनकी परीक्षा की तैयारी अच्छी हो जाये। मैं कार्यालय से छूटकर सीधे बाल निकेतन ही जाता था। वहाँ बच्चों को दो-ढाई घंटे पढ़ाकर उनके साथ ही रात्रि का भोजन करता था और कई बार भोजन के बाद भी एक घंटा पढ़ाकर अपने किराये के मकान में जाकर सोता था। बच्चों की पढ़ाई में इस प्रकार मदद करने के कारण मिशन के सभी कार्यकर्ता मुझसे बहुत प्रसन्न रहते थे। इसका एक कारण यह भी है कि बाल निकेतन के कार्य को अधिक समय देने वाला कोई अन्य कार्यकर्ता मिशन के पास नहीं है। बैठकों में तो प्रायः सभी आ जाते हैं और बीच-बीच में वैसे भी आ सकते हैं, लेकिन प्रतिदिन नियमित समय देने वाले कार्यकर्ता दुर्लभ होते हैं।
शाखा कार्य
गोमती नगर में विवेक खंड 2 के जिस मकान में मैं रहता था, उसी के सामने पास में ही एक बड़ा पार्क है, जिसके एक कोने पर पानी की बड़ी टंकी है। बालनिकेतन के लड़कों ने बताया कि उस पार्क में रोज शाखा लगती है। अतः एक दिन मैं शाखा के समय पार्क में गया। वहाँ शाखा लगी हुई थी। शाखा में उस समय केवल तीन व्यक्ति थे, जिनसे मेरा परिचय हुआ। एक, श्री मंगल सेन जैन हमारे नगर के संघचालक थे और उसी पार्क के पास नीलकंठ रेस्टोरेंट के बगल में रहते थे। उनका सीमेंट आदि का अच्छा व्यापार था, जिसको उनके दोनों पुत्र सँभालते थे। दूसरे, श्री तुला राम निमेश, जो बैंक ऑफ महाराष्ट्र से अवकाशप्राप्त अधिकारी थे और निकट ही रहते थे। तीसरे, आचार्य बाजपेयी जी, जो अवकाशप्राप्त अध्यापक थे।
मेरा परिचय जानकर इन सबको प्रसन्नता हुई। फिर मैं नियमित शाखा जाने लगा। हमारी शाखा प्रायः ठीक समय पर लगती थी, क्योंकि कम से कम संघचालक जी जैन साहब समय से 5 मिनट पूर्व ही संघस्थान पर उपस्थित हो जाते थे। मैं भी उसी समय आता था। हमारी शाखा के मुख्य शिक्षक श्री केशव जी थे, जो कहीं नौकरी करते थे। वे भी नीलकंठ रेस्टोरेंट के सामने ही एक किराये के मकान में रहते थे। परन्तु वे शाखा आने के बारे में नियमित नहीं थे और कभी-कभी दर्शन देते थे। उनके निवास से ध्वज और दंड लेने हमें जाना होता था, जो प्रायः जैन साहब ले आते थे। हमारी शाखा का समय मौसम के अनुसार प्रातः साढ़े पाँच या छः से शुरू होता था और पूरे एक घंटे शाखा चलती थी।
जिस बड़े पार्क में हमारी शाखा लगती थी, उसमें देखभाल के लिए माली तो था, परन्तु वहाँ सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए वह दिन-रात सबके लिए खुला रहता था। विशेष रूप से रात्रि के समय वह पार्क असामाजिक तत्वों का अड्डा बन जाता था। प्रायः नित्य ही हमें अपने संघस्थान के आस-पास शराब की खाली बोतलें, खाने-पीने के सामान का कूड़ा और कभी-कभी कंडोम के खाली पाउच पड़े मिलते थे। इसका एक कारण यह भी था कि पार्क के दूसरी ओर ही टुंडे कबाबी की दुकान थी, जिसे टुंडे कबाबी का कोई नकली नाती-पोता चलाता था। ऐसी दुकानें लखनऊ शहर में कई स्थानों पर चलती हैं।
गोमती नगर एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। इसे पूरा शहर ही समझिये। इसमें दस-बारह स्थानों पर शाखायें लगती थीं। हर महीने एक रविवार को सभी शाखाओं की सम्मिलित शाखा भी किसी एक स्थान पर लगती है। मैं ऐसी सम्मिलित शाखाओं में कई बार शामिल होता था। इसके लिए मुझे विराट खंड, विशाल खंड, विराम खंड, विपुल खंड आदि शाखाओं में जाना पड़ता था। इनमें हम प्रायः पैदल ही जाते थे और पैदल ही लौटते थे। कभी-कभी जैन साहब की कार से भी जाते थे।
यहाँ बता दूँ कि गोमती नगर में खंडों के नाम ‘वि’ अक्षर से प्रारम्भ होते हैं, जैसे विजय, विनय, विश्वास, विकास, विशाल, विराट, विराम, विनीत, विशेष, विपुल आदि। ये सभी सकारात्मक शब्द हैं। मजाक में मैं कभी-कभी उनको नकारात्मक शब्दों से पुकारा करता था, जैसे विलाप, विलीन, विलोप, विद्रूप, विनाश, वियोग आदि।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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