आत्मकथा भाग-4 अंश-10
शोभित राजपूत की पढ़ाई
बालनिकेतन में रहने वाले एक बच्चे का नाम शोभित राजपूत था। वह एक अच्छा छात्र और अच्छा स्वयंसेवक भी था। नाटकों, खेलकूद आदि में भी भाग लेता था। लेकिन गणित में बहुत कमजोर था। पहले वर्ष जब मैं सबको पढ़ाता था, तो वह न जाने क्यों बुलाने पर भी नहीं आता था और टाल जाता था। फरवरी-मार्च 2011 में जब मैं सबको लगभग रोज ही पढ़ाता था, तब मैंने उसे भी बैठाया और तभी मुझे पहली बार पता चला कि कक्षा 8 में पढ़ने वाला शोभित तो गणित में इतना कमजोर है कि कक्षा 6 का गणित भी नहीं जानता।
तब मैंने तय किया कि अगले साल इसे कक्षा 6, 7 और 8 का गणित क्रमशः पढ़ाना है और तब कक्षा 9 का गणित शुरू करना है। यह तय करके मैंने उससे कहा कि कहीं से कक्षा 6 और 7 की गणित की पुस्तकों का प्रबंध कर लो। उसने वैसा ही किया। फिर मैंने उसे कक्षा 6 का गणित पढ़ाना शुरू किया। वह वास्तव में बहुत कमजोर था। गणित की मौलिक बातें भी वह नहीं जानता था। धीरे-धीरे उसके दिमाग में गणित आने लगा। लगभग डेढ़ माह में उसने कक्षा 6 की अंकगणित और बीजगणित की किताबें पूरी कर डालीं और उनमें पारंगत हो गया।
फिर मैंने उसे कक्षा 7 का गणित पढ़ाना शुरू किया। लगभग 2 माह में उसने कक्षा 7 की भी अंकगणित और बीजगणित की पुस्तकें समाप्त कर लीं। तब तक वह गणित में इतना तेज हो गया था कि कई सवालों को केवल सोचकर ही हल कर देता था।
फिर मैंने उसे कक्षा 8 का गणित पढ़ाना शुरू किया। उन्हीं दिनों मैंने अपना घर बदल दिया था। मुझे बैंक का फ्लैट मिल गया था, जो मेरे कार्यालय के पास था। वह बाल निकेतन से बहुत दूर था, इसलिए रोज आने में बहुत कठिनाई होती थी। अतः मैंने यह नियम बनाया कि हर शनिवार और रविवार को सायंकाल 3 से 5 बजे तक बच्चों को मुख्य रूप से गणित और आवश्यकता होने पर विज्ञान भी पढ़ाया करूँगा। इससे बच्चों को समय पर्याप्त मिल जाता था। परन्तु शोभित इतना धीमा था कि कक्षा 8 का गणित पूरा करते-करते उसने पूरा साल निकाल दिया और कक्षा 9 का गणित कम पढ़ा पाया। फिर भी वह कक्षा 9 की परीक्षा में गणित में 100 में से 47 अंक लाने में सफल रहा। मैं उसे आगे भी गणित पढ़ाता रहा और वह कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा में बहुत अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो गया।
अनिता की पुस्तक का कार्य
लगभग 28 साल बाद मिली अपनी पत्र-मित्र श्रीमती अनिता अग्रवाल के बारे में मैं ऊपर लिख चुका हूँ। कभी-कभी हम नेट पर चैटिंग किया करते थे। एक दिन बात करते हुए उसने बताया कि जुलाई 2011 में उसके जन्मदिन की 50वीं वर्षगाँठ आ रही है और इस अवसर पर वह अपनी कविताओं का एक संकलन छपवाना चाहती है। साथ में उसने जो पेंटिंग बनायीं हैं, उनको भी उसी किताब में छपवाना चाहती है। यह तो मुझे पता था अनिता कविता लिखती है, लेकिन यह नहीं पता था कि वह पेंटिंग भी करती है। वास्तव में वह ऑलराउंडर जैसी है- कविता, पेंटिंग, डांस, गायन, खेलकूद, कुकिंग आदि। मैंने कहा कि यह आइडिया बहुत अच्छा है। किताब जरूर निकालो।
पहले उसका विचार किसी प्रकाशक के माध्यम से वह पुस्तक छपवाने का था। उसके पूछने पर मैंने बताया कि सामान्यतया प्रकाशक ऐसी किताबें नहीं छापते, क्योंकि ये बिकती कम हैं। इसलिए अपने ही खर्च पर छपवानी होगी। उसने खर्च का अनुमान पूछा, तो मैंने कहा कि मुझे पता नहीं है, किसी प्रिंटर से बात करो। तब उसके सुपुत्र वरुण ने एक प्रिंटर से चर्चा की। बाइंडिंग आदि पर भी चर्चा हुई।
मैंने कहा कि उस पुस्तक की पांडुलिपि मैं अपने कम्प्यूटर पर तैयार कर दूँगा। इस पर वह बहुत प्रसन्न हुई। मैंने उससे कहा कि अपनी कवितायें भेज दो। मैं यहाँ टाइप कर लूँगा। करीब 90-100 कविताएँ थीं, जिनमें से लगभग 60 कवितायें मुझे छापने लायक छाँटनी थीं। लेकिन मुझे कवितायें टाइप नहीं करनी पड़ीं, क्योंकि अधिकांश कवितायें उसने नेट पर डाल रखी थीं, जो मंगल फाॅण्ट में थीं। मैं उस किताब को कृतिदेव फाॅण्ट में बनाना चाहता था, जो देखने में अधिक अच्छा लगता है। मंगल फाॅण्ट से कृतिदेव में बदलने के प्रोग्राम उपलब्ध हैं। इसलिए मैं उनका फाॅण्ट बदल लेता, लेकिन अनिता के पुत्र वरुण ने खुद ही फाॅण्ट बदलकर कवितायें मुझे भेज दीं। इसी तरह अनिता ने अपने बनाये चित्रों (पेंटिंगों) को भी स्कैन कर रखा था। वे फाइलें भी उसने मुझे भेज दीं। मैंने कविताओं और पेंटिंगों को पेजमेकर में अच्छी तरह लगाया और किताब की पांडुलिपि तैयार कर दी। अब कोई भी प्रिंटर उसे छाप सकता था। इसमें मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी, लेकिन मुझे प्रसन्नता भी थी कि एक अच्छे कार्य में सहयोग कर रहा हूँ।
किसी तरह उस फाइल को मैंने नेट द्वारा अनिता को भेजा। उसमें छोटी-मोटी कमियाँ रह गयी थीं। अनिता ने मुझसे कहा कि मुझे पेजमेकर पर काम करना सिखा दो, मैं यहीं ठीक कर लूँगी। मैंने उसको अपनी एक किताब भेजी थी, जिसमें पेजमेकर पर एक पूरा भाग था। मैंने उससे कहा कि उसके पहले दो अध्याय पढ़ डालो। फिर मैं बताऊँगा। उसने ऐसा किया, लेकिन समस्या हल नहीं हुई। फिर मैंने चैट के साथ-साथ उसे बताया कि क्या करना है। अनिता प्रतिभाशाली तो है ही, पर मुझे भी बहुत आश्चर्य हुआ जब उसने मेरे बताने पर सारी क्रियायें सही-सही कर लीं और किताब को सुधारकर एकदम तैयार कर दिया। अब मेरा कार्य समाप्त हो गया था। मैं इस कार्य को अपनी दक्षिण भारतीय भ्रमण यात्रा से पहले ही समाप्त करना चाहता था। सौभाग्य से वैसा ही हुआ।
जुलाई में अनिता ने उसे एक प्रिंटर पर इलाहाबाद में ही छपवाया। उसका औपचारिक विमोचन भी उसके जन्म दिन पर 20 जुलाई को किसी विद्वान् के कर कमलों से कराया गया। उसके कुछ दिन बाद ही उस पुस्तक की एक प्रति अनिता ने मुझे कोरियर द्वारा भेज दी। किताब वास्तव में अच्छी छपी है। पाकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। यह बताना जरूरी है कि इसके पीछे चि. वरुण की मेहनत अधिक थी। मैंने तो केवल कम्प्यूटर पर बैठे-बैठे कार्य किया था, परन्तु उसने बहुत भाग-दौड़ की थी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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