आत्मकथा भाग-3 अंश-78 (अन्तिम)

लखनऊ स्थानांतरण

फरवरी 2010 में मुझे पंचकूला में रहते हुए लगभग 5 साल हो रहे थे। मुझे आशा थी कि मैं कम से कम एक साल और पंचकूला में रखा जाऊँगा, तब तक पुत्र दीपांक की इंजीनियरिंग भी पूरी हो जाएगी और पुत्री मोना का इंटरमीडियेट भी हो जाएगा। लेकिन अचानक फरवरी के अन्तिम सप्ताह में मेरा स्थानांतरण लखनऊ होने का आदेश आ गया। मुझे इसका थोड़ा दुःख था, लेकिन प्रसन्नता भी थी कि मैं कहीं दूर जाने के बजाय लखनऊ जा रहा हूँ, जहाँ मैं पहले भी 6 साल रह चुका था, जब एच.ए.एल. में सेवा करता था।
यह आदेश आने पर हमारे संस्थान के प्रमुख श्री राव साहब को बहुत धक्का लगा। वे काफी दुःखी लग रहे थे, क्योंकि मेरे साथ उनका बहुत लगाव हो गया था। लेकिन मैंने स्थानांतरण रुकवाने का कोई प्रयास नहीं किया और स्वीकार कर लिया। स्वामी रामदेव जी उस वर्ष 5 मार्च को पंचकूला आ रहे थे, इसलिए मैंने राव साहब से केवल यह निवेदन किया कि उनका कार्यक्रम हो जाने के बाद ही मुझे कार्यमुक्त करें। वे प्रसन्नता से तैयार हो गये और मैं शनिवार 6 मार्च को ही कार्यमुक्त किया गया। उसी दिन मेरी विदाई हुई। मेरी विदाई में सभी अधिकारियों ने कुछ न कुछ अवश्य बोला था और मेरी बहुत प्रशंसा की थी। केवल प्रेरणा कुछ नहीं बोली थी। श्री अमित जोशी मेरे पास बैठे हुए संक्षेप में लिखते जा रहे थे कि कौन क्या बोल रहा है। अपनी बात वे अलग से पहले से ही लिखकर लाये थे, जिसे सुनाने के बाद उन्होंने मुझे पढ़ने को दिया।
लखनऊ स्थानांतरण से मेरी पारिवारिक योजनाओं को बहुत झटका लगा। मार्च में पढ़ाई का एक सत्र समाप्त हो रहा था, इसलिए हमें उसकी चिन्ता नहीं थी। चिन्ता अगले सत्र की थी। दीपांक होस्टल में या किसी दोस्त के साथ रहकर एक साल पढ़ने को तैयार था। इसलिए चिन्ता केवल मोना की थी। हमने सोचा कि मोना का प्रवेश लखनऊ में ही कक्षा 12 में किसी ऐसे इंटरकालेज में करा देंगे, जहाँ सी.बी.एस.ई. का कोर्स चलता हो। अपने बड़े भाई जैसे मित्र श्री गोविन्द राम अग्रवाल से बात करने पर उन्होंने कहा कि वे एच.ए.एल. स्कूल में अवश्य उसका प्रवेश करा देंगे।
यह जानकर मेरी एक चिन्ता खत्म हुई, परन्तु एक नयी समस्या पैदा हो गयी कि मोना किसी भी हालत में वह कोर्स छोड़ने को तैयार नहीं हुई। उसने रो-रोकर आसमान सिर पर उठा लिया। मजबूरी में हमने यह तय किया कि मैं अकेला एक वर्ष लखनऊ में रह लूँगा और बाकी सब यहीं रहकर एक साल पूरा करेंगे। हमारे बैंक में स्थानांतरित होने वाले अधिकारियों को अपना लीज का मकान अधिक से अधिक एक साल तक रोकने की सुविधा मिलती है, ताकि बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो। मैंने इस सुविधा का लाभ उठाने का निश्चय किया और राव साहब से बात करके अपना लीज का मकान एक साल अर्थात् मार्च 2011 तक रोकने की अनुमति ले ली। किराया मेरे लखनऊ के मंडलीय कार्यालय से मिलना था, जहाँ मैं स्थानांतरित किया गया था।
जब पंचकूला में संघ के लोगों को पता चला कि मेरा स्थानांतरण लखनऊ हो गया है, तो वे भी बहुत दुःखी हुए। उन्होंने मेरे जाने से एक-दो दिन पहले मेरा विदाई समारोह आयोजित कर डाला। यह समारोह हमारे ही सेक्टर 12-ए में स्थित भारत विकास परिषद भवन में हुआ था। करीब 10-12 स्वयंसेवक सपरिवार आ गये थे। सब अपने घर से भोजन की कोई न कोई चीज बनाकर लाये थे। यह समारोह मुझे बहुत अच्छा लगा। ऐसा समारोह मेरे लिए पहली बार हो रहा था, हालांकि कानपुर से स्थानांतरण होने पर मुझे अपनी शाखा के लोगों की ओर से और विश्व संवाद केन्द्र, कानपुर की ओर से भी अलग-अलग विदाई दी गयी थी। लेकिन यह पहला अवसर था, जब मेरे विदाई समारोह में स्वयंसेवकों के परिवार भी सम्मिलित हुए थे।
अपनी आत्मकथा के इस तीसरे भाग को मैं यहीं विराम देना चाहता हूँ। अपने दोबारा लखनऊ प्रवास और उससे आगे की कहानी फिर कभी लिखूँगा, यदि प्रभु की इच्छा हुई।
इति शुभम्।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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