आत्मकथा भाग-4 अंश-1

लक्ष्य की खोज में

एक मैनेजर की आत्मकथा
(भाग 4)
समर्पण
मेरी आत्मकथा का यह भाग समर्पित है
सोशल मीडिया पर मेरे हजारों मित्रों को
जिन्होंने मुझे बहुत प्रोत्साहन दिया है और
जिनमें से अधिकांश को तो मैंने देखा भी नहीं है।
प्राक्कथन
जड़ चेतन जग जीव हित सकल राममय जानि।
बंदउँ तिन्ह के पद कमल सदा जोरि जुगपानि।।
काफी समय पूर्व मैंने अपनी आत्मकथा का पहला भाग अर्थात् अपने विद्यार्थी जीवन की कहानी ‘मुर्गे की तीसरी टाँग’ उर्फ ‘सुबह का सफर’ लिखी थी, कुछ समय बाद ही इसका दूसरा भाग अर्थात् अपने अधिकारी जीवन की कहानी ‘दो नम्बर का आदमी’ उर्फ ‘आ ही गया बसन्त’ लिखा और अभी कुछ समय पूर्व ही इसका तीसरा भाग अपने प्रबंधकीय जीवन की कहानी ‘एक नजर पीछे की ओर’ लिखकर समाप्त की है। फेसबुक पर मेरे कई मित्रों, सहकारियों और सम्बंधियों ने इनको पढ़ा और पसन्द किया है। हालांकि ये भाग अभी तक कम्प्यूटर पर ही प्रकाशित किये गये हैं, फिर भी उनकी सफलता से प्रोत्साहित होकर मैं अपनी आत्मकथा का चौथा भाग अर्थात् अपने प्रबंधकीय जीवन की कहानी लिखने का साहस कर रहा हूँ।
मैं एक बार फिर दोहरा रहा हूँ कि यह कहानी मेरी अपनी है और किसी अन्य की कहानी बताना इसका उद्देश्य नहीं है, फिर भी इसमें मैंने अपने उन कई कार्यालयीन सहयोगियों और वरिष्ठों के गुणों और अवगुणों की चर्चा आवश्यकता के अनुसार की है, जिनके साथ मेरे जीवन का यह समय गुजरा है। प्रशंसा के साथ ही कई लोगों की मुझे आलोचना भी करनी पड़ी है, परन्तु मुझे इस बात का कोई खेद नहीं है और न मैं इसके लिए उनसे कोई क्षमायाचना करना चाहता हूँ। हाँ, यदि कोई सज्जन मेरे कथन या प्रस्तुतीकरण में कोई तथ्यात्मक भूल बताने की कृपा करेंगे, तो उसे सुधारने के लिए मैं सदा तैयार रहूँगा।
आत्मकथा के इस भाग के लिए भी मैंने एक विशेष शीर्षक पसन्द किया है- ‘लक्ष्य की खोज में’। इस शीर्षक का तात्पर्य यह है कि आधी जिन्दगी गुजर जाने के बाद जिन्दगी की दिशा बदलने का प्रश्न प्रायः समाप्त हो जाता है और जो रास्ता पहले से चुना होता है उसी पर आगे बढ़ते जाने की इच्छा होती है।
अपनी आत्मकथा का पहला भाग मैंने अध्यायों में बाँटकर लिखा था, दूसरे भाग को लगातार उपन्यास शैली में और तीसरे भाग को उपशीर्षकों के साथ उपन्यास शैली में लिखा था। इस चौथे भाग के लिए भी मैंने तीसरे भाग की शैली को अपनाया है। मेरा यह चौथा प्रयास कैसा बन पड़ा है, इसकी परख सुधी पाठकों को ही करनी उचित है। अस्तु।
आत्मकथा का यह भाग सन् 2010 से सन् 2019 तक अर्थात् मेरे अवकाश प्राप्ति तक की अवधि का है और सन् 2019 में तब लिखना प्रारम्भ किया गया था, जब मैं इलाहाबाद बैंक के डीआरएस, लखनऊ से मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाश प्राप्त कर चुका था।
इस भाग को मैंने अपने सोशल मीडिया मित्रों को समर्पित किया है, क्योंकि इस अवधि में मैं सोशल मीडिया पर विशेष रूप से सक्रिय रहा हूँ और इसमें मेरे हजारों मित्र बने हैं, जिनमें से 99 प्रतिशत को तो मैंने व्यक्तिगत रूप से देखा भी नहीं है। फिर भी मुझे उनका बहुत प्यार, सम्मान और प्रोत्साहन मिला है, इसलिए कृतज्ञतास्वरूप यह भाग मैं उनको ही समर्पित कर रहा हूँ। त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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