आत्मकथा भाग-4 अंश-22

मासिक पत्रिका ‘युवा सुघोष’ निकालना

जब मैं विश्व संवाद केन्द्र में रहता था, तो मेरे एक नये स्वयंसेवक मित्र बने श्री बृज नन्दन यादव। वे बाराबंकी जिला के अन्तर्गत रुदौली तहसील के निकट के किसी गाँव के रहने वाले हैं। घर में मामूली खेती होती है और उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। लेकिन वे संघ कार्य को पूर्ण समर्पित हैं। वे विश्व संवाद केन्द्र में रहकर संघकार्य करते थे और बुलेटिन निकालने में सहायता करते थे। बाद में वे हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी में संवाददाता हो गये थे और मान्यता प्राप्त पत्रकार बन गये थे। मेरे साथ उनकी बहुत घनिष्ठता हो गयी थी।
2011 में जब मैं विश्व संवाद केन्द्र छोड़कर किराये के मकान में गोमती नगर में रहने लगा था, तो केन्द्र का साप्ताहिक बुलेटिन लगभग बन्द हो गया था, क्योंकि उस समय वहाँ पेजमेकर पर कार्य करने का जानकार कोई नहीं रह गया था और समाचार संकलन में भी लापरवाही की जाती थी। जब तक मैं वहाँ था, तो यह नियमित होता था और मैं उसमें स्वयं भी लेख तथा व्यंग्य लिखा करता था, दूसरों से भी लिखवाता था।
बुलेटिन बन्द हो जाने के बाद बृज नन्दन जी ने मुझे सुझाव दिया कि मुझे एक मासिक पत्रिका निकालनी चाहिए। उन्होंने मुझसे वायदा किया कि वे अपने गाँव तहसील के आस-पास उसके 200 नियमित ग्राहक बना देंगे, जिससे पत्रिका का खर्च निकल आएगा। मैं यह करना नहीं चाहता था, क्योंकि पत्रिका कम्प्यूटर पर तैयार करना तो सरल था, लेकिन उसे प्रेस में छपवाना, फिर डिस्पैच करना और ग्राहकों का हिसाब रखना बड़े झंझट का काम था। लेकिन बृज नन्दन जी के लगातार जोर देने पर मैं तैयार हो गया। उस समय मेरा ब्लाॅग लेखन भी बन्द था। पत्रिका का नाम मैंने ‘सुघोष’ रखना चाहा, जो बहुत समय से मेरे दिमाग में था। यह पांडवों में से एक नकुल के शंख का नाम था। बृज नन्दन जी ने उसमें युवा शब्द होने पर जोर दिया। अन्ततः पत्रिका नाम ‘युवा सुघोष’ रखा गया।
पत्रिका का पंजीकरण कराना
बृज नन्दन जी ने यह भी कहा कि हमें अपनी पत्रिका का नाम पंजीकृत करा लेना चाहिए, क्योंकि उसमें बाद में सरकारी विज्ञापन मिल सकते हैं जिनसे पत्रिका का खर्च निकल आएगा। इसलिए हमने पत्रिका को पंजीकृत करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। यह भी बहुत झंझट का काम होता है, जिसमें पुलिस वेरीफिकेशन आदि भी किया जाता है और कई जगह दक्षिणा देनी पड़ती है। खैर मुझे अधिक कुछ नहीं करना पड़ा। सारा काम बृज नन्दन जी ने ही किया था। पत्रिका के लिए विकल्प के रूप में कई नाम बताने पड़ते हैं, ताकि यदि एक नाम न मिल सके तो दूसरा मिल जाए। मैंने विकल्प में ‘जय विजय’ नाम सबसे ऊपर रखा था। कई महीने प्रयास करने के बाद वही नाम स्वीकृत होकर आ गया और पत्रिका पंजीकृत हो गयी। हालांकि इस पंजीकरण का हर साल बाद नवीनीकरण कराना पड़ता है, पर इसकी चिन्ता कोई नहीं करता।
प्रारम्भ में पत्रिका को किसी प्रेस में छपवाया गया। हम 500 प्रतियाँ छपवाते थे। बृज नन्दन जी ने उसके लगभग 60 ग्राहक बनाये और उनके शुल्क भी एकत्र किये। परन्तु यह पर्याप्त नहीं था, इसलिए शुरू में तीन चार अंक प्रेस में छपवाने के बाद मेरा धैर्य समाप्त हो गया, क्योंकि हर माह मेरे दो हजार रुपये इसमें खर्च होते थे और ग्राहक बढ़ने की संभावना लगभग शून्य थी। इसलिए मैंने यह तय किया कि जितने ग्राहक हैं उनके लिए फोटोकाॅपी से पत्रिका छापकर भेज दिया करूँगा। इससे मेरा भारी खर्च बच सकता था। मैंने ऐसा ही किया। हजरतगंज में एक सरदार जी की कम्प्यूटर छपाई और फोटोकाॅपी की बड़ी दुकान है। मैं वहीं सस्ते में पत्रिका की फोटोकाॅपी करा लेता था और पत्रिका भेज देता था। ऐसा लगभग एक साल चला। एक साल बाद सभी ग्राहकों की ग्राहकी समाप्त हो गयी। मैंने किसी का नवीनीकरण नहीं किया। इसलिए पत्रिका छपवाने की बाध्यता भी समाप्त हो गयी।
छपाई के साथ ही मैंने पत्रिका की पीडीएफ फाइल तैयार करना शुरू कर दिया था, जिसे ईमेल द्वारा पाठकों को भेज दिया जाता था। इसका कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। मुझे यह करना अधिक सुविधाजनक लगा, इसलिए ग्राहकों के चन्दे का एक साल पूरा होने के बाद ही मैंने फोटोकाॅपी द्वारा पत्रिका छापकर भेजना भी बन्द कर दिया और केवल पीडीएफ को ईमेल से भेजता रहा। धीरे-धीरे पत्रिका के पाठकों की संख्या बढ़ गयी और लगभग एक हजार लोगों को पत्रिका भेजी जाती रही। बाद में यह संख्या बढते बढते दस हजार को भी पार कर गयी। लेकिन इतने ईमेल पतों को सँभालना और उनको हर महीने पत्रिका भेजना भी एक जटिल कार्य है, क्योंकि मैं मुफ्त के जीमेल का उपयोग करता था और आज भी करता हूँ। इसलिए कई बार इसमें बाधायें आती रहती हैं।
मैंने नभाटा के ब्लाॅगर के रूप में अपने अनुभवों को सभी के साथ साझा करने के लिए एक लेखमाला भी लिखी थी, जो फेसबुक पर भी डाली थी। पर वह लेखमाला अभी अधूरी है। इस लेखमाला में मैं यह स्पष्ट करना चाहता था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दम भरने वाले ये तथाकथित पत्रकार किस तरह एक स्वतंत्र लेखक का गला घोंटने पर उतारू हो जाते हैं। इसको मैंने अपनी पत्रिका में भी छापा था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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