आत्मकथा भाग-4 अंश-17
लघु फिल्म या वीडियो बनाना
मैं लिख चुका हूँ कि हमारी पुत्री आस्था जागरण चौराहे के निकट स्थित मैक नामक संस्थान में 3-डी एनिमेशन का कोर्स कर रही थी। मार्च 2012 में इसी के एक प्रोजेक्ट के रूप में उसे एक छोटी-सी वीडियो फिल्म बनानी थी, जो शिक्षा के महत्व पर थी। उसमें अधिक अभिनेता नहीं थे, केवल तीन भूमिकायें थीं। एक विद्यार्थी की, एक उसके मजदूर पिता की और एक किसी राह चलते आदमी की। राह चलते आदमी की भूमिका तो मोना के एक सहपाठी ने की, छात्र की भूमिका के लिए मैंने बाल निकेतन के एक विद्यार्थी अनुराग मौर्य को तैयार किया और उसके पिता की भूमिका के लिए बाल निकेतन छात्रावास के वार्डन श्री सुधाकर अवस्थी तैयार हो गये। हमारे घर के सामने सड़क पर और वहीं एक खाली पड़े प्लाॅट में हमने इसकी शूटिंग की। इसका निर्देशन मोना ने किया था और मैंने भी अपने सुझाव दिये थे।
आवश्यक सम्पादन के बाद लगभग 3 मिनट की जो फिल्म बनी वह सबको अच्छी लगी।
नभाटा पर ब्लॉग लेखन
नवभारत टाइम्स अखबार की वेबसाइट का ‘अपना ब्लॉग’ स्तम्भ पहले बहुत लोकप्रिय था। मैं जब समाचारों के लिए इस वेबसाइट को देखता था, तो इस स्तम्भ को भी पढ़ता था। कभी-कभी मैं सोचता था कि मुझे भी अपना ब्लाॅग लिखना चाहिए और नियमित रूप से उस पर अपने विचार प्रकट करने चाहिए। उससे पहले मैं केवल विश्व संवाद केन्द्र, लखनऊ के साप्ताहिक बुलेटिन या पत्रिका में कभी-कभी लेख, व्यंग्य आदि लिखा करता था और प्रायः उनको फेसबुक पर भी डाल देता था। लेकिन मैंने अनुभव किया कि मुझे ब्लाॅग स्तम्भ का लाभ उठाना चाहिए, ताकि मेरी बात अधिक लोगों तक तथा प्रबुद्ध लोगों तक भी पहुँचे।
काफी सोच-विचार के बाद मैंने जनवरी 2012 में ब्लाॅग लिखना प्रारम्भ किया। इसके पूर्व दिसम्बर 2011 में ही मैंने ब्लाॅगर के रूप में नभाटा पर अपना पंजीकरण करा लिया था और वहाँ से मुझे पासवर्ड भी मिल गया था, जिससे मैं अपने ब्लाॅग पर कार्य कर सकता था। मैं संवाद केन्द्र पत्रिका में ‘खट्ठा-मीठा’ नाम से व्यंग्य लेख लिखा करता था, इसलिए मैंने अपने ब्लाॅग का नाम भी ‘खट्ठा-मीठा’ ही रखा।
इस ब्लाॅग का एक नियम था कि हम तीन दिन में केवल एक लेख ही इस पर डाल सकते थे, हालांकि टिप्पणियाँ करने के बारे में कोई सीमा नहीं थी। हम अपने ब्लाॅग को शिड्यूल भी कर सकते थे, अर्थात् उसके लाइव होने का समय सेट कर सकते थे। मैंने इसका लाभ उठाते हुए हर चौथे दिन एक पोस्ट डालना प्रारम्भ किया। मैं विषय बदल-बदलकर पोस्ट बनाता था। राजनीति, इतिहास, धर्म, सामाजिक विषय, साहित्य आदि पर प्रायः मैं लिखता था। बीच-बीच में हास्य-व्यंग्य भी लिखता था और कभी-कभी गणित की पहेलियाँ भी पूछता था।
मेरा ब्लाॅग प्रारम्भ से ही बहुत लोकप्रिय हुआ। ब्लाॅग पर लिखने वाले और टिप्पणी करने वाले अनेक सज्जन मेरे पक्के समर्थक और मित्र बन गये थे। उनमें से कई आज भी मेरे सम्पर्क में हैं। उनमें से कुछ के नाम लिख रहा हूँ- सर्वश्री सचिन सोनी, रंजन माहेश्वरी, कमल कुमार सिंह, सचिन परदेसी, केशव संजय, राज कुमार हैदराबादी, श्रीमती लीला तिवानी, अनिल कुमार सिंह उर्फ आलू प्रसाद, विजय बाल्याण, सौरभ कुमार दुबे, सचिन श्रीवास्तव, अनवर जमाल खाँ, गंगाराम, हुकम सिंह, बालकृष्ण गुरनानी आदि। सम्भव है कि एकाध का नाम मैं भूल गया हूँ।
मैं अपने विचारों को खुलकर अपने ब्लाॅग पर प्रकट करता था, जो बहुत से मुसलमान पाठकों को पसन्द नहीं आता था। वे बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते थे। कई मुसलमान पाठक तो हिन्दू नाम रखकर अपनी प्रतिक्रिया देते थे, जिसका पता मुझे उनके ईमेल पते और भाषा शैली से चल जाता था। मैं उनका असली नाम प्रकट कर देता था, जिससे वे बहुत नाराज होते थे।
वहाँ मेरे एक प्रतिद्वंद्वी ब्लाॅगर भी थे- श्री बनवारी लाल, जो ‘बिरजू अकेला’ के नाम से लिखा करते थे। वे मेरी लगभग हर राजनैतिक पोस्ट और हास्य-व्यंग्य की पैरोडी किया करते थे। पर वे कभी मुझसे जीत नहीं सके। बाद में उन्होंगे ब्लाॅग लिखना बन्द कर दिया था और मेरे मित्र भी बन गये थे। लेकिन आजकल मैंने उनको फेसबुक और व्हाट्सएप सभी पर ब्लाॅक कर रखा है, क्योंकि वे रोज मोदी जी को अशोभनीय गालियाँ दिया करते हैं।
मैंने स्वतंत्रता के बाद के इतिहास की समीक्षा करते हुए अपनी पोस्टों की एक पूरी सीरीज ही लिख डाली थी। मेरी लगभग हर चौथी-पाँचवी पोस्ट इतिहास पर होती थी। मैं गाँधी और नेहरू की कठोर आलोचना करता था, जो कई लोगों को पसन्द नहीं आती थी, पर मैं अपने विचारों पर डटा रहा। उस सीरीज को यदि एक जगह एकत्र किया जाये, तो स्वतंत्रता के बाद भारत के इतिहास की एक पुस्तक बन सकती है।
मैं जनवरी 2012 से दिसम्बर 2013 तक पूरे दो साल इस ब्लाॅग पर सक्रिय रहा और मेरे ब्लाॅग के पाठकों की संख्या भी बहुत हो गयी। मेरी हर पोस्ट पर सैकड़ों कमेंट आ जाना मामूली बात थी। इस अवधि में मुझे ब्लाॅग लिखते हुए अनेक खट्ठे-मीठे-तीखे-चरपरे अनुभव हुए और नभाटा के तत्कालीन प्रधान सम्पादक नीरेन्द्र नागर के साथ मेरा कई बार टकराव हुआ। अन्ततः उन्होंने मुझे ब्लाॅग लिखने से रोक दिया और मेरा पासवर्ड ब्लाॅक कर दिया था। अतः मैंने ब्लाॅग लिखना छोड़ दिया। मेरे लिखे हुए सभी लेख उस ब्लाॅग पर आज भी उपलब्ध हैं, जो खोजने पर खुल जाते हैं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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