आत्मकथा भाग-4 अंश-15
पुराने किरायेदार से भेंट
हमारे लखनऊ वाले मकान में मेरे तीसरे और अंतिम किरायेदार थे श्री ज्ञान प्रकाश कपूर। वे वरिष्ठ नागरिक थे और कहीं से अवकाश प्राप्त थे। वे हमारे मकान में लगभग डेढ़ साल रहे थे, पर कभी एक पैसा भी किराया नहीं दिया था और न बिजली-पानी का बिल भरा था। यों उन्होंने किराये के चेक दो-तीन बार दिये, किन्तु वे चेक बैंक से बैरंग लौट आये, यह लिखकर कि खाते में पैसा नहीं है। तंग आकर हमने उनसे मकान खाली करा लिया था, जो बड़ी कठिनाई से खाली हुआ। वे सज्जन उसमें हमारा ताला लगाकर बिना चाबी दिये ही चले गये। खैर, हमने यह सोचकर संन्तोष कर लिया था कि चलो पिंड छूटा और मकान तो बच गया।
जब मेरा स्थानांतरण लखनऊ हुआ, तो जाने कैसे उनको पता चल गया कि मैं लखनऊ आ गया हूँ। मेरे बैंक में मुझे बहुत लोग जानते हैं, उनमें से ही किसी ने उनको बता दिया होगा। लखनऊ में हमारे मंडलीय कार्यालय में पूछताछ करते हुए वे मेरे विभाग में मुझसे मिलने आ गये। लगभग 8 साल बाद उनको पहचानने में मुझे देर नहीं लगी, लेकिन वहाँ देखकर मुझे आश्चर्य अवश्य हुआ।
मैंने उन्हें अपने केबिन में बैठाया और हाल-चाल पूछा। उन्होंने दुःखी होते हुए बताया कि उनके बड़े पुत्र की एक मोटरसाइकिल दुर्घटना में मृुत्यु हो चुकी है और उसके गम में उसकी माँ पागल जैसी हो गयी है। इतना ही नहीं, उनका छोटा पुत्र बड़े भाई के गम में और बेरोजगार होने के कारण चिन्ताग्रस्त होकर अवसाद में चला गया है।
मुझे यह सब जानकर दुःख हुआ। मुझे लगा कि हमें तथा अपने अन्य मकानमालिकों को धोखा देकर उन्होंने जो पाप किये थे, उनकी यह बहुत बड़ी सजा ईश्वर ने उनको दी है। हालांकि मुझे पूरी तरह विश्वास नहीं था कि वे सच बोल रहे थे। झूठ बोलना उनकी पुरानी आदत थी और जब उनका झूठ पकड़ लिया जाता था, तो बिना कोई सफाई दिये वे चुप हो जाते थे। मुझे लगा कि यह भी झूठ बोलकर सहानुभूति पैदा करने की उनकी कोई तिकड़म है।
मैंने जाँच करने के लिए उनसे पूछा कि मकान का ताला लगाकर हमें चाभी क्यों नहीं पहुँचायी। तो वे कहने लगे कि चाभी बगल वाले मकान में दे गये थे। मैंने कहा कि हमने आस-पास के मकानों में पूछ लिया था, उनमें से किसी के पास चाभी नहीं थी। यह सुनकर वे चुप हो गये। मैं समझ गया कि यह आदमी बिल्कुल नहीं बदला है और उसी तरह झूठ पर जी रहा है जैसे पहले जी रहा था।
मैंने उनसे कहा कि आपने मेरे साथ जो किया उसके लिए ईश्वर ने आपको बहुत कड़ी सजा दी है। अब मेरे मन में आपके लिए कोई बात नहीं है, इसलिए मैं आपको माफ करता हूँ। आपके छोटे बेटे की हालत जानकर मुझे दुःख है, लेकिन मैं प्राकृतिक चिकित्सा जानता हूँ, मैं उसको ठीक कर सकता हूँ। आप उसे मेरे पास एक-दो बार ले आना।
उन्होंने मेरी इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। लेकिन वे अपनी दयनीय हालत की चर्चा करके मुझसे एक हजार रुपये उधार माँगने लगे। मुझे उनकी हिम्मत पर आश्चर्य हुआ। मुझे इतनी बार धोखा देने और झूठ बोलने के बाद भी उनको यह विश्वास था कि मैं उनको रुपये उधार दे दूँगा। क्या मैं इतना बेवकूफ हूँ? मैं उसी समय तय कर लिया कि इनके जाल में नहीं फँसना है। हालांकि हजार-पाँच सौ रुपये मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं है, मैं यों ही लोगों की मदद के लिए इतने रुपये दे देता था और उनको वापस पाने की आशा नहीं करता था। लेकिन उनको रुपये उधार देना उनकी हरकतों को प्रोत्साहन देना होता। इसलिए मैंने उनसे साफ इनकार कर दिया।
मैंने उनसे साफ कह दिया कि हजार-दो हजार मेरे लिए कोई बड़ी रकम नहीं है, लेकिन आपने मेरे साथ इतनी बार धोखा किया है और इतनी बार झूठ बोला है कि मैं आपके ऊपर रत्तीभर भी विश्वास नहीं कर सकता।
वे बहुत गिड़गिड़ाये, पर मैं नहीं पसीजा। मैंने उनसे कहा कि मैं केवल आपके पुत्र के ठीक होने में मदद कर सकता हूँ। यदि आप उसे ठीक करना चाहते हों तो उसे यहाँ मेरे पास ले आना। पर उसके बाद फिर कभी उन्होंने दर्शन नहीं दिए।
मेरा यह अनुभव रहा है कि यदि हम किसी सीधे-साधे आदमी को जानबूझकर धोखा देते हैं और उसका धन हड़प करते हैं, तो भले ही उस समय हमें कोई सजा न मिले, लेकिन हम ईश्वरीय न्याय से बच नहीं सकते। ईश्वर की बेआवाज लाठी समय आने पर उसको दंड अवश्य देती है। हम अपराध करने के बाद पुलिस और अदालत से बच सकते हैं, लेकिन ईश्वरीय न्याय से नहीं बच सकते। मैंने अपने गाँव में ऐसे कई लोगों को बरबाद होते देखा है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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