आत्मकथा भाग-4 अंश-13
मुन्नार में हमें जो होटल मिला था वह हालांकि मुन्नार शहर से काफी दूर था, परन्तु एक पहाड़ पर उसे बहुत ही सुन्दर तरीके से बनाया गया था। प्रत्येक कमरा एक काटेज के रूप में था, जो देखने में बहुत सुन्दर लगता था। हमें दो कमरों वाली काटेज दी गयी थी, जो बहुत आराम दायक थी। बारिश के समय वहाँ हल्की ठंड हो गयी थी, परन्तु बाद में मौसम खुल गया और बहुत सुहावना हो गया। फिर हम मुन्नार के आस-पास घूमने निकले। वहाँ कई अच्छे झरने हैं। हमने मसालों आदि की खरीदारी भी की। हालांकि दुकानदार ने एक चीज का दाम तो लगा लिया लेकिन वह चीज थैले में नहीं रखी। हमने भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
वहाँ एक झरना ऐसा है जो बहुत शोर करता है। उसका शोर दूर तक सुनाई पड़ता है और उसके पास जाकर तो बातचीत करना भी असम्भव हो जाता है। इसी तरह एक ईको पाॅइंट है। वहाँ एक लम्बी झील है या शायद नदी है। उस स्थान के बारे में कहा जाता है कि अगर चिल्लाकर कुछ कहा जाये तो वह लौटकर आता है और अन्तिम शब्द दो बार और साफ सुनायी देता है। पर वहाँ कोई इसकी जांच नहीं कर रहा था। बारिश भी हो रही थी।
मुन्नार में दो दिन आनन्दपूर्वक गुजारने के बाद हम कोडाईकनाल की ओर चले। यह भी एक पहाड़ी स्थान है पर तमिलनाडु की सीमा में है। वहाँ एक बड़ी झील है, जिसमें नौका विहार किया जाता है। रास्ते में हमने सैकड़ों की संख्या में पवनचक्कियां लगी देखीं, जो हवा से बिजली बनाती हैं। पवनचक्की हमने पहले कभी नहीं देखी थीं। वहाँ देखकर अच्छा लगा। जब तक हम कोडैकनाल पहुंचे तब तक सब बुरी तरह थक गये थे और शाम भी हो गयी थी। इसलिए नौका विहार का विचार त्याग दिया। वास्तव में हम चंडीगढ़ की सुखना झील में इतनी बार नौका विहार कर चुके हैं कि अब ज्यादा मजा नहीं आता।
कोडैकनाल का होटल ज्यादा अच्छा नहीं था। पर काम चल गया। अगले दिन हम वहाँ आसपास देखने को निकले। वहाँ कई पहाड़ी स्थान हैं। काफी भीड़ भी थी, हालांकि ठंड बिल्कुल नहीं थी, बल्कि गर्मी थी। रास्ते में जाम लगा हुआ था। हमारे ड्राइवर जिलमोंन ने हमें बताया कि यहाँ एक स्यूसाइड पाॅइंट है, जिससे कूदकर लड़के आत्महत्या कर लेते हैं। उस स्थान से निकलने में हमें दो घंटे से अधिक समय लग गया, इतना ट्रैफिक था। मैंने मजाक में जिलमोंन से कहा कि लौटते समय इस रास्ते से मत आना, नहीं तो मुझे यहाँ आत्महत्या करनी पड़ जाएगी। यह सुनकर वह भी हंसने लगा।
वहाँ एक पहाड़ी जंगल है, जहाँ पेड़ों के बीच बहुत सूखी लकड़ियां पड़ी हुई थीं। वहीं धरती में चट्टानों के बीच एक दरार थी, जिसमें एक आदमी जा सकता था। वहाँ लड़कों ने बताया कि इस दरार पर रजनीकांत की एक फिल्म की शूटिंग हुई थी।
अगले दिन सुबह हम कोडैकनाल से चले। इस बार दूसरे रास्ते से आये, जो बहुत सुहावना है। रास्ते में कई अच्छे छोटे-छोटे झरने भी देखे, जिनको देखकर तबियत खुश हो गयी। हम अलेप्पी की तरफ जा रहे थे। लगभग 10 बजे हम अलेप्पी पहुंच गये। वहाँ हमारे लिए एक हाउसबोट (नाव पर पूरा घर) पहले से आरक्षित थी। हम उसमें बैठ गये। हमें 24 घंटे उसी हाउसबोट में रहना था।
यहाँ अलेप्पी बैकवाटर के नाम से प्रसिद्ध है। हमने पहले कभी बैकवाटर नहीं देखा था। वास्तव में समुद्र का पानी गांवों में घुस आता है और फिर वापस नहीं जाता, उसी को बैकवाटर कहते हैं। अलेप्पी में स्थायी बैकवाटर है। वहाँ गांव भी बसे हैं और उनमें सब चीजें भी हैं, जैसे स्कूल, दुकानें, पोस्टऑफिस, बैंक आदि। लेकिन जाना पड़ता है नाव से ही। पैदल चलने की सुविधा बहुत कम है, नावों से ही सारा काम होता है। हम सोच रहे थे कि लोग यहाँ रहते ही क्यों हैं? फिर सोचा कि अगर यहाँ नहीं रहेंगे तो कहाँ जायेंगे? उनकी भी मजबूरी है। पानी में कुछ पैदा कर लेते हैं और मछलियाँ मार लेते हैं, जो वहाँ बहुत थीं। कुछ लोग नौकरी भी करते हैं और नाव से बाहर ड्यूटी पर जाते हैं।
वहाँ हमने एक नयी बात देखी- राष्ट्रीय जलमार्ग। जैसे जमीन पर राजमार्ग (हाईवे) होते हैं, वैसे ही वहाँ पानी के हाईवे बने हुए थे। उनमें मील के पत्थर भी लगे हुए थे। देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। वहाँ पास में ही एक जलक्रीड़ा संस्थान भी था, जिसमें बच्चों को नाव चलाने आदि खेलों का प्रशिक्षण दिया जाता है। हमने देखा कि दर्जनों लड़के लड़कियां समूह में या अकेले ही नाव चलाने का अभ्यास कर रहे थे।
हमारी हाउस बोट को नावचालकों ने काफी घुमाते हुए कहीं दूर ले जाकर खड़ा कर दिया था। रास्ते में हमें नाश्ता, भोजन आदि समय पर मिलता था। नहाने धोने की सुविधा भी थी। टीवी भी था, जनरेटर भी। यानी होटलों जैसी सारी सुविधायें। लेकिन नाव से बाहर नहीं जा सकते थे। काफी दूर जाकर एक जगह हमारी हाउसबोट को बांधकर खड़ा कर दिया गया। हमें रातभर वहीं रहना था। पहले हम हाउस बोट से उतरे और थोड़ी सूखी जमीन पर टहले। पास में ही एक गांव था।
हमें रात को मच्छरों का डर था, परन्तु उनके पास कछुआ छाप मच्छर अगरबत्ती जैसे सारे प्रबंध थे। इसलिए आराम से सोने में कोई कठिनाई नहीं हुई। वहाँ थोड़ी-थोड़ी दूर पर अन्य कई हाउसबोट भी खड़े हुए थे। हाउसबोट में हमारी रात ठीक से कट गयी, हालांकि सारी व्यवस्था के बावजूद मच्छरों ने कुछ परेशान किया और जनरेटर की आवाज भी सोने नहीं दे रही थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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