आत्मकथा भाग-4 अंश-4
राव साहब ने दीपांक की रुचि और जानकारी के अनुसार एक ऐसा पैकेज बनाने का प्रोजैक्ट दिया, जिसकी सहायता से इस संस्थान में तथा बैंक के अन्य संस्थानों में होने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों की ऑन-लाइन माॅनीटरिंग यानी देखभाल की जा सके। इसमें प्रशिक्षणार्थियों के नामांकन से लेकर उनकी उपस्थित देने और प्रमाणपत्र जारी करने तक के कई कार्य शामिल होने थे। यह प्रोजैक्ट दीपांक और गगनदीप ने इतनी कुशलता से कम समय में ही पूरा कर दिखाया कि राव साहब बहुत प्रभावित हुए। वे संस्थान में आने वाले प्रत्येक उच्च अधिकारी के सामने इस पैकेज का प्रदर्शन कराते थे और उनसे सुझाव माँगते थे। उन सुझावों के अनुसार पैकेज को सुधारा जाता था। अन्त में पूरी तरह संतुष्ट होने पर पैकेज को ऑन-लाइन ही नहीं, बल्कि लाइव कर दिया गया।
यह पैकेज उन्होंने पीएचपी नामक साॅफ्टवेयर में तैयार किया था, जिसका ज्ञान उस समय संस्थान के किसी अधिकारी को नहीं था। दीपांक के जाने के बाद इसका रखरखाव करने की समस्या हो जाती। इसलिए राव साहब ने भविष्य के बारे में सोचकर दीपांक से कहा कि यह साॅफ्टवेयर संस्थान के अधिकारियों को सिखा दो। तब दीपांक ने नियमित कक्षाएँ लेकर संस्थान के अधिकारियों को यह साॅफ्टवेयर सिखाया। इसी बीच राव साहब ने उसके प्रोजैक्ट को 3 माह बढ़वा दिया। इससे मेरी चिन्ता खत्म हुई और संस्थान का भी लाभ हुआ। उन तीन महीनों का हालांकि दीपांक और गगनदीप को कोई पारिश्रमिक नहीं मिला, लेकिन राव साहब ने अधिकारियों को पढ़ाने के बदले में उन्हें अतिथि संकाय (गेस्ट फैकल्टी) मानकर कुछ मानदेय दे दिया था। यह राव साहब की महानता ही कही जाएगी।
संघ कार्य
मैं चाहे देश के किसी भी भाग में रहूँ, संघ के कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में सबसे पहले आ जाता हूँ। लखनऊ तो मेरा पुराना कार्यक्षेत्र रहा है, इसलिए अनेक स्वयंसेवक बंधु मेरे पूर्व परिचित हैं। विश्व संवाद केन्द्र, जहाँ मैं ठहरा था, लखनऊ में संघ के चार प्रमुख केन्द्रों में से एक है। वहाँ नियमित तौर पर स्वयंसेवकों तथा कार्यकर्ताओं की बैठकें हुआ करती हैं और वर्ग भी लगा करते हैं, जिनमें अनेक प्रचारक बंधु भी भाग लेते हैं। लखनऊ के अधिकांश प्रचारकों से मेरा पूर्व परिचय था, शेष से यहाँ आने पर हो गया। मा. कृपा शंकर जी यहाँ के प्रान्त प्रचारक थे, वे मुझे बहुत स्नेह करते थे। अन्य प्रचारकों के अतिरिक्त सह प्रान्त प्रचारक मा. मुकेश खांडेकर और प्रांतीय बौद्धिक प्रमुख मा. संजय कुमार मिश्र से मेरा परिचय यहीं आने पर हुआ। बीच-बीच में ऐसे प्रचारक भी लखनऊ आते रहते हैं, जिनका केन्द्र कहीं और है। वे विश्व संवाद केन्द्र में आते थे, तो मेरा परिचय उनसे भी कराया जाता था।
विश्व संवाद केन्द्र में प्रातः 6 बजे भूमितल पर स्थित अधीश सभागार में शाखा लगती थी। प्रारम्भ में केवल एक पुजारी जी शाखा लगाते दिखाई देते थे। फिर मैं नियमित आने लगा। मैं जो योग क्रियायें पंचकूला में करता और कराता था, वे ही यहाँ करने लगा और जो शाखा आते थे उनको भी कराने लगा। धीरे-धीरे शाखा में 8-10 व्यक्ति नियमित आने लगे। जब गर्मियों के दिन होते थे, तो कभी-कभी केन्द्र की खुली छत पर शाखा लगायी जाती थी। उस छत पर किसी राज मिस्त्री की लापरवाही से जगह-जगह सीमेंट के छोटे-छोटे टीले बने हुए थे, जो पैरों में बहुत चुभते थे और बहुत खराब भी लगते थे। मैंने थोड़ा-थोड़ा रोज खुरचकर कुछ ही दिनों में वे सारे टीले साफ कर दिये, जिससे छत बहुत अच्छी लगने लगी थी।
संजय जी के घुटनों का उपचार
अवध प्रान्त के तत्कालीन बौद्धिक प्रमुख मा. संजय मिश्र विश्व संवाद केन्द्र में ही एक कमरे में रहा करते थे और ज्यादातर लिखने-पढ़ने का कार्य करते थे। केन्द्र तीन मंजिल का होने के कारण उसमें एक छोटी सी लिफ्ट भी लगी हुई है। एक दिन मा. अमरनाथ जी ने मुझे बताया कि संजय जी के घुटने लिफ्ट का बहुत अधिक उपयोग करने से खराब हो गये हैं और उनमें दर्द होता है। मैंने संजय जी के घुटनों को देखा, तो यह बात सत्य पायी, उनके घुटने बहुत सूजे हुए भी थे। वे दूसरी मंजिल पर रहते थे और सरलता से सीढ़ियाँ नहीं चढ़ पाते थे, इसलिए लिफ्ट का उपयोग करते थे। उनको चलने में भी बहुत कष्ट होता था, जिससे प्रवास पर भी बहुत कम जाते थे।
यह पता चलते ही मैंने संजय जी को लिफ्ट का उपयोग करने से एकदम रोक दिया। मैंने उनसे कहा कि सीढ़ियाँ चढ़ने और उतरने में चाहे कितना भी कष्ट हो और कितना भी समय लगे, लेकिन आपको लिफ्ट का उपयोग नहीं करना है। इसके साथ ही मैंने उन्हें शाखा में बुलाकर पैरों और विशेष रूप से घुटनों के व्यायाम कराना शुरू किया। प्रारम्भ में संजय जी को बहुत कष्ट हुआ, लेकिन एक माह के अन्दर ही वे सरलता से चलने लगे और उनके घुटनों की सूजन भी कम हो गयी। लगभग दो माह में वे सरलता से सीढ़ियाँ भी चढ़ने और उतरने लगे और उनके घुटनों का दर्द बहुत कम रह गया। तीसरे माह में उनके घुटनों का दर्द भी जाता रहा और उनके पैर लगभग पूरी तरह ठीक हो गये।
इसके साथ ही उनका प्रवास भी अधिक होने लगा और उनकी सक्रियता बढ़ गयी। कालान्तर में उनको प्रान्त प्रचारक का बहुत महत्वपूर्ण दायित्व दिया गया, जिसे उन्होंने बड़े परिश्रम और योग्यता से निभाया। स्मरणीय है कि संघ में प्रान्त प्रचारक का दायित्व किसी राज्य के मुख्यमंत्री के समकक्ष होता है। उनको लगातार प्रवास करना पड़ता है और पूरे प्रान्त की शाखाओं तथा अन्य गतिविधियों की देखरेख करनी पड़ती है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें