आत्मकथा भाग-4 अंश-3
विभागीय सहयोगी
जिस समय मैंने डीआरएस में पहली बार प्रवेश किया था, उस समय वहाँ 7 अधिकारी पदस्थ थे। उनमें सबसे वरिष्ठ थे श्री गोविन्द दास (वरिष्ठ प्रबंधक)। उनके अलावा सर्वश्री संजय सिंह, ब्रजेश दोहरे, मुकेश बाबू और श्रीमती आएशा सिद्दीकी प्रबन्धक (आईटी) थे तथा श्री वीरभद्र सिंह और कु. निधि मिश्रा अधिकारी (आईटी) थे। मुझसे पहले वहाँ आठवें अधिकारी थे श्री राजीव रस्तोगी, जो मेरे आने के पूर्व ही प्रधान कार्यालय स्थानांतरित हो गये थे। इनमें से मुकेश बाबू कुछ ही महीने बाद बैंक से असंतुष्ट होकर एक प्राइवेट कम्पनी में चले गये थे और अब वे विदेश में किसी बड़ी पोस्ट पर सेवा कर रहे हैं।
जब मैंने डीआरएस में पदार्पण किया था, तभी मेेरे एक हितैषी अधिकारी, जो मेरे घनिष्ठ मित्र और पूर्व सहकारी भी हैं, ने मुझे चेता दिया था कि डीआरएस के सभी अधिकारी श्री श्रवण कुमार श्रीवास्तव के चमचे हैं, जो उस समय तक जीएम (आईटी) बन गये थे और बैंक के आईटी विभाग के सर्वेसर्वा थे। श्री श्रीवास्तव मेरे ही बैच के थे और कानपुर में कुछ माह तक मेरे साथ भी रह चुके थे। उनके बारे में मैं पिछले भाग में विस्तार से लिख चुका हूँ। विभाग में बातचीत करते समय मैं इस बात पर बहुत सावधान रहता था कि मेरे मुँह से श्री श्रीवास्तव के विरुद्ध कोई बात न निकल जाये, क्योंकि दूसरे अधिकारी उस बात को बढ़ा-चढ़ाकर उनके पास पहुँचाकर मेरी छवि धूमिल कर सकते थे।
हमारे विभाग डीआरएस का मुख्य कार्य था- बैकअप सर्वर को हमेशा चालू हालत में रखना। इसके लिए हमें कई बातों की व्यवस्था करनी पड़ती थी, जैसे- यूपीएस और उसकी बैटरियों का रखरखाव करना, बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना, एयर कंडीशनरों को लगातार चालू रखना और सर्वर रूम का तापमान उचित स्तर पर बनाये रखना, जनरेटरों को चालू हालत में रखना और उनके लिए पर्याप्त डीजल का स्टाॅक रखना, आग बुझाने के यंत्रों को भी चालू हालत में रखना आदि-आदि। हालांकि इन सब कार्यों के लिए वेंडर कम्पनियों का स्टाफ वहाँ लगातार रहता था, लेकिन हमें भी उनके कार्याें पर नजर रखनी होती थी और इसीलिए हमारा एक न एक अधिकारी हर समय विभाग में उपस्थित रहता था।
इसी कारण हमारा विभाग 24 घंटे खुला रहता था। अधिकारी 8-8 घंटे की तीन शिफ्टों में आते थे। हमारा कम से कम एक अधिकारी हर शिफ्ट में हर समय अवश्य उपस्थित रहता था। शेष अधिकारी सामान्य शिफ्ट में आते थे, जो साढ़े दस बजे से सायं साढ़े पाँच बजे तक होती थी। सभी अधिकारियों को आवश्यकता के अनुसार शिफ्टें आवंटित की जाती थी। मेरा प्रमुख कार्य यही था। जब कोई अधिकारी अवकाश पर जाता था, तो उसकी जगह किसी अन्य अधिकारी की ड्यूटी लगानी पड़ती थी। वैसे तो इसमें कोई समस्या नहीं आती, लेकिन यदि कभी दो या तीन अधिकारी एक साथ छृट्टी पर चले जाते थे, तो ड्यूटी लगाने में बड़ी समस्या आ जाती थी। ऐसी स्थिति में मैं महिला अधिकारियों को छुट्टी के दिन भी शिफ्ट ड्यूटी करने के लिए बुला लेता था। उनको केवल दिन की और प्रातःकाल की शिफ्टों में बुलाया जाता था। सामान्यतया मैं किसी अधिकारी को छुट्टी देने से मना नहीं करता था और कई बार अधिकारियों की सुविधा के अनुसार ड्यूटी बदली भी जाती थी। इस कारण सभी अधिकारी मुझसे संतुष्ट रहते थे।
वैसे हमारे विभाग में हर समय रौनक रहती थी। हर तीन महीनों में एक बार ड्रिल होती थी। उस समय हम सभी अधिकारी उपस्थित रहते थे और कभी-कभी बैंक के खर्च पर होटल का भोजन करते थे। वहाँ हर महीने ही हमारे किसी न किसी अधिकारी का जन्मदिन या विवाह की वर्षगाँठ आती थी, जिस पर उन्हें पार्टी देनी होती थी और हम सभी उनको कोई गिफ्ट भी देते थे।
दीपांक की प्रोजैक्ट
जिस समय मेरा लखनऊ स्थानांतरण हुआ था, तो दीपांक इंजीनियरिंग के छठे सेमेस्टर में था। सातवें सेमेस्टर में उसे 6 माह का एक प्रोजैक्ट करना था, जो कम्प्यूटर से सम्बंधित होना चाहिए था। मैं यह सोचकर चिन्तित हुआ कि यदि दीपांक को प्रोजैक्ट करने के लिए पंचकूला से बाहर जाना पड़ा, तो उसकी माँ और बहिन को बहुत परेशानी हो जाएगी। इसलिए मेरा प्रयास था कि चंडीगढ़ में ही किसी कम्पनी में उसे प्रोजैक्ट मिल जाये। मेरा ज्यादा कम्पनियों से परिचय नहीं था, फिर भी प्रोजैक्ट किसी भी कम्पनी में हो सकता था। परन्तु प्रोजैक्ट की शर्त यह थी कि उसे कुछ पारिश्रमिक भी मिलना चाहिए था। अधिकांश कम्पनियाँ छात्रों से मुफ्त में प्रोजैक्ट और काम करवाने को तो तैयार हो जाती हैं, लेकिन पारिश्रमिक देने में रोने लगती हैं, जब तक कि उन छात्रों की ऊँची पहुँच न हो। मेरी ऐसी कोई पहुँच नहीं थी, इसलिए मैंने सोचा कि हमारे बैंक में ही प्रोजैक्ट हो जाये, तो अच्छा रहेगा।
पंचकूला के सहायक महाप्रबंधक श्री नागेश्वर राव ने इसमें हमारी बहुत सहायता की तथा नाममात्र के पारिश्रमिक पर केवल तीन माह के प्रोजैक्ट की अनुमति प्रधान कार्यालय से मिल गयी। हमने सोचा कि तीन माह करा लेते हैं, बाकी अवधि के बारे में फिर सोचा जाएगा। इस प्रोजैक्ट में दीपांक के साथ ही उसका एक सहपाठी मित्र गगनदीप सिंह भी था। उसका एक तीसरा मित्र भी इसी प्रोजैक्ट में आना चाहता था, परन्तु बैंक से केवल दो की अनुमति मिली थी। इसलिए दीपांक और गगनदीप सिंह ने श्री राव साहब के निर्देशन में प्रोजैक्ट प्रारम्भ कर दिया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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