आत्मकथा भाग-4 अंश-14

प्रातःकाल हम दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर और स्नान-जलपान करके लौटने के लिए तैयार हो गये। यहाँ हाउसबोट चलाने वाले नाविक भोजन बनाने में भी निपुण होते हैं और यात्री की रुचि के अनुसार सभी तरह का भोजन बना लेते हैं जो स्वादिष्ट भी होता है। कुल मिलाकर हाउसबोट की सेवायें अच्छी थीं।

हमारी हाउसबोट की वापसी यात्रा संक्षिप्त ही रही, क्योंकि इस बार वह एकदम सीधे रास्ते से लौटा लाये। जाने में जहाँ तीन घंटे लगे थे, वहीं लौटने में केवल पौन-एक घंटा लगा। हाउसबोट पर हमारा एक दिन का प्रवास अच्छा रहा, हालांकि हम यह भी सोच रहे थे कि इस पर एक दिन से अधिक नहीं रहा जा सकता, क्योंकि बहुत बोरियत भी होती है और कहीं जा भी नहीं सकते। इसी कारण बहुत से लोग तो रात को भी हाउसबोट पर नहीं रुकते, बल्कि सुबह जाकर शाम को वापस आ जाते हैं और किसी होटल में ठहरते हैं।
जब तक हमारी हाउसबोट मुख्य जमीन पर आयी, तब तक हमारा ड्राइवर जिलमोंन भी आ चुका था। अब हमें त्रिवेन्द्रम जाकर एक रात रहना था, जो हमारा अंतिम पड़ाव था। अलेप्पी से त्रिवेन्द्रम का रास्ता अच्छा और सीधा बना हुआ है, हालांकि बहुत लम्बा है। रास्ते में एक अच्छे और भीड़ भरे होटल में हमने दोपहर का भोजन किया और दोपहर बाद हम त्रिवेन्द्रम और उसके पास कोवलम बीच पर पहुंचे जहाँ हमारे लिए होटल पहले से बुक था। होटल में पहुंचाकर हमारे ड्राइवर जिलमोंन ने हमसे विदा ली। वह बहुत अच्छा ड्राइवर है।
उस दिन शाम को हम कोवलम बीच पर टहले और सूर्यास्त के कुछ फोटो भी खींचे। वह बीच हालांकि अधिक सुन्दर नहीं है। लेकिन वहाँ समुद्री जीवों का भोजन (सी फूड) बहुत मिलता है, इसलिए वहाँ विदेशी यात्रियों की भीड़ लगी रहती है। हमारे लिए इनमें कोई आकर्षण नहीं था, इसलिए हमने रात्रि को शाकाहारी भोजन किया।
हमारी उड़ान अगले दिन प्रातःकाल 8 बजे ही थी, इसलिए हमें सुबह 6 बजे ही निकलना था। हमने रात को ही एक टैक्सी बुक करा ली, क्योंकि जिलमोंन को नहीं आना था। निर्धारित समय पर हम होटल से निकलकर हवाई अड्डे पहुंच गये और उड़ान पकड़कर पहले दिल्ली, फिर वहाँ से लखनऊ आ गये। हमारी यह केरल यात्रा बहुत ही आनन्ददायक रही और किसी को कोई कष्ट भी नहीं हुआ।
केरल यात्रा से लौट आने के बाद दीपांक अपनी नौकरी के लिए पुणे चला गया। उसका एक सहपाठी ईशान्त शर्मा भी उसके साथ उसी जगह नौकरी पर आया था। दोनों ने अपने निवास की व्यवस्था पुणे के एक बाहरी क्षेत्र में तीन चार अन्य लड़कों के साथ कर ली थी। वहाँ उसका मन लग गया।
मोना की पढ़ाई की चिन्ता
मार्च 2011 में हमारी पुत्री मोना ने सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा दी थी, जिसका परिणाम 2 माह में आने वाला था। उससे पहले या इसी बीच हमें उसकी आगे की पढ़ाई का प्रबंध करना था। वह काॅमर्स पढ़ना चाहती थी। लखनऊ के स्थानीय मित्रों से विचार-विमर्श करके हमने नेशनल काॅलेज में उसका बी.काॅम. में प्रवेश कराना तय किया, जो सरलता से हो गया। इसके साथ ही उसका मन 3-डी एनीमेशन का कोर्स करने का था। लखनऊ में ऐसे कोर्स कराने वाले कई संस्थान हैं। उनकी फीस भी बहुत है। उन्हीं में से एक मैक (MAAC) है, जो जागरण चौराहे के निकट स्थित है। तीन साल के कोर्स की उसकी फीस लगभग 2 लाख थी। इसके अलावा कुछ और भी खर्चे थे। फिर भी उसकी इच्छा को देखते हुए मैंने यह खर्च उठाना स्वीकार कर लिया। कुछ इसलिए भी कि दीपांक की नौकरी लग गयी थी और मेरा अपना कोई खर्च नहीं था।
मोना अपनी स्कूटी से दोनों जगह पढ़ने जाने लगी। नेशनल काॅलेज में तो कक्षायें कभी-कभी ही लगती थीं और उनमें जाना भी आवश्यक नहीं था, क्योंकि पढ़ाई कोई विशेष नहीं होती थी, लेकिन मैक में नियमित जाना पड़ता था। 3-डी एनिमेशन के लिए अपने पास अच्छे फीचरों वाला एक लैपटाॅप होना अनिवार्य होता है, क्योंकि सारा कार्य कम्प्यूटर पर ही सिखाया और किया जाता है। इसलिए प्रारम्भ में ही मोना को एक लैपटाॅप दिलवाया गया, जिसमें हमारे लगभग 42 हजार रुपये व्यय हुए। इसके बाद मोना अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गयी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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