आत्मकथा भाग-4 अंश-21
फेसबुक में सक्रिय होना
अभी तक मैं फेसबुक पर मामूली रूप से ही उपस्थित था, अधिक सक्रिय नहीं था। लेकिन नभाटा में ब्लाॅग लिखना बन्द करने के बाद मैंने फेसबुक पर अधिक समय देना प्रारम्भ कर दिया। उसमें मैंने लेख आदि लिखना शुरू कर दिया था। समय-समय पर मैं उसमें अपने विचार प्रकट करता था और आज भी वहीं सक्रिय हूँ। वह समय था सन् 2013 का, जब राजनीति में श्री नरेन्द्र मोदी बड़े राष्ट्रीय नेता के रूप में उभर रहे थे। वे लगातार तीसरी बार गुजरात विधानसभा का चुनाव भारी बहुमत से जीत चुके थे और अब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लगभग स्वीकृत हो गये थे। उनको भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के लिए मैंने फेसबुक पर जोरदार अभियान चलाया था और ऐसे कई लेख लिखे थे।
उन दिनों जिन संघ प्रचारकों से मेरी भेंट होती थी, मैं उनसे भी जोर देकर कहता था कि मोदी जी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित कर देना चाहिए। यदि भाजपा ऐसा नहीं करेगी, तो एक प्रकार से आत्महत्या ही करेगी। कुछ प्रचारक मोदी जी के बारे में कहते थे कि वे बहुत अक्खड़ और कठोर हैं। मैं कहता था कि हमें ऐसा ही प्रधानमंत्री चाहिए, अटल जी की तरह रिरियाने वाला नहीं। मुझे हार्दिक सन्तोष है कि मेरे प्रयास निष्फल नहीं गये और अन्ततः मोदी जी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया गया।
इसके बाद मैंने मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए फेसबुक का भरपूर उपयोग करना शुरू किया। फेसबुक पर अधिकतम 5 हजार मित्र बनाने की अनुमति है। जब मैं फेसबुक पर सक्रिय हुआ, तो मेरे पास बहुत से मित्रता प्रस्ताव प्रतिदिन आते थे। मैं उनको तत्काल स्वीकार कर लेता था, बिना कोई जाँच किये, क्योंकि मैं अपने विचारों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना चाहता था। मैं स्वयं भी दूसरे लोगों को मित्रता प्रस्ताव भेजता था। शीघ्र ही मेरी फेसबुक मित्र मंडली में पूरे 5 हजार लोग हो गये। फिर तो बहुतों के प्रस्ताव प्रतीक्षा सूची में रहने लगे।
मेरी मित्रसूची में कई गलत लोग भी जुड़ गये थे। पता चलते ही मैं ऐसे लोगों को सीधे बाहर का रास्ता दिखा देता था और ब्लाॅक भी कर देता था, ताकि आगे मुझे परेशान न करें।
अखिल भारतीय निबंध प्रतियोगिता में पुरस्कार
हिन्दी दिवस के अवसर पर या वैसे भी प्रायः बैंकों में निबंध तथा अन्य प्रतियोगितायें होती रहती हैं। जब भी मुझे समय से इनकी सूचना मिल जाती थी, तो मैं इन प्रतियोगिताओं में भाग लेता था। मुझे कई बार इन प्रतियोगिताओं में प्रथम, द्वितीय या तृतीय पुरस्कार मिला था। पुरस्कार में कुछ मामूली नकद राशि या पुस्तकें या कई बार घरेलू वस्तुएँ जैसे बर्तन, क्राॅकरी आदि मिलती थीं। मुख्य प्रबंधक बन जाने के बाद भी इन प्रतियोगिताओं में भाग लेना मैंने बन्द नहीं किया। कई बार ऐसा भी होता था कि मैंने किसी प्रतियोगिता में प्रथम या द्वितीय स्थान पाया, लेकिन सम्बंधित हिन्दी अधिकारी की लापरवाही से मुझे कोई पुरस्कार नहीं मिला। पर मैं इन पर अधिक जोर नहीं देता था। भाग लेना ही मेरे लिए पर्याप्त था।
इन सभी प्रतियोगिताओं का उल्लेख करना यहाँ व्यर्थ ही होगा। लेकिन एक का उल्लेख अवश्य करना चाहूँगा। वह निबन्ध प्रतियोगिता एक अन्य सरकारी बैंक सिडबी (SIDBI) द्वारा आयोजित की गयी थी और वह पूरे देश के बैंक कर्मचारियों तथा अधिकारियों के लिए खुली थी। मैंने उस प्रतियोगिता में तब भाग लिया था, जब मैं नया-नया लखनऊ आया था। उसका परिणाम भी दो तीन महीने बाद आ गया, जिसमें मुझे तृतीय पुरस्कार मिलने की सूचना थी। पुरस्कार राशि रु 5000 थी, जो अब तक मेरे लिए सबसे बड़ी पुरस्कार राशि है।
इस प्रतियोगिता का पुरस्कार वितरण समारोह लखनऊ में ही आयोजित होना था, परन्तु वहाँ के उच्च अधिकारी के उपलब्ध न होने के कारण कई बार टला। अन्ततः एक दिन वह समारोह आयोजित हुआ। वहाँ की प्रमुख राजभाषा अधिकारी श्रीमती अनिता सचदेवा ने मुझे इसमें शामिल होने का आग्रह किया।
मैं उसमें भाग लेने के लिए अपने विभाग की एक अधिकारी कु. निधि मिश्रा को साथ ले गया, क्योंकि वहाँ मुझे लिखकर बताने की आवश्यकता थी। निधि ने इस जिम्मेदारी को बहुत योग्यता से निभाया। वहाँ सब लोग समझ रहे थे कि वह मेरी पुत्री है, जिसे मैं अपनी सहायता के लिए साथ लाया हूँ। पुरस्कार वितरण से पहले सभी को अपना परिचय देना था। मैं तो अन्य पुरस्कार विजेताओं के साथ एक गोल मेज पर बैठा था और निधि मेरे ही पीछे एक कुर्सी पर बैठी थी। उसने मुझे लिखकर बताया कि क्या-क्या बताना है।
जब मेरा नम्बर आया, तो मैंने अपना परिचय दिया। उसमें मैंने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने, नौकरी करने, पुरस्कार में जापान यात्रा करने और कई दर्जन पुस्तकें लिखने तक का उल्लेख किया था। मेरे परिचय के बीच में कई बार तालियाँ बजी थीं, जिससे मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। फिर पुरस्कार वितरण हुआ, सम्मिलित फोटो खींचा गया और अच्छे जलपान के साथ समारोह सम्पन्न हुआ।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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