आत्मकथा भाग-4 अंश-12

कोच्चि से हमें अगले दिन अगत्ती की उड़ान आसानी से मिल गयी। वह एक छोटा सा हवाई जहाज था, जिसमें लगभग 50 यात्री थे। सारी सीटें भरी हुई थीं। केवल एक साँवली-सी सुन्दर एयरहोस्टेस सबका ध्यान रख रही थी। लगभग 40 मिनट की उड़ान के बाद हम अगत्ती हवाई अड्डे पर उतरे, जो लक्षद्वीप का एकमात्र हवाई अड्डा है। वास्तव में अगत्ती बूंद के आकार का एक छोटा सा द्वीप है, जिसमें एक गांव बसा हुआ है और दो तीन होटल बने हुए हैं। उसी के एक पतले छोर पर हवाई पट्टी है जिस पर केवल छोटे जहाज उतर सकते हैं। हवाई अड्डे की इमारत भी मामूली सी है।

हमारा होटल कम्पनी की तरफ से पहले से ही बुक था। उसमें पास-पास के दो काटेज हमें दिये गये थे। काटेजों में सारी सुविधायें थीं। लेकिन वहाँ बाहर धूल बहुत थी, इसलिए वहाँ पैर पोंछने के लिए कई पायदान रखे गये थे। फिर भी धूल की कुछ न कुछ मात्रा कमरों में और बिस्तर पर पहुंच ही जाती थी, पर उससे कोई बड़ी परेशानी नहीं थी।
उन दिनों अगत्ती में वर्षा के कारण ऑफ सीजन चल रहा था। ऑफ सीजन होने के कारण अधिक भीड़ नहीं थी, अनेक काटेज खाली पड़े हुए थे। सीजन में वहाँ पानी के अनेक तरह के खेल कराये जाते हैं, जिनके लिए शुल्क यात्रियों को स्वयं देना पड़ता है। परन्तु उन दिनों सारे खेल बंद थे, इसलिए हम यों ही समुद्र में नहाते थे। वहाँ का पानी बहुत साफ था, हालांकि खारी था।
वहाँ हम एक दिन घूमने के लिए उसी द्वीप पर बसे हुए गांव और उसके चारों ओर के बीचों पर भी गये। वहीं एक जगह जेट्टी (पानी के छोटे जहाज) उतरने की जगह भी बनी हुई थी। संयोग से उस दिन कोई जेट्टी वहाँ नहीं थी। पूछने पर पता चला कि कोच्चि से वहाँ जेट्टी रोज आती है और दो या तीन दिन में अगत्ती पहुँचा देती है। अगत्ती में यात्रियों को उतारकर वह तुरंत लौट भी जाती है। यात्रियों को इसी बीच उस जेट्टी में ही इडली सांबर का भोजन मिलता है, जिसका मूल्य टिकट में ही शामिल रहता है। मेरी इच्छा एक बार जेट्टी में यात्रा करने की थी, परन्तु समय की कमी के कारण ऐसा नहीं हो सका।
अगत्ती के समुद्र तट बहुत सुंदर हैं। वहाँ एकदम साफ सफेद रेत है, जिन पर हम देर तक घूमते रहते थे या वहाँ पड़ी आराम कुर्सियों पर लेटे रहते थे। खाने के समय होटल में काटेजों के बीच में ही अलग से भोजनालय बना हुआ है। वहाँ ठीक-ठाक सा भोजन मिल जाता था। वहाँ पर हमें दूसरे बैंकों से आये कुछ सज्जन भी मिल गये थे।
लगभग तीन दिन अगत्ती में रहने के बाद हम वापसी उड़ान से कोच्चि लौटे। कम्पनी की ओर से हमें केरल घुमाने के लिए टैक्सी की सुविधा दी गयी थी। टैक्सी वाला निर्धारित समय पर हवाई अड्डे आकर हमें ले गया। उस टैक्सी का ड्राइवर एक सीधा-सा केरली ईसाई था, जिसका नाम था जिलमोंन। वह केवल अंग्रेजी समझता था। हिन्दी के बहुत कम शब्द वह जानता था। वह हमें होटल में पहुंचा गया और दूसरे दिन सुबह ही आने का वायदा करके चला गया। उसका घर पास में ही था। इस बार हमें होटल में पहले की तरह पास-पास के ऐसे कमरे नहीं मिले जिनमें एक ही बैठक हो। वे कमरे पहले से घिरे हुए थे। इसलिए हमें आमने सामने के कमरे दिये गये।
वह होटल पुराने जमाने में किसी राजा का महल रहा होगा, जिसको होटल का रूप दिया गया था। उसकी छत पर एक छोटा सा स्विमिंग पूल भी था। हम उस दिन शाम को उसमें भी नहाये। हालांकि बारिश के कारण मौसम ठंडा सा था और स्विमिंग पूल में हमारे अलावा और कोई यात्री नहीं था। दीपांक तैरना भी जानता है इसलिए उसने उसका पूरा आनन्द लिया।
अगले दिन हमने कोच्चि शहर के दर्शनीय स्थान देखे। एक दो मंदिर, एक चर्च और समुद्र जिसमें पानी के छोटे जहाज खड़े थे। वहाँ मछलियां पकड़ने का कार्य व्यापक पैमाने पर होता है। कोच्चि एक ऐतिहासिक शहर है, जिसे पहले कोचीन कहा जाता था। वहाँ का बंदरगाह विश्व प्रसिद्ध है, जिससे पहले बहुत व्यापार होता था। आजकल वहाँ नौसेना का बड़ा अड्डा बना हुआ है।
कोच्चि से हमें मुन्नार जाना था। हमारी यात्रा में अगत्ती के बाद मुन्नार ही सबसे अधिक दर्शनीय स्थान रहा। वहाँ चाय के बागान हैं। पहाड़ी क्षेत्रों की एक-एक इंच जगह पर चाय के पौधे उगाये गये हैं, जिनकी समय-समय पर ऊपर से छंटाई की जाती है। दूर से देखने में चाय के बाग ऐसे लगते हैं जैसे किसी ने सारी धरती पर हरा गलीचा बिछा दिया हो। वह एक अद्भुत दृश्य था जिसे देख-देखकर मन नहीं भरता था।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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