आत्मकथा भाग-4 अंश-23
पत्रिका ‘जय विजय’ की वेबसाइट चलाना
प्रारम्भ में हम अपनी पत्रिका के लिए रचनाकारों से रचनाएँ कागज पर लिखवाकर या छपी हुई मँगवाते थे, जिनको मैं स्वयं टाइप करके लगा देता था। प्रारम्भ में पत्रिका केवल 8 पृष्ठों की होती थी, जिसके लिए सामग्री एकत्र करने में मुझे कोई कठिनाई नहीं होती थी। दो पेज की सामग्री मैं स्वयं लिखता था, जिसमें खट्ठा-मीठा शीर्षक से एक व्यंग्य अवश्य होता था। आधे पृष्ठ का सम्पादकीय तो लिखता ही था। कई रचनाकारों की सामग्री हम उनके फेसबुक पेज से भी लेते थे, जिसके लिए पहले उनसे पूछ लिया जाता था। इस प्रकार नये-नये रचनाकार पत्रिका से जुड़ते रहते थे। एक बार उनकी रचना पत्रिका में छप जाती थी, तो वे स्वयं ही हर माह अपनी रचना ईमेल से भेज देते थे।
तब हमने विचार किया कि यदि पत्रिका की वेबसाइट हो तो अधिक अच्छा रहेगा। मुझे वेबसाइट बनाने का अधिक ज्ञान नहीं था। केवल एचटीएमएल में एकाध वेबपेज बनाना मैं जानता था। लेकिन वेबसाइट बनाने के लिए अधिक ज्ञान की आवश्यकता होती है, जो मेरे पास नहीं था। सौभाग्य से मेरा पुत्र दीपांक इस कार्य में कुशल हो गया था। उसने मेरे आग्रह करने पर हमारी पत्रिका की वेबसाइट वर्ड प्रेस में बना दी और उसके लिए एक डोमेन नाम भी खरीद लिया। इसमें कई सौ रुपये खर्च हुए, लेकिन वेबसाइट बन जाने पर पत्रिका का महत्व और अधिक बढ़ गया।
हमने अपने रचनाकारों को पत्रिका की वेबसाइट में पंजीकृत करना शुरू किया। हम उनको एक यूजरनाम और पासवर्ड भी देते थे, जिनकी सहायता से वे अपनी रचनायें सीधे वेबसाइट पर लगा सकते थे। इससे मुझे बहुत आराम हो गया और सामग्री भी अधिक आने लगी। बहुत से रचनाकार अभी भी ईमेल से ही अपनी रचनाएँ भेजा करते थे, उनको भी मैं उनकी ओर से अर्थात् उनके पासवर्ड से वेबसाइट पर लगा देता था। कभी कभी डाक से भी रचनायें आती थीं। उनको भी मैं स्वयं टाइप करके वेबसाइट पर लगाता था।
महीने के अन्त में मैं वेबसाइट पर एक माह में लगायी गयी सभी रचनाओं को पढ़कर उनमें से छापने योग्य रचनाओं को अलग रखता था, फिर उन्हें मिलाकर पेजमेकर में पत्रिका तैयार करता था। मेरा यह प्रयास रहता था कि पत्रिका में रचना देने वाले प्रत्येक रचनाकार की कम से कम एक रचना अवश्य प्रकाशित हो जाये। इससे रचनाकारों का मनोबल बना रहता है और वे पत्रिका से लगाव अनुभव करते हैं। जैसे-जैसे अधिक से अधिक रचनाकार पत्रिका से जुड़ते गये, वैसे-वैसे पत्रिका के पृष्ठों की संख्या भी बढ़ती गयी और हमारी पत्रिका की प्रतिष्ठा भी बढ़ी।
वर्तमान में हमारी पत्रिका ‘जय विजय’ पिछले 6 वर्षों से निरन्तर प्रकाशित हो रही है। उससे पहले लगभग दो वर्ष तक यह ‘युवा सुघोष’ के नाम से छपती रही थी। इस समय लगभग एक हजार रचनाकार इससे जुड़े हुए हैं जिनमें से लगभग 200 सक्रिय रहते हैं, शेष या तो निष्क्रिय हो गये हैं या कभी-कभी दर्शन दे जाते हैं। मेरी नीति प्रारम्भ से ही नये रचनाकारों को प्रोत्साहित करने की रही है। इसलिए मैं पत्रिका से जुड़ने के इच्छुक रचनाकारों को कभी मना नहीं करता और यदि उनकी कोई रचना प्रकाशित करने योग्य होती है, तो अवश्य प्रकाशित करता हूँ।
पहले पत्रिका के सम्पादक के रूप में बृज नन्दन जी का नाम रहता था और प्रबंध-सम्पादक के रूप में मेरा। लेकिन बाद में बृज नन्दन जी पत्रिका में कुछ सहायता नहीं कर पाते थे, इसलिए मैंने उनका नाम हटा दिया। वेबसाइट पर लगायी गयी रचनाओं को सम्पादित करने के लिए भी मुझे अपना बहुत समय खर्च करना पड़ता था, इसलिए सहायता के लिए मैंने कई बार अन्य रचनाकारों को सह सम्पादक के रूप में पत्रिका से जोड़ा, जिनमें प्रमुख हैं- श्रीमती विभा श्रीवास्तव, श्री अरविन्द कुमार साहू, श्री सौरभ कुमार दुबे आदि। परन्तु उनमें से कोई भी मेरी वैसी सहायता नहीं कर सका, जैसी मुझे अपेक्षा थी। केवल शोभा के लिए नाम देना मुझे उचित नहीं लगा, इसलिए मैंने पूरा सम्पादकीय मंडल भंग करके सम्पादक का सारा दायित्व स्वयं सँभाल लिया। इसमें मुझे बहुत समय अवश्य लगाना पड़ता है, लेकिन पत्रिका का स्तर बना रहता है।
मैंने फेसबुक पर भी पत्रिका का पेज बना रखा है। उसके माध्यम से पत्रिका सभी फेसबुक मित्रों तक पहुँचाने का प्रयास करता हूँ।
रचनाकारों का सम्मान
मैं अपनी पत्रिका के रचनाकारों का सम्मान भी करता हूँ और उनको सम्मान पत्र भेजता हूँ। साल में एक बार पिछले वर्ष सक्रिय रहे रचनाकारों में से विभिन्न विधाओं जैसे कविता, गजल, लेख, लघुकथा, कहानी, हास्य-व्यंग्य आदि में से प्रत्येक के लिए तीन रचनाकारों को मैं नामित करता हूँ। फिर उन पर अन्य रचनाकारों के मत लिये जाते हैं। सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले रचनाकारों को मैं सम्मान पत्र भेजता हूँ। यह योजना लगभग 5 वर्ष से चल रही है और बहुत लोकप्रिय है। एक बार सम्मानित हो चुके रचनाकारों को मैं दोबारा नामित नहीं करता, ताकि अधिक से अधिक रचनाकारों को सम्मानित किया जा सके।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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