आत्मकथा भाग-4 अंश-2

लखनऊ में

पिछले भाग में मैं लिख चुका हूँ कि अपने स्थानांतरण का आदेश आने के बाद मैं 6 मार्च 2010 (शनिवार) को पंचकूला से विरमित कर दिया गया। मैं 8 मार्च (सोमवार) को प्रातःकाल ही लखनऊ आ गया और निर्धारित समय पर अपने कार्यालय में भी उपस्थिति दे दी। मेरे निवास की व्यवस्था विश्व संवाद केन्द्र में हुई थी। वहाँ के पिछले प्रमुख श्री राजेन्द्र सक्सेना मेरे घनिष्ट मित्र हैं। वे उस समय गोरखपुर में थे। उनकी जगह आये थे मा. अमर नाथ जी, जिनसे वाराणसी में मेरा परिचय मेरे अति घनिष्ट मित्र मा. चन्द्र मोहन जी के माध्यम से हुआ था। ये सभी संघ के जीवनव्रती प्रचारक हैं। इसलिए विश्व संवाद केन्द्र में मेरे निवास की व्यवस्था होने में कोई कठिनाई नहीं हुई। अवध (लखनऊ) के प्रान्त प्रचारक मा. कृपा शंकर जी ने भी यहाँ मेरे निवास की अनुमति दे दी थी, इसलिए मुझे कोई चिन्ता नहीं थी।
उस समय मेरे मन में आया कि अगर मैं अपना लखनऊ वाला मकान न बेचता अर्थात् दो साल और रुक जाता, तो यहाँ रहकर उसे ठीक करा लेता और उसी में रहता। परन्तु शायद प्रभु की इच्छा नहीं थी कि मैं ‘अपने’ मकान में जाकर रहूँ।
विश्व संवाद केन्द्र, जियामऊ में कैंसर अस्पताल के पीछे और पानी की टंकी के सामने है और हमारे हजरतगंज स्थित मंडलीय कार्यालय से केवल डेढ़ किमी दूर है। अतः मेरे लिए काफी सुविधाजनक था। वहाँ एक चार मंजिला भवन है, जिसमें 20-25 कमरे हैं। ऊपर की दोनों मंजिलें लगभग खाली पड़ी थीं। वहीं पहले अतिथि कक्ष में, फिर एक कमरे में मैंने अपनी व्यवस्था कर ली। प्रारम्भ में अपने कमरे में मैं अकेला ही था, बाद में एक-दो विद्यार्थी भी आ गये। मुझे इससे कोई असुविधा नहीं थी, क्योंकि मेरी आवश्यकतायें बहुत सीमित हैं।
मैं अपने नाश्ते के लिए चने भिगोकर अंकुरित करता था और साथ में दूध या दही पी लेता था। दोपहर का भोजन मैं अपने कार्यालय के पास एक होटल में किया करता था। सायंकाल के भोजन के लिए मैं जियामऊ में ही किसी होटल में जाता था, जिन्हें यहाँ मैस कहा जाता है। वास्तव में जियामऊ हजरतगंज के पास होने तथा किराये के कमरे सस्ते में मिल जाने के कारण यहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों की एक बड़ी संख्या है। उनके भोजन की व्यवस्था के लिए यहाँ दर्जनों मैस खुल गयी हैं। वहीं उचित दाम में शुद्ध सात्विक घर जैसा भोजन मिल जाता है। वहीं प्रातः नाश्ते में आलू के परांठे भी मिलते हैं, जो मैं कभी-कभी खा लेता था। बाद में मैंने एक मैस में नियमित जाना प्रारम्भ किया, जो एक विधवा महिला चलाती थी। उसे सभी विद्यार्थी ‘भाभी’ कहते थे। उसका खाना बहुत अच्छा होता था। लेकिन लगभग 4-5 माह बाद ही वह अचानक चली गयी, क्योंकि वह जगह किराये की थी। फिर मैंने एक जगह से शाम को टिफिन मँगाना शुरू किया, जो केन्द्र छोड़ने तक चलता रहा। इस प्रकार कुल मिलाकर मेरे भोजन की व्यवस्था संतोषजनक थी।
वैसे विश्व संवाद केन्द्र में भी भोजन बनता था, पर वह केवल पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं तथा अतिथियों के लिए था, हमारे जैसे गृहस्थों के लिए नहीं। इसलिए मैं हमेशा बाहर का खाना खाता था।
कार्यालय का हाल
लखनऊ में मेरी पदस्थापना इलाहाबाद बैंक के हजरतगंज स्थित मंडलीय कार्यालय लखनऊ में डी.आर.एस. विभाग में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के रूप में हुई थी। तकनीकी दृष्टि से तो हमारा विभाग लखनऊ मंडलीय कार्यालय के अन्तर्गत था और हम वहीं से अपना वेतन, छुट्टी आदि भी लेते थे, लेकिन वास्तव में यह मंडल से पूरी तरह स्वतंत्र था और हम सीधे प्रधान कार्यालय को ही रिपोर्ट करते थे।
हमारे विभाग का पूरा नाम ‘डिजैस्टर रिकवरी साइट’ था। वास्तव में, हमारे बैंक का मुख्य सर्वर मुम्बई में लगा हुआ है, जिससे बैंक की सभी शाखाएँ जुड़ी हुई हैं। हमारे विभाग में उसी सर्वर का बैकअप सर्वर है। यदि किसी कारणवश या दुर्घटनावश मुम्बई का सर्वर और उसका मिरर सर्वर दोनों असफल हो जाते हैं, जिसकी संभावना बहुत कम है, तो कुछ ही घंटों में हमारे विभाग के सर्वर को उसका कार्य करने के लिए चालू कर दिया जाएगा। अभी उस पर प्रत्येक 15 मिनट के अन्तराल पर इस बीच होने वाले सभी लेन-देनों का बैकअप लिया जाता है।
हर तीन महीने बाद अर्थात् साल में लगभग 4 बार हमारे सर्वर की जाँच भी की जाती थी। किसी निर्धारित दिन मुम्बई के सर्वर के कार्य क्रमशः हमारे सर्वर पर स्थानांतरित किये जाते हैं। जब सभी कार्य स्थानांतरित हो जाते हैं, तो उनको पूरे 24 घंटे या अधिक समय तक हमारे सर्वर के माध्यम से ही किया जाता है और मुम्बई का सर्वर इसके बैकअप का कार्य करता है। इस अवधि में सभी कार्यों की जाँच भी की जाती है। समय पूरा होने पर फिर सभी कार्यों को क्रमशः मुम्बई के सर्वर पर स्थानांतरित किया जाता है और सभी कार्य स्थानांतरित हो जाने पर हमारा सर्वर फिर बैकअप का कार्य करने लगता है। यह एक जटिल लेकिन अनिवार्य प्रक्रिया है, ताकि किसी संकट के समय हमारा सर्वर धोखा न दे जाये। यहाँ इस प्रक्रिया को ‘ड्रिल’ कहा जाता है।
सर्वर की देखरेख का मुख्य कार्य टाटा कंसल्टेंसी सर्विस (टी.सी.एस.) नामक कम्पनी द्वारा किया जाता था। उसके कई अधिकारी यहाँ कार्यरत थे। टी.सी.एस. के अधिकारियों के तीन समूह थे- सिस्टम, नेटवर्क और विंडोज। हर समूह से कम से कम एक अधिकारी हर समय हमारे केन्द्र पर अवश्य उपस्थित रहता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आत्मकथा भाग-4 अंश-62 (अन्तिम)

आत्मकथा भाग-4 अंश-61

आत्मकथा भाग-4 अंश-21