आत्मकथा भाग-4 अंश-16

अनिता अग्रवाल से मुलाकात

जब मेरा पूरा परिवार लखनऊ में आ गया था, तो मेरी पत्र-मित्र अनिता अग्रवाल ने मुझसे मिलने की इच्छा व्यक्त की। उनका मायका लखनऊ में ही है। जब वे अगस्त 2011 के महीने में रक्षाबन्धन पर लखर्नऊ आइं, तो मिलने के लिए कहा। मैंने पहले उन्हें अपने घर पर ही बुलाया, ताकि वे श्रीमती जी से भी मिल सके। पहले वे आने को तैयार हो गयीं, लेकिन फिर किसी कारण से पीछे हट गयीं और मुझे ही अपने घर बुलाया। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं थी, इसलिए एक दिन कार्यालय जाने से लगभग एक घंटे पहले मैं उनके घर गया, जो निशातगंज क्षेत्र में गोमती नदी के किनारे पर है। मैं उनके लिए प्रसिद्ध चाणक्य बर्फी ले गया था, जिसकी दुकान गोमती नगर में हमारे घर के निकट ही है। मुझे उनका घर खोजने में थोड़ा समय लगा, क्योंकि मैं गलती से पहली गली में घुस गया था, जबकि उनका घर दूसरी गली में था।
वहाँ उनकी मम्मी और भाभी से भी मेरी भेंट हुई। उनके पिताजी बीमार थे और भीतर लेटे हुए थे, इसलिए मैं उनके दर्शन नहीं कर पाया। मैं लगभग एक घंटे वहाँ रहा था। इसी बीच उन्होंने अपने बारे में अपने पुत्र वरुण द्वारा बनाया गया एक प्रिजेंटेशन अपने लैपटाॅप पर दिखाया। उसमें अनिता के बचपन से लेकर तब तक की घटनाओं की झाँकी थी। वह बहुत अच्छा बना था। मुझे देखकर अच्छा लगा और मैंने वरुण की मेहनत की प्रशंसा की। वह प्रिजेंटेशन अनिता की पुस्तक के विमोचन के दिन सबको दिखाया गया था।
चलते समय अनिता ने मुझे दो गिफ्ट भी दीं, हालांकि मैं उनके लिए कोई गिफ्ट नहीं ले गया था। वे दोनों गिफ्ट आज भी मेरे पास रखी हैं। मैं गोमती पुल से उनके घर तक पैदल ही गया था। लौटते समय वे और उनकी भाभी मुझे अपनी कार में वहाँ तक छोड़ गयी थीं, जहाँ से मैं टैम्पो से अपने ऑफिस पहुँच गया।
अनिता से मेरी यह मुलाकात बहुत अच्छी रही और मुझे अभी तक याद है। इसके बाद उनसे एक बार और मिलने का अवसर मिला है, जब वे हमारे घर पधारी थीं और श्रीमती जी तथा मोना से भी मिली थीं।
तिवारी के निवास पर गुंडों का चक्कर
सितम्बर-अक्टूबर 2011 में उस किराये के मकान में रहते हुए हमें एक विचित्र समस्या का सामना करना पड़ा, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। बात यह थी कि तिवारी जी का एक पुत्र पहले गलत संगत में पड़ गया था और उसके कुछ मित्र आदतन अपराध किया करते थे। शीघ्र ही उसे इस बात का पता चल गया, तो उसने उनका साथ छोड़ दिया। साथ छोड़ना उसके पुराने साथियों को सहन नहीं हुआ और उसको फिर से अपने साथ लाने के लिए उन्होंने धमकियाँ दीं। एक दिन तो हद ही हो गयी। गुंडों ने हमारे निवास पर आकर पत्थरबाजी की, जिससे मकान की खिड़कियों के शीशे आदि टूट गये और हमारी कार का एक शीशा भी उन्होंने तोड़ दिया, जो गैराज में रखी थी। हमारी बैठक में भी पत्थरों के बहुत टुकड़े फेंके गये थे और हमारा कीमती टीवी भी बाल-बाल बचा था।
यह सब देखकर हम परेशान हो गये। हमारे शाखा के साथियों ने हमें मकान बदलने की सलाह दी, लेकिन इतनी जल्दी पुनः मकान बदलना सम्भव नहीं था। इसलिए हम साहस करके उसी घर में टिके रहे। तिवारी जी ने अपने पुत्र को किसी दूसरे शहर में भेज दिया। बाद में पुलिस ने उन गुंडों के सरगना को पकड़ लिया और उसे एक-दो महीने जेल में भी रखा गया। तब पुलिस ने उसको धमकाया था कि फिर वहाँ गुंडागिर्दी की, तो तुम्हें जिन्दगीभर जेल में सड़ा देंगे। इससे वह गुंडा फिर हमें परेशान करने नहीं आया और हम भी वहाँ चैन से रहने लगे।
दशहरे पर रावण का निर्माण
पिछले भाग में मैं लिख चुका हूँ कि पंचकूला में मैंने पड़ोस के बच्चों के साथ मिलकर दो बार दशहरे पर रावण का निर्माण किया था, जो सबको बहुत अच्छे लगे थे।
फिर जब मैं अकेला लखनऊ में रहता था, तो दशहरे पर आगरा गया। वहाँ मेरे साले का पुत्र चि. विश्वांग (सहज) एक छोटा सा रावण बना रहा था। मैंने उससे कहा कि इसको थोड़ा बड़ा और अच्छा बना सकते हैं। वह मान गया। मैंने उसे आवश्यक सामग्री का प्रबंध करने को कह दिया, जिसमें दो-तीन कार्टून, पुराने अखबार, एक बड़ी लकड़ी और कुछ पटाखे आदि थे। ये चीजें आ जाने के बाद हमने एक दिन में ही रावण बना लिया।
दशहरे वाले दिन हमारी ससुराल राजा की मंडी में घर के बगल में से होकर अग्रवाल समाज का दशहरा जुलूस निकलता है। हमने उसी दिन रावण बनाया था और रात को उसे अपने घर की बाउंड्री पर इस प्रकार बाँध दिया कि वह जुलूस में आने वाले लोगों को दिखाई पड़ता रहे।
हमारे आगरावासी दोनों साढ़ू और उनके परिवार भी उस समय वहाँ आ गये थे। जब जुलूस निकलने लगा, तो हमने अपने रावण में आग लगा दी। इससे वह जलने लगा और उसमें भरे हुए पटाखे छूटने लगे। इसको हजारों लोगों ने देखा। हमें बहुत मजा आया। इससे अगले वर्ष हमने और भी बड़ा रावण बनाया और उसको भी उसी तरह घर के बाहर बाउंड्री पर जलाया। इस बार वह और भी अच्छा बना था।
इसके बाद मुझे रावण बनाने का अवसर नहीं मिला, क्योंकि सब बच्चे ऊँची कक्षाओं में पहुँचकर अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गये थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान'

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