आत्मकथा भाग-4 अंश-11

दक्षिण भारत भ्रमण

मैसूर में दीपांक का प्रशिक्षण समाप्त होने के बाद और किसी जगह नियुक्ति मिलने से पहले उसे जून 2011 महीने में लगभग 1 माह का अवकाश मिल रहा था। हमने इस अवकाश का पूरा लाभ उठाना तय किया, क्योंकि मोना की भी छुट्टियाँ थीं और मेरी एलटीसी की सुविधा बकाया थी। हमने इस सुविधा का लाभ लेते हुए मारीशस भ्रमण करना तय किया। बैंकों में प्रत्येक 4 वर्ष की अवधि में एक बार भारत में स्थित किसी भी स्थान का भ्रमण करने की सुविधा उपलब्ध है। बैंक केवल सीधी हवाई यात्राओं का किराया देता है, लेकिन यात्रा कम्पनियाँ प्रायः उतने ही किराये में विदेश का भ्रमण भी करा देती हैं। हम ऐसे ही पैकेज पर 4 वर्ष पहले श्रीलंका, मलेशिया और सिंगापुर का भ्रमण कर चुके थे, जिसकी चर्चा मैं अपनी आत्मकथा के भाग-3 में कर चुका हूँ। हमारे पासपोर्ट पहले से ही बने हुए थे। इसलिए उनकी चिन्ता नहीं थी।
पहले हमने दिल्ली के एक ट्रैवल एजेंट से बात की, तो वह लखनऊ से त्रिवेन्द्रम तक के किराये में मारीशस का पैकेज देने को तैयार हो गया, लेकिन कुछ धन लगभग 5 हजार प्रति व्यक्ति हमें भी देना था। पैकेज में हवाईयात्राओं के अलावा होटलों में ठहरना, घूमना, नाश्ता और रात्रि भोजन शामिल था। फिर हमने लखनऊ में एक ट्रेवल एजेंसी से बात की, तो वे त्रिवेन्द्रम तक के किराये में ही मारीशस का पूरा पैकेज देने को राजी हो गये, यानी हमें अपने पास से कुछ नहीं देना था। यह तय होते ही हमने अपने पासपोर्ट वीजा लेने के लिए उनके पास जमा कर दिये और हवाई यात्रा की टिकटें बनवा लीं। तभी उन्होंने बताया कि मोना के पासपोर्ट की अवधि 2-3 माह बाद ही समाप्त हो रही है, इसलिए उसे वीजा नही मिल सकता। वीजा लेने के लिए पासपोर्ट कम से कम 6 माह तक वैध रहना आवश्यक है। हमें पहले इस नियम की जानकारी नहीं थी, इसलिए इस पर ध्यान नहीं गया।
हम मोना को छोड़कर कहीं घूमने जाना नहीं चाहते थे, इसलिए हमने विदेश यात्रा के बजाय देश में ही किसी जगह घूमने जाना तय किया। हम दक्षिण भारत के बंगलौर, मैसूर, चेन्नई, त्रिवेन्द्रम, कोवलम, कन्याकुमारी आदि स्थान पहले देख चुके थे। परन्तु केरल अधिक नहीं देखा था। इसलिए इस बार हमने केरल की पूरी यात्रा करना तय किया। उसी ट्रैवल एजेंसी से हमने केरल के कोच्चि, मुन्नार, कोडाईकनाल, अलेप्पी बैक वाटर, कोवलम के साथ ही लक्षद्वीप की यात्रा प्रोग्राम बनवा लिया। पूरे 10 दिन का अच्छा प्रोग्राम था। तब तक हमने केवल त्रिवेन्द्रम देखा था, जब हम सिंगापुर गये थे। लेकिन बैंक से त्रिवेन्द्रम तक का किराया लेना था, इसलिए एक बार फिर वहाँ जाना जरूरी था।
निर्धारित दिन को हम दक्षिण भारत की यात्रा पर निकल पड़े। हमारी यह यात्रा बहुत आनन्ददायक रही।
अपनी दक्षिण भारत की यात्रा में पहले हम लखनऊ से दिल्ली गये, फिर वहाँ से मद्रास। मद्रास में हमें एक होटल में एक रात रुकना था और अगली सुबह ही लक्षद्वीप के अगत्ती कस्बे की उड़ान पकड़नी थी। यह उड़ान इंडियन एयरलाइंस की थी। जब हम अगली सुबह मद्रास हवाई अड्डे पहुँचे, तो पता चला कि अगत्ती की उड़ान रद्द हो गयी है। हम बहुत चिंतित हुए, लेकिन एयर इंडिया के एक अधिकारी ने हमारी बहुत सहायता की। उन्होंने कहा कि आज आप कोच्चि चले जाइए, वहाँ से कल सुबह अगत्ती के लिए उड़ान है। उन्होंने टिकट भी बुक करा दी। उनको धन्यवाद देकर हम कोच्चि की उड़ान में बैठ गये और कोच्चि पहुँच गये। हमने अपने ट्रैवल एजेंट को फोन करके वहाँ होटल बुक करा दिया था।
हमें कोच्चि शहर बहुत अच्छा लगा। वहाँ हमें जो होटल मिला था, वह भी उत्तम था। हम चार वयस्क लोग थे, इसलिए हमें दो कमरे मिलने थे। हमें कमरे ऐसे दिये गये जो पास पास थे और उनके बीच में एक बैठक थी। दोनों कमरों में बाथरूम, ड्रेसिंग रूम, अलमारी और टीवी की भी सुविधा थी। बीच के ड्राॅइंग रूम में डाइनिंग टेबल, सोफा, और टीवी भी था। यानी दोनों कमरों को और बैठक को मिलाकर एक अच्छा खासा आरामदायक घर सा बन गया था, जिसमें केवल रसोईघर नहीं था।
उस होटल का खाना भी बहुत शानदार होता था। उस दिन हम कहीं घूमने नहीं जा सके, क्योंकि बारिश हो रही थी। आगे भी बारिश की संभावना को देखते हुए हमने वहाँ से दो छाते खरीद लिये, क्योंकि हम एक भी छाता साथ नहीं ले गये थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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