आत्मकथा भाग-4 अंश-18

मैंने जागरण जंक्शन पर भी अपना ब्लाॅग बना रखा था, परन्तु वहाँ पाठकों की संख्या गिनी-चुनी ही थी, इसलिए मेरा मन उससे उचट गया। मैंने अपनी पोस्ट सुरक्षित रखने के लिए ब्लाॅगस्पाॅट पर भी अपना ब्लाॅग बना रखा है और अपनी महत्वपूर्ण पोस्ट उस पर भी डालता हूँ। नभाटा में डाली गयी सभी पोस्ट वहाँ भी काॅपी करके सुरक्षित कर दी हैं।

वैसे नभाटा में ब्लाॅग लिखने पर मुझे आर्थिक लाभ भी होता था। वह ऐसे कि हमें हर पोस्ट के लिए और उस पर आने वाली हर टिप्पणी के लिए कुछ अंक मिलते थे। वे अंक एकत्र होते जाते थे। अधिक अंक एकत्र हो जाने पर हम उनके बदले में कोई वस्तु भेंट में पा सकते थे। मैंने ऐसी कई उपयोगी वस्तुएँ मँगायी थीं, जैसे प्रेस, जूतों का रैक, लैपटाॅप का स्टैंड, बैग आदि। लेकिन ये सभी चीजें घटिया क्वालिटी की होती थीं जो जल्दी ही बेकार हो जाती थीं।
यह आश्चर्यजनक है कि जब मैंने नभाटा पर ब्लाॅग लिखना बन्द कर दिया, तो नभाटा के ब्लाॅग के पाठकों और लेखकों की संख्या भी एकदम कम हो गयी। अब वहाँ बहुत कम लेखक रह गये हैं और पाठक तो नाम मात्र के ही हैं। अब अंकों के बदले वस्तुएँ मिलना भी बन्द हो गया है और केवल गिफ्ट वाउचर मिलते हैं जिनका उपयोग केवल विलासिता की वस्तुएँ खरीदते समय किया जा सकता है।
बैंक का फ्लैट मिलना
हमारे बैंक (इलाहाबाद बैंक) के लखनऊ में कई स्थानों पर फ्लैट हैं, जो पद और उपलब्धता के अनुसार अधिकारियों तथा कर्मचारियों को आवंटित किये जाते हैं। मैं जब मार्च 2010 में पंचकूला से स्थानांतरित होकर लखनऊ आया था, तो मुझे आते ही जून-जुलाई 2010 में बैंक का फ्लैट मिल रहा था, परन्तु मैंने नहीं लिया। इसका कारण यह था कि मैंने एक साल तक अपना पंचकूला वाला मकान रोक रखा था। इसलिए मैंने अपनी बारी वाला फ्लैट अपने मित्र कैप्टेन राजीव सिंह के लिए छोड़ दिया था, जिनके बारे में मैं पिछले भाग में लिख चुका हूँ।
पहले वे कानपुर में प्रबंधक (सुरक्षा) थे। फिर वरिष्ठ प्रबंधक (सुरक्षा) के रूप में लखनऊ में पदस्थ हो गये थे। उनको ऑफिस के निकट ही फ्लैट की अधिक आवश्यकता थी, क्योंकि उनका अपना पुश्तैनी मकान पुराने लखनऊ में काफी दूर था और उनकी पुत्री गोमती नगर के केन्द्रीय विद्यालय में पढती थी।
फिर मार्च 2011 में जब मेरा परिवार लखनऊ आ रहा था, तो मुझे फ्लैट की आवश्यकता थी, परन्तु संयोग से उस समय कोई फ्लैट निकट में खाली नहीं था। एक फ्लैट हमारे बैंक के इन्दिरा नगर स्टाफ कालेज परिसर में उपलब्ध था, परन्तु बहुत अधिक दूर होने और आने-जाने की समस्या के कारण मैंने नहीं लिया। मैं निकट में फ्लैट खाली होने की प्रतीक्षा कर रहा था। तब तक के लिए मैंने गोमती नगर में एक किराये का मकान ले लिया था।
अन्ततः लगभग एक साल किराये के मकान में रहने के बाद मई 12 में मुझे बैंक का फ्लैट एलाट हुआ। हमारे सहायक महाप्रबंधक श्री आहलूवालिया का अचानक स्थानांतरण हो गया था, इसलिए उनका फ्लैट खाली होते ही मुझे आवंटित कर दिया गया। उन्होंने कुछ समय पूर्व ही अपने फ्लैट की पुताई और फर्निशिंग करायी थी, इसलिए मुझे फिर से कुछ कराने की आवश्यकता नहीं थी। फ्लैट की चाभी मिलते ही मैं और श्रीमती जी उसे देखने गये और देखकर संतुष्ट हो गये। उसमें सारा फर्नीचर था, एक एसी भी लगा हुआ था। दूसरी ओर हमारे पास भी पूरा फर्नीचर था, इसलिए हमने अपने फर्नीचर के मोटे-मोटे आइटम आगरा भेज दिये, जहाँ उनका उपयोग होने लगा। शेष सामान हम अपने नये फ्लैट में ले आये।
यह फ्लैट सेक्रेटरियेट के बिल्कुल सामने प्रतिभा सिनेमा के पीछे पड़ता था, जिसे अक्षय भवन कहते हैं। वास्तव में यह परिसर किसी पुराने राजा की सम्पत्ति है, जिसने अपनी सम्पत्ति का कुछ भाग फ्लैट बनाने के लिए किसी बिल्डर को बेच दिया था और वहाँ लगभग 20 बड़े फ्लैट बनाये गये थे। उनमें से 8 फ्लैट बैंक ने खरीद रखे थे, जिनको वरिष्ठ अधिकारियों को आवंटित किया जाता था। यह स्थान मेरे कार्यालय हजरतगंज चौराहे से ठीक एक किमी की दूरी पर है। इसलिए मेरे लिए पैदल आना-जाना सरल था। विधानसभा के पीछे से वहाँ तक आने जाने का सरल और छोटा रास्ता भी है।
हमारा फ्लैट तीसरी मंजिल पर था। लिफ्ट लगी हुई थी, परन्तु कई बार लिफ्ट खराब हो जाती थी। तब हमें सीढ़ियों से चढना पड़ता था। पर मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं थी। वैसे भी दिन में एक बार तो मैं जानबूझकर सीढ़ियों से ही चढता-उतरता था, ताकि पैरों और घुटनों का अच्छा व्यायाम हो जाये। वहाँ दिन-रात सिक्योरिटी की व्यवस्था थी, अतः सुरक्षा की कोई चिन्ता नहीं थी। कमी बस एक ही थी कि वहाँ कोई बाजार नहीं है। वहाँ से लगभग आधा किमी दूर पर उदयगंज मोहल्ला है। वहाँ सब्जी और आवश्यकता की अन्य वस्तुएँ मिल जाती थीं।
हमारी मंजिल पर ही सामने के एक फ्लैट में कैप्टेन राजीव सिंह रहते थे। उनकी पत्नी श्रीमती वन्दना सिंह को हमारे आने से बहुत प्रसन्नता हुई। पहले वे कानपुर में डायटीशियन थीं, पर बाद में उन्होंने काम छोड़ दिया था और अपनी गृहस्थी सँभाल रही थीं। उनके एक पुत्री है, जो उस समय कक्षा 6 या 7 में पढ़ रही थी। हमसे ठीक नीचे वाले फ्लैट में मेरे विभाग के प्रबंधक (आईटी) श्री ब्रजेश दोहरे रहते थे। ऊपर-नीचे और भी कई परिचित अधिकारी रहते थे। वहाँ से मोना का काॅलेज और मैक इंस्टीट्यूट भी निकट ही था। इसलिए हमें बहुत आराम था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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