आत्मकथा भाग-4 अंश-7


पुरानी पत्र-मित्रों से सम्पर्क
जब दीपांक अपने प्रशिक्षण पर पंचकूला से मैसूर चला गया और मैं लखनऊ वापिस आने की तैयारी में था, तभी मुझे अपनी दो घनिष्टतम पत्र-मित्रों का ई-मेल प्राप्त हुआ। वे हैं श्रीमती अनिता अग्रवाल और श्रीमती नफ़ीसा नाज़। इनके बारे में मैं अपनी आत्मकथा के पहले भाग ‘मुर्गे की तीसरी टाँग’ उर्फ ‘सुबह का सफर’ में विस्तार से लिख चुका हूँ। अनिता को मैं ‘अनी’ कहता था और नफ़ीसा को ‘शहनाज़’ कहता था, जो उसे बहुत पसन्द था। जवाहरलाल नेहरू वि.वि. में पढ़ते समय ही शहनाज़ से मेरा सम्पर्क टूट गया था और अनी का मई 1983 में विवाह हो जाने पर उससे भी मेरा सम्पर्क कट गया था।
मुझे सपने में भी यह ख्याल नहीं था कि वे दोनों फेसबुक पर हो सकती हैं, नहीं तो मैं उनको खोजने की कोशिश अवश्य करता। एक बार शहनाज़ ने मुझे उलाहना भी दिया कि मैंने उसे खोजने की कोशिश क्यों नहीं की। खैर, उन दोनों ने मिलकर मुझे फेसबुक पर खोज लिया। मैंने फेसबुक पर अपना असली फोटो लगा रखा है और पूरा परिचय भी दे रखा है, इसलिए उनको पहचानने में मुश्किल नहीं हुई। पहले वे दोनों आपस में भी सम्पर्क में आयीं। फिर दोनों ने एक ही दिन मुझे अपना ई-मेल सन्देश भेजा।
क्रमशः 30 और 28 साल बाद अपनी इन सबसे घनिष्ट दो पत्र-मित्रों का ई-मेल एक ही दिन पाकर मुझे कितनी प्रसन्नता हुई, इसको शब्दों में नहीं बता सकता। वह दिन था 2 फरवरी, 2011 का। मैंने तत्काल उनके ई-मेल का उत्तर दिया। यहाँ दीपांक का लैपटाॅप, जो वह ट्रेनिंग पर अपने साथ नहीं ले गया था और जिसमें हमने इंटरनेट की सुविधा ले रखी थी, मेरे बहुत काम आया। मैंने दोनों को अपने द्वारा दिये गये नामों से पुकारा, इससे उनको शत-प्रतिशत विश्वास हो गया कि उन्होंने सही व्यक्ति को खोजा है। पंचकूला में मैं खाली रहता ही था, इसलिए उनसे थोड़ी चैटिंग अर्थात् नेट पर लिखित बातचीत कर लेता था।
पूछताछ करने पर पता चला कि अनिता जी इलाहाबाद में अपने परिवार की कुलवधू के रूप में सफल गृहस्थी चला रही हैं। उनके एक पुत्र हैं वरुण, जो उस समय अविवाहित थे। वे एम.टेक. कर चुके हैं, पहले वे भी इन्फोसिस में नौकरी कर रहे थे, लेकिन अब अपना कपड़े का पारिवारिक व्यापार सँभालते हैं और कभी-कभी पार्टटाइम आधार पर किसी संस्थान में इंजीनियरिंग पढ़ाते भी हैं। अनिता के कोई पुत्री नहीं है।
शहनाज के एक पुत्र मुस्तफा और एक पुत्री तसनीम है। पुत्र इंजीनियर हैं और बम्बई में कार्यरत हैं और तसनीम मंगलौर में डाक्टरी की पढ़ाई कर रही हैं। शहनाज़ स्वयं बहुत दिनों तक टीचर रही थीं और अपने पति श्री अबुली नीमचवाला के साथ भारत के विभिन्न शहरों और लीबिया में रहने के बाद इस समय अबू धाबी में रहती हैं, जहाँ उनके पति एक कम्पनी में महाप्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं। बच्चे भारत में और पति अपने कार्यालय में व्यस्त रहने के कारण शहनाज के पास काफी खाली समय होता है, जिसका उपयोग वे घूमने-फिरने में करती हैं। कभी-कभी मुझसे चैटिंग भी करती हैं।
उन दोनों को मेरी उपलब्धियों के बारे में जानकर बहुत प्रसन्नता हुई। दीपांक और मोना के बारे में जानकर दोनों को बहुत अच्छा लगा। जब मैंने बताया कि मेरी कम्प्यूटर पर लगभग 60 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, तो उनको बहुत ही आश्चर्य हुआ। वे दोनों मेरी जिन्दगी के बारे में अधिक-से-अधिक जानना चाहती थीं। जब मैंने उन्हें बताया कि मैंने दो-तीन भागों में अपनी आत्मकथा लिख रखी है, तो वे उसको पढ़ने के लिए उत्सुक हो गयीं।
मैंने लखनऊ आते ही पहला कार्य यह किया कि उन दोनों को अपनी आत्मकथा का पहला भाग भेज दिया। घोर आश्चर्य कि शहनाज़ ने पहले भाग को केवल दो दिन में पूरा पढ़ डाला और दूसरा भाग भेजने के लिए दबाब डालने लगी। फिर मैंने उसे दूसरा भाग भी भेजा। उस भाग में मैंने राम मन्दिर आन्दोलन की चर्चा करते समय मुसलमानों के प्रति कुछ कड़ी टिप्पणियाँ कर दी थीं। शहनाज़ ने इसका बहुत बुरा माना। मैंने एक जगह राजीव गाँधी पर भी मजाक किया था, वह भी उसे असहनीय लगा। जब मैंने अपनी लिखी आत्मकथा को फिर से पढ़ा, तो मुझे भी लगा कि कुछ टिप्पणियों से बचा जा सकता था। इसलिए मैंने उसको कई जगह सुधार दिया और राजीव गाँधी का मजाक उड़ाने वाला प्रसंग तो पूरा ही निकाल दिया। सुधारी हुई आत्मकथा को देखकर शहनाज़ भी संतुष्ट हो गयी, जिससे मुझे प्रसन्नता हुई।
फिर उसने तीसरा भाग भी जल्दी पूरा करने पर जोर दिया और मैंने उसके कहने से उसे पूरा करके भेज दिया। वह भी उसे बहुत अच्छा लगा।
अनिता ने आत्मकथा के पहले भाग को काफी दिनों में पढ़कर पूरा किया। लेकिन जब उसने पढ़ लिया, तो बहुत प्रसन्न हुई। उसे इस बात का सन्तोष था कि मैंने अपनी आत्मकथा में उनके बारे में सत्य ही लिखा था, कोई गलत या काल्पनिक बात नहीं की थी। पहला भाग पूरा करने के बाद उसने भी दूसरा भाग मँगाया, लेकिन उसे काफी दिनों में ही पूरा पढ़ सकी। ये दोनों अभी भी मेरे व्हाट्सएप सम्पर्क में हैं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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