आत्मकथा भाग-4 अंश-19

 रेणु दीदी की दुर्घटना

हमें अपने नये फ्लैट में आये हुए अधिक दिन नहीं हुए थे कि श्रीमती वीनू की बड़ी बहिन श्रीमती रेणु एक भयंकर दुर्घटना का शिकार हो गयीं। वे अपने भाई श्री आलोक के साथ एक बाइक पर पीछे बैठकर कहीं जा रही थीं कि बगल से अचानक आये एक साँड़ ने उनको टक्कर मार दी। टक्कर खाकर वे सड़क पर गिर पड़ीं और बेहोश हो गयीं। आलोक साफ-साफ बच गये। रेणु दीदी को तुरन्त ही निकट के एक नर्सिंग होम में ले जाया गया। जहाँ उनका ऑपरेशन और उपचार हुआ।
जब इस दुर्घटना का समाचार लखनऊ आया था, तब मैं अपने कार्यालय में था। कैप्टेन राजीव सिंह ने यह समाचार मुझे दिया और यह भी बताया कि श्रीमती वीनू इस दुर्घटना के कारण बहुत सदमे में हैं और रो रही हैं। यह जानकर मैं तत्काल घर गया और उनको सँभाला। वे तत्काल आगरा जाने की जिद कर रही थीं। इसलिए मैंने उनका और अपना आरक्षण इंटरसिटी में करा दिया। मोना की पढ़ाई के कारण उसे वहीं रुकना पड़ा था।
दुर्घटना वाले दिन ही रेणु दीदी का ब्रेन का ऑपरेशन हुआ। पता नहीं क्यों डाॅक्टर ने इसमें जल्दबाजी की। उनको प्रत्यक्षतः कोई चोट नहीं थी, केवल अन्दरूनी चोट थी, जिसके लिए ऑपरेशन कराना अनिवार्य नहीं था। लेकिन डाॅक्टर ने शायद अपनी कमाई के लिए उनका अनावश्यक ऑपरेशन कर डाला। घर में किसी ने इसका विरोध नहीं किया, क्योंकि वे डाॅक्टरों पर आवश्यकता से अधिक विश्वास करते हैं। डाॅक्टर कह रहा था कि ऑपरेशन न कराने पर रेणु दीदी की जान को खतरा है।
ऑपरेशन होने के बाद रेणु दीदी की ‘जान का खतरा’ तो टल गया, परन्तु उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। बहुत दिनों तक उनको आईसीयू में रखा गया। एक के बाद एक कई अस्पताल बदले गये, आगरा के अच्छे से अच्छे डाॅक्टरों की सलाह ली गयी, लेकिन रेणु दीदी बेहोशी की अवस्था में ही बनी रहीं। कई महीने आईसीयू में रहने के बाद उनकी आँखें खुलीं, पर वे बोलने की स्थिति में नहीं थीं। फिर उनको घर ले आया गया। लगभग 25 महीने वे जिन्दा लाश की तरह पड़ी रहीं और फिर स्वर्ग सिधार गयीं। इसी बीच उनके एक मात्र पुत्र का विवाह भी हो चुका था और वे शायद अपनी बहू का मुँह देखने को ही जीवित थीं। उस विवाह के दो-तीन महीने बाद ही उनका देहान्त हो गया।
रेणु दीदी मुझे बहुत प्यार करती थीं। वे भोजन बनाने की विशेषज्ञ थीं। उनके हाथ में न जाने क्या जादू था कि उनका बनाया हुआ भोजन बहुत स्वादिष्ट होता था। जब भी हम वाराणसी, कानपुर, पंचकूला या लखनऊ से आगरा जाते थे, तो वे हमारे लिए स्पेशल भोजन बनाती थीं। वे अपनी सभी बहनों में सबसे अधिक सुन्दर भी थीं और सिलाई-कढ़ाई आदि कई कलायें भी जानती थीं। उनके जाने के बाद हमारे जीवन में एक खालीपन-सा आ गया था। आज भी सब लोग उनको बहुत याद करते हैं।
जीपीओ में शाखा लगाना
गोमती नगर से शिफ्ट होकर विधानसभा के निकट बैंक के फ्लैट में आ जाने के बाद हमारी शाखा भी बदल गयी। वहाँ आसपास केवल एक सार्वजनिक पार्क है- सरदार पटेल पार्क, जिसे बोलचाल में जीपीओ पार्क कहते हैं, क्योंकि यह बड़े चौराहे पर मुख्य डाकघर के बगल में ही है। मुझे बताया गया था कि वहाँ शाखा नियमित लगती है। यह हमारे फ्लैट से लगभग पौन किमी दूर है, पर मुझे आने जाने में कोई समस्या नहीं थी। मैं मजे में टहलता हुआ जाता था और वहाँ कुछ योग-व्यायाम करने के बाद टहलता हुआ वापस आता था। कभी-कभी श्रीमती जी भी मेरे साथ जाती थीं।
लेकिन वहाँ शाखा की स्थिति अच्छी नहीं थी। वहाँ के मुख्य शिक्षक थे श्री राज कुमार। वे वैसे तो रोज नियमित शाखा आते थे, परन्तु कई बार बहुत देर से आते थे। उनको एक बार हृदयाघात हो चुका था, इसलिए वे कोई व्यायाम वगैरह नहीं करते थे। बस ध्वज लगाते थे, कुछ टहलते थे, फिर प्रार्थना बोलकर ध्वज उतार ले जाते थे। शाखा में और कोई कार्यक्रम नहीं होता था। इस कारण शाखा आने वालों की संख्या बहुत कम थी। उस शाखा का क्षेत्र हमारे बैंक के निकटवर्ती नरही से लेकर हुसैनगंज तक था, क्योंकि वहाँ और कोई पार्क नहीं था। कभी कभी नरही से एक दो स्वयंसेवक और हुसैनगंज से एक दो बच्चे आ जाते थे।
जब मैंने शाखा जाना शुरू किया, तो अपनी आदत के अनुसार अनेक व्यायाम, योगासन और प्राणायाम भी शाखा में स्वयं करता और दूसरों को कराता था। रोज एकाध गीत भी कराता था। इससे धीरे-धीरे शाखा की संख्या बढ़ने लगी। गर्मी की छुट्टियों और रविवार को तो शाखा में 10-15 बच्चे और 5-7 बड़े आ जाते थे। तब मैं खेल भी कराता था। इससे शाखा व्यवस्थित हो गयी।
गोमती नगर में मुझे नगर के शारीरिक प्रमुख का दायित्व दिया गया था। यहाँ भी वही दायित्व दिया गया। हमारे नगर संघचालक थे श्री सुभाष चन्द्र अग्रवाल। वे बहुत सीधे और सरल सज्जन हैं। वे मुझे बहुत प्यार करते थे। संयोग से वे महामना मालवीय मिशन में भी सक्रिय थे और उसके कार्यक्रमों में नियमित आते थे। जब तक मैं लखनऊ में रहा, तब तक नियमित इस शाखा में जाता रहा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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