आत्मकथा भाग-4 अंश-20

जीपीओ के सामने पटेल पार्क में बहुत से वृद्ध सज्जन टहलने आया करते थे, जो विभिन्न विभागों से अवकाशप्राप्त थे। वे टहलना और व्यायाम तो कम करते थे, लेकिन गप्पें बहुत मारते थे। मैंने उनमें से कई को व्यायाम करना सिखाया। एक सज्जन रीढ़ के दर्द से पीड़ित रहते थे, मैंने उनको रीढ़ के व्यायाम बताये और अपने सामने कराये। वे व्यायाम नियमित करने से उनकी रीढ़ का दर्द लगभग समाप्त हो गया।

मैं जब शाखा के लोगों को व्यायाम कराता था, तो वहाँ आने वाली कुछ महिलायें थोड़ी दूर पर खड़े होकर उन्हीं व्यायामों को करती थीं। यह मुझे बहुत अच्छा लगता था। कुछ ही दिनों में वे बहुत से व्यायाम सीख गयीं और अपने आप करने लगीं।
कुम्भ स्नान
सन् 2013 में प्रयागराज में पूर्ण कुम्भ लगा। मेरी बहुत इच्छा थी इसमें जाने की, क्योंकि मैंने कभी कोई कुम्भ नहीं देखा था। कई बार जाने की योजना बनी, लेकिन भीड़ के कारण हिम्मत नहीं होती थी। जब कुम्भ का अन्तिम मुख्य स्नान हो गया, तो मैंने अगले ही दिन कुम्भ में स्नान करने का निश्चय कर लिया। मेरे कार्यालय के साथी श्री गोविन्द दास और श्री मनीष रस्तोगी भी मेरे साथ चलने को तैयार हो गये।
लखनऊ से एक गाड़ी प्रातः ही प्रयागराज जाती है। हम टिकट लेकर उसी में बैठ गये और आराम से प्रयाग स्टेशन पर उतर गये। जैसा कि हमें अनुमान था, वहाँ पर बहुत भीड़ थी, क्योंकि अधिकांश यात्री वहीं उतरते हैं। किसी तरह हमें एक टैम्पो मिला, जो कुम्भ मेला स्थल तक यात्रियों को ले जा रहा था। हम उसमें बैठकर कुम्भ क्षेत्र में जाकर उतरे। उस समय तक कुम्भ लगभग समाप्त हो गया था, फिर भी वहाँ बहुत भीड़ थी।
वहाँ से काफी दूर पैदल चलकर हम संगम के निकट पहुँचे। वहाँ स्नान के लिए कच्चे घाट बनाये गये थे। हर घाट पर बल्लियों का बाड़ा भी बनाया गया था। हमने बाड़े के अन्दर ही स्नान किया, जो पूरी तरह सुरक्षित था, क्योंकि उसमें पानी केवल मेरी गर्दन तक था। उस समय दोपहर के 11 बज चुके थे, इसलिए भीड़ अधिक नहीं थी। गंगाजल बहुत ठंडा था, वैसे भी ठंड थी, पर स्नान करने में बहुत आनन्द आया। हमने बारी-बारी से स्नान किया, क्योंकि हममें से एक को कपड़ों और सामान की रखवाली भी करनी थी।
स्नान के बाद पहले हमने एक मन्दिर के पास एक पेड़ के नीचे बैठकर भोजन किया, जो हम घर से लेकर आये थे। फिर हम संगम के पास के स्थानों अर्थात् मन्दिरों को देखने गये। एक मन्दिर में बहुत लम्बी लाइन लगी हुई थी, जो शायद सोते हुए हनुमान जी का मन्दिर था। मैं जानबूझकर भीड़ में नहीं गया। बाहर ही सामान की रखवाली करता रहा। बाकी दोनों साथी लाइन में लगकर दर्शन कर आये।
फिर हम पास के किले में गये, जिसे गलती से ‘अकबर का किला’ कहा जाता है। उस परिसर में एक बहुत पुराना वटवृक्ष है, जिसके आसपास गुफानुमा मन्दिर बना दिया गया है। नीचे गुफा में अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ रखी गयी हैं। लोग लाइन लगाकर उनको देखते हैं। उस दिन वहाँ भीड़ कम थी। हमें बताया गया कि इस मन्दिर में कभी-कभी घंटों तक लाइन में लगने के बाद ही दर्शन करने का अवसर मिलता है। मैंने सभी मूर्तियों को ध्यान से देखा था। वैसे वहाँ भी पंडे-पुजारी भी अन्य मन्दिरों की तरह अपना धन्धा कर रहे थे, जिससे मुझे बहुत वितृष्णा होती है।
उस स्थान से निकलकर हम एक गहरे कुँए के पास आये, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसमें धरती में काफी नीचे बहने वाली सरस्वती नदी का पानी है। वह पानी ऊपर से दिखाई पड़ता है, परन्तु उसमें से पानी निकालने की अनुमति नहीं होती। इसलिए इस बात की पुष्टि नहीं की जा सकती कि यह वास्तव में सरस्वती नदी का ही पानी है या कोई अंधविश्वास है। वैसे भी धरती के अन्दर बहुत सी जलधारायें बहती रहती हैं। यदि उनमें से सरस्वती की जलधारा भी बह रही हो, तो आश्चर्य की कोई बात नहीं होगी। लेकिन इसकी पूरा जाँच करके वास्तविकता को सामने लाना चाहिए।
वहाँ से निकलने के बाद हमने एक जगह जल पिया। वह जल शुद्ध था और मीठा था। तब तक हम थक गये थे और लौटने की भी चिन्ता थी। अतः समय नष्ट किये बिना चल दिये। विचार यह हुआ कि यदि हम प्रयाग स्टेशन से बैठेंगे, तो शायद बैठने का स्थान न मिले, इसलिए सीधे सेंट्रल स्टेशन से बैठना उचित रहेगा, जहाँ से गाड़ी प्रारम्भ होती हैं। यह निश्चय करके हम पूरा ऑटो तय करके इलाहाबाद सेंट्रल स्टेशन पहुँच गये। उस समय दोपहर के तीन बजे थे।
वहाँ यात्रियों की बहुत भीड़ थी। गाड़ियों का कुछ पता नहीं था। किसी तरह पूछताछ करने पर पता चला कि लखनऊ के लिए एक गाड़ी थोड़ी देर में आएगी। हम उसका इंतजार करने लगे।
उसी समय मैंने प्रयागराज में रहने वाली अपनी मित्र अनिता अग्रवाल को बताया कि मैं संगम में स्नान करके आया हूँ और इस समय सेंट्रल स्टेशन पर हूँ। उसने मुझसे घर आने को कहा, जो वहाँ से मुश्किल से दो किमी दूर होगा। पर मेरी जाने की हिम्मत नहीं हुई, क्योंकि गाड़ी का कुछ पता नहीं था और अकेले मैं जाना नहीं चाहता था। अतः टाल गया।
वह रेलगाड़ी लगभग 4 बजे आयी। हम उसमें आराम से बैठ गये, पर वह 5 बजे चली। उससे हम लखनऊ लगभग साढ़े 8 बजे पहुँच गये। रास्ते में हमने अपने बचे हुए भोजन का सेवन कर लिया। लखनऊ जंक्शन पर उतरकर हम अपने-अपने रास्ते चले गये। इस प्रकार कुम्भ में संगम में स्नान करने का हमारा संकल्प पूरा हुआ और हम बिना किसी कष्ट के अपने घर सुरक्षित आ गये।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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